धूप की अनगिन शिखाएं



रात का श्रृंगार करती चाँद की उजली विभाएँ 
और दिन को आ सजाती धूप की अनगिन शिखाएं 

फागुनी रसगन्ध में डूबी हुई हर इक दिशा है 
चेतिया धुन में हवाएं लग रही हैं गीत गाने 
मोरपंखी साध छेड़े सांस में शहनाईयो  को 
लग रहीं हैं धड़कनों पर पैंजनी अब गुनगुनाने 

मौसमी इन करवटों पर आओ सुधबुध भूल जाएँ 
कर रहीं श्रृंगार दिन का धूप की अनगिन शिखाएं 

खेत की पगडंडियों पर फिर लगी चूनर लहरने
दृष्टि के आकाश पर आकर बिछी चादर बसंती
झूमती अंगनाइयों के संग पनघट पर उमंगें
भावनाओं की गली में प्रीत की बंसी सरसती

कल तलक निर्जनसजीं हैं दुल्हनों सी आज राहें 
और दिन को रँग रही हैं धूप की अनगिन शिखाएँ 

लग गई हैं कोंपलें शाखाओं पर फिर सुगबुगाने 
भोर को देते निमंत्रण आ पखेरू चहचहाते 
चल पड़े निर्झर बिछौना छोड़  कर गिरिश्रृंग वाला
और  लहरों पर बिखरते मांझियों के बोले गाते 

जो बिखेरे रंग इन्द्रधनुषीदिशाओं में प्रक्रुति ने
हम उन्हीं में डूब कर नूतन उमंगों को सजायें

अपने बियावान सन्नाटे


तुमको, मुझको, सब को  घेरे अपने बियावान सन्नाटे
दूर दूर तक पत्ता तक भी हिलता नजर  नहीं आता है

उगी भोर से संध्या के ढलने तक बढ़ती आपाधापी
बाहर भीड़ें छील रही है राहों पर चलते कांधो को
अधरों पर चिपकी मुस्कानों के परदे से झाँके कुंठा
और विषमताए गहराती है मन पर छाये अवसादों को

बुझी आस पर मौन कलपती टूटे सपनो की बाँसुरिया
कोई सिसकी का स्वर भी तो आकर नहीं सँवर पाता ही

आवारा राहों पर ख़ुद को छलते छलते चलते है सब
ज्ञात भले है सारी राहें एक वृत्त में बँधी हुई है
दिशाहीन गंतव्य हीन बस गतिमय रहना ही निश्चित है
कठपुतले हैं, डोर न जाने किन हाथों में सधी हुई है

चाहत एक लुभाती प्रतिपल  एक अदेखी उस मंज़िल की
जिसका ज़िक्र नहीं दरवेशो से भी कोई सुन पता है

लौटी वापस सूनी नज़रें द्वार खटखटा दिशा दिशा के
कोई चेहरा नहीं जड़ी हो जिस पर चिप्पी पहचानो की
तथाकथित परिचय की सीमा, है मरीचिका अपनेपन की
अर्थहीनता बतलाती है कृत्रिमतायें मुस्कानों की

शायद कल का सूरज कोई परिवर्तन का अवसार लाए
इसी आस को ढोते ढोते पूरा समय गुज़र जात। है

बसंत ऋतु

जो बसन्ती चादरों का स्वप्न था
बर्फ़ की इस शुभ्रता में खो गया
आपने दे दी शिशिर को जो विदा
आ यहाँ उसका बसेरा हो गया
राह पर, पगडंडिय्पं-दालान में
है असंभव पां टिक पायें कहीं
शून्य से जब अंश नीचे दस गिरा
तापमापी यंत्र हो चुप रह गया. 

और हम पंचांग में अंकित रहे 
पंचमी के ज़िक्र को पढ़ते रहे 

शारदे के हाथ से वीणा मिली 
उंगलियां झंकार लें, असफल रही  
हाथ को जकड़े शिथिलतायेँ रहीं 
कोई अक्षर लिख नहीं पाए कहीं 
देह पर  तह बन रहे अटके कई 
कोट,स्वेटर और मफलर टोपियां 
ओढ़ कर हस्त्राण भी, ठिठुरा करी 
कंपकंपाती हाथ की सब उंगलियां 

है बसन्ती ऋतु कलेण्डर कह रहा 
दिन मगर सब शीत में जकड़े रहे 

नील अम्बर बादलों में खो गया
बूँद गिरते भूमि पर जमती रही
पीत आभा फूल कलियों की गुमी
बर्फ़ की तह के  तले जमती रही 
सूर्य रथ की है तितर वल्गाएँ सब
 भूल प्राची की प्रतीची की दिशा 
देख नभ को जानना सम्भव नहीं 
नाम मौसम का ,समझ पाना पता

और मौसम की ठिठोली देखते 
दाँत में बस उँगलियंधरते rahe

अनजाने ही संवर गया है

आवाज़ों के प्रतिबिम्बों में जब जब भाव घुल गए मेरे तब तब नया गीत  आ कोई अनजाने ही संवर गया है मन के बुककेसों में रक्खी हुई किताबों ने ख...