अब उस अतीत के खँडहर में

 


नित साँझ ढले लौटा करता, मन उस अतीत के खंडहर में
जिसमें धुँधुआसे चित्रों का कोई अवशेष नहीं बाक़ी 

उन उजाड़ चुके गलियारों में अब कोई पाँव नहीं धर्ता
जिनकी रज बनी अलकनंदा थी पग का शृंगार सजाने को 
जिनकी नक़्क़ाशी उतरी थी मेंहदी के बूटी में आकर
पाँखुर सी छंद उँगलियो को दुल्हन की तरह सजाने को 

 अब वहाँ हवाओं का कोई झोंका भी नहीं झांकता है 
बिखरी है दृष्टि पटल पर बस मरु के रंगो वाली माटी

वे बरादरियाँ जिनमें थी दोपहरी रहती आधलेटी
वो बिछी धूप का आँगन जो हर रोज़ सुखाता था बाडियाँ
कुछ दलती हुई डरेंगे पर डालो की सरग़म के सुर में
थी। ताल मिलाते चर मर चर पेंगे ले झूलो की कड़ियाँ 

क्यों लौट रहा मन आवारा फिर फिर वापिस उन गलियों में
जिन मधुशालाओं के दवारे अब छोड़ गई सुधि की साक़ी

जिसके पीछे बूढ़े बरगद की छाया में संध्या ढलती
दरवेश कथाएँ चंगो पर दे थाप झूमती रहती थी 
सारंगी अलगोजे से मिल बमलहरि को छेड़ा करती 
हो मगन गीत के बोलों पर पैंजनिया खनक करती थी

क्या पता तुझे ? कुछ प्राप्त नहीं हो पाएगा उस स्थल पर से
सब लील चुकी है तथाकथित उन्नति बन करके सुरसा सी 

चुनौती कर सकूँ स्वीकार तेरी


ए नए दिन आज फिर संकल्प नव ले आ गया तू 
दे मुझे साहस चुनौती कर सकूँ स्वीकार तेरी 

भोर जब अगवानियों का दीप तेरे पथ जलाकर
हैं रखे, हंसते अंधेरे तलघरों में मुस्कुरा कर
सावनी श्यामल घटाओं से किए गजोड रहते
लीलने सारे उजाले, सूर्य से नज़रें। चुरा कर 

पास में रख लूँ उजासें तीलियों में साथ अपने
और लड़ लूँ मैं तिमिर से जब घिरें बदली अंधेरी 

दे मुझे निर्णय, थमाता है नया पाथेय कर में
जानता मैं पथ अजाने, किंतु गति रखनी निरंतर
साँझ के हर नीड़ का आश्रय सदा होता क्षणिक है
पाँव को रफ़्तार देनी मंज़िलों को लक्ष्य रख कर 

मैं समझ सारे रहा इंगित, मुझे तू दे रहा है 
देखता हूँ वे छवि जो ला क्षितिज पर हैं चितेरी

हैं विदित तुझको मेरी सीमाएँ औ’ अज्ञानताएँ
दे मुझे शिक्षा करूँ मैं साध्य को अपने सुनिश्चहित 
और दे आलोक इतना अनुसरण पगचिह्न का जो 
भी करें, हो जाएँ उनकी राह का हर मोड़ दीपित 

मैं नज़र के क्षेत्र की सीमा मिटा कर बढ सकूँ अब
चीन्ह  सम्भावनाएँ, साँझ  के  पट जो उकेरी 



ताना बाना बुने कबीरा


एक लुकाटी एक कठौती एक चदरिया चाहे जीवन
निशा दिवस फिर भी करघा ले ताना बाना बुने कबीरा

कते सू​त ​ को बुनते बुनते खो देता संतोष हृदय का
धुनिया से माँगे धुन कर दे उसको वह रेशम के धागे
बढ़ती आकांक्षाओं की सीमाए विस्तृत होती जाती
​मुंड़ी हुई भेड़ों के दवारे जाकर ऊन भीख में माँगे

भूला है मंज़िल के पथ पर संचय साथ नहीं चलता है
यायावर सब एक सरीखे, रहे धनिक या रहे फ़क़ीरा

