रूप की धूप

शिल्पकारों का सपना संजीवित हुआ एक ही मूर्त्ति में ज्यों संवरने लगा
चित्रकारों का हर रंग छू कूचियां, एक ही चित्र में ज्यों निखरने लगा
फागुनी फाग,सावन की मल्हार मिल कार्तिकी पूर्णिमा को लगा कर गले
आपके रूप की धूप में चाँदनी का नया ही कोई चित्र बनने लगा

2 comments:

Anonymous said...

"फागुनी फाग,सावन की मल्हार मिल कार्तिकी पूर्णिमा को लगा कर गले"
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सुन्दर !!

Anonymous said...

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