वातावरण में जब उदासी

बाग में चम्पा चमेली पूछती कचनार से यह
किस तरह खिल पाएँ?  है वातावरण में जब उदासी

अर्ध उन्मीलित अधर लेकर प्रतीक्षित पाटलों पर
तुहिन कण को मिल नहीं पाया उषा से एक चुम्बन
तीर नदिया के खड़े इक पेड़ के पत्रों टंगी थी
चाँदनी पिघली हुई, गिर कर नहीं पाई तरंगन

बांसुरी की टेर सोई है कदम्ब की छाँह लेकर
पायलों की झनझनाहट  पर चढ़ी है बदहवासी 

बादलों के चंद टुकड़े घूमते निस्पृह गगन में
एक दूजे से विमुख, विपरीत राहों पर भटकते
इक किनारी बिजलियों की छोर साड़ी का क्षितिज की
छोड़ कर ये पूछती है क्यों घटा बन ना बरसते

उग रही तृष्णाओं की फसलें सभी जो लहलहाती
मिल सके उनको तनिक तो तृप्ति दो पल को ज़रा सी 

घिर रहे हैं बस कुहासे संशयों के भोर संध्या
दोपहर से ही अकेलापन टपकता कक्ष में आ 
मौसमों की बंदिशें तो चार दिन में दूर होंगी 
प्रश्न है पर कब बहारें खिलखिलाएँगी यहाँ आ 

ओढ़ लेता बावरा मन आस की छिरछिर चुनरियाँ
मिल सके इस अमा की रात में थोड़ी विभा सी 

मार्ग से परिचय नहीं है


मार्ग से परिचय नहीं है किंतु फिर भी चल रहा हूँ
मैं पथिक, मेरी नियति है पंथ पर चलना निरंतर

दूरियाँ तो मंज़िलों की उठ रहे पग  ही बढ़ाते  
बँट चुकी सारी दिशाएँ परिधियों के वृत्त तक जा
और चलना है कहाँ तक ये अकेला एक निर्णय
वह टिका  है बस पथिक के निश्चयों के केंद्र पर आ​ ​

एक निष्ठा और इक संकल्प पथ में साथ हों जब
मार्ग की बाधाए सारी देखती हैं दूर हट कर

चल रही झंझायें थम लें, है नहीं मुझको प्रतीक्षा
पंथ में गतिरोध मेरा कोई कर सकता नहीं है
लक्ष्य की आराधना में खंड कर सुधियाँ चला मैं
नीड़ से पहले कहीं रुकना ,मेरी ​ गति में  नहीं है

नीड़ में विश्रांति के पल बस गिने कुछ ही निशा के
भोर नित पाथेय देती हाथ में मुझको, सजा कर

विहगों​ ​के अल्हड़ कलरव​ ​
 का है संगीत साथ में मेरे
उगी धूप की अंगड़ाई से व्योम धरा सब धुले धुले हैं
हो जीवंत मुझे रहना है गतिमय चुने हुए इस पथ पर
मेरे लिए प्रतीक्षित मंज़िल के द्वारे​ ​ सब खुले खुले हैं

मार्ग से परिचय नहीं है, मंज़िलें तो हैं सुनिश्चित​ ​
एक मिलती, दूसरी फिर सामने आती नि​खर कर 


राकेश​ खंडेलवाल
१५ अप्रेल २०२०​

धुन उमड़ती ही नहीं है


बज रही बैसाखियाँ सारंगियों  पर
साज से धुन अब उभरती ही नहीं है 

खेत औ खलिहान सूने. शून्य राहें 
बैठती मन मार चौपालें अकेली
दृष्टि पथराई गगन को ताकती  बस
ले नहीं पाई विदा दुल्हन नवेली
आतुरा छत रह गई फ़ैलाये  बाँहें 
आ नहीं बोला तनिक भी कोई कागा 
प्रश्न पर बस प्रश्न पूछे जा रही है
घिस चुकी रेखाए लेकर के हथेली 

मौन दम साधे खड़ी हैं किंकिणी अब
पाँव में पायल खनकती ही नहीं है 

ओढ़ सन्नाटा दुपहरी शाख़ पर आ
टकटकी बांधे सड़क को देखती है 
किंतु सूनी माँग सी वैधव्य की ले
शुष्क नज़रों से प्रतीक्षा सींचती है
फुनगियों पर उग रही नव कोंपलों ने 
रख हथेली छाँव को, पथ को निहारा
साँझ लगता रास्ता भूली हुई है
कोई परछाईं तलक न दीखती है 

कह रहा पंचांग आइ पूर्णिमा है
चाँदनी लेकिन निखरती ही नहीं है 

पार शीशे के कोई आकार धुंधला
कौन सी तस्वीर ढूँढे कौन जाने
हर नज़र हर एक चेहरा प्रश्न सूचक
उत्तरों की आस में बीते ज़मान
उग रही हैं दृष्टि में परछाईं भय की 
एक असमंजस खड़ा बाँहें पसारे 
कांपती आशा, घटा से पूछती है
आएँगे फिर से कहो कब दिन सुहाने 

पर दिशाओं के झरोखे बंद सारे 
भोर प्राची से, निकलती ही नहीं है 
















कोई भी गंध नहीं उमड़ी

  कोई भी गंध नहीं उमड़ी  साँसों की डोरमें हमने, नित गूँथे गजरे बेलकर लेकिन रजनी की बाहों में कोई भी गंध नहीं साँवरी नयनों में आंज गई सपने ज...