धूप छाँह की आँखमिचौली का पीछा करते करते ही
एक वृत्त में चक्करघिन्नी बना हुआ ही घूमा करता
कैलेंडर की शाखाओं से झरते है दिनमान निरंतर
बिना ध्यान के बस अपनी परछाईं में ही खोया रहता

आपाधापी धमाचौकड़ी की बिसात फैला कर अपनी
सपना देखे एक चाल में ही प्यादे से बने वजीरा

केवल अपना बिम्ब निहारे उगी भोर से ढली साँझ तक
प्रतिबिंबों की इक मरीचिका का प्रतिपल ही पीछा करता
कर काँधे की छागल ख़ाली तपते मरु की पगडंडी पर 
स्वाति मेघ के घिर आने की असफल एक प्रतीक्षा करता

ज्ञात उसे है अंतर्मन की शांति , तोष का पथ देती है
फिर भी खोजा करता उस​को ​ पीट पीट कर ढोल मंजीरा 

आहना राधा गाला

 


एक झंकार उठ बीन के तार से
स्वर्ण नूपुर की ख़नकों से मिल कर गले
चाँदनी की किरण से फिसलते हुए
आज आइ उतर कर मेरी गोद में 

एक नन्ही कली  की मृदुल पाँखुरी
थरथराते हुए नव पुलक भर गई
रश्मियाँ हाथ में ले उगी भोर की 
अपने अस्तित्व का नाम नव लिख गई

मलयजी स्पर्श पाकर के सिहरी हुई 
झील के नीर में जो मची हलचलें 
उनमे पड़ते हुए बिम्ब से सज रही
रात के अंत पल में उगे स्वप्न सी 

मन में आह्लाद की गूंजने लग गई
अनगिनत आज सहसा ही शहनाइयाँ
अपने आराध्य का अंश पा सामने
शब्द करने लगे पृष्ठ पर नृत्य आ

आओ स्वागत तुम्हारा है  ओ आहना
ज़िंदगी में नई वाटिकाएँ खिलें
और अनुभूतियों से सुधा सिक्त हों
आगतो के निमिष तुमसे मिल कर गले

मौन हुए स्वर

 

न तो कुछ लिखने का ही है और न कुछ पढ़ने का मन है
नयनों की ड्यौढ़ी पर आकर अटका हुआ एक सावन है

कल तक जितना था कविता से उतना ही हूँ आज अजाना
शब्दों के गहरेपन की सीमाओं को मैं न पहचाना
भावों से लेकर वाणी में ढलने तक अक्षर की काया
कितने रंग बदल लेती है, नहीं समझ 
​में 
 संभव आना

यह मेरी ही अक्षमता है, रही सोच की सीमित सीमा
तब ही तो भाषा ने मुझसे ठानी हुई तनिक अनबन है

मौन हुए स्वर जब भी चाहा बातें व्यक्त करूँ मैं मन की
बिना दीप के रही सर्वदा तुलसी उगी मेरे आंगन की
नैवेद्यों की उंगली पकड़े संझवाती के सूने पथ पर
चलती रही आस की धुन पर बजती हुई ताल धड़कन की

रूठ चुके आराधित से कब शेष रहा है कोई अपेक्षित
सिमट गया पूजा की थाली में हर संवरा आराधन है

हुआ समर्पित चार कदम चल कर पथ में ही जो यायावर
नीड़ नहीं पाथेय नहीं न मिला उसे निशि या फिर वासर
अपनी सजी हुई दूकानों को समेट अपने कांधे पर
खुद खरीदता,खुद ही बेचा करता, है कैसा सौदागर

चुप होकर बहार के झोंके बैठे हाथ हाथ पर धर कर
बजता है हर एक दिशा में बस पतझर का विज्ञापन है

राकेश खंडेलवाल 


कोई भी गंध नहीं उमड़ी

  कोई भी गंध नहीं उमड़ी  साँसों की डोरमें हमने, नित गूँथे गजरे बेलकर लेकिन रजनी की बाहों में कोई भी गंध नहीं साँवरी नयनों में आंज गई सपने ज...