एक गरिमा भरो गीत में

सरगमों की गली से गुजरते हुये रागिनी बो लो संगीत में
शब्द होठों से खुद ही झरें, एक गरिमा भरो गीत में

दिन के अख़बार की सुर्खियाँ
काव्य होती नहीं जान लो
व्यंग से तंत्र के बन्ध को
ध्यान देकर के पहचान लो
दूर कितना चलेंगी कहो
सामने आई तुकबन्दियाँ
काव्य होती नहीं जान लो
राजनीतिक कसी फ़ब्तियाअँ

शब्द अनुप्रासमय छन्द के हों नहाये हुये प्रीत में
मन के तारों को छू ले तनिक, एक गरिमा भरो गीत में

दिन ढला पीर मन में उगी
ओढ़नी सांझ की ओढ़कर
रात नींदे चुरा ले गई
पास एकाकियत छोड़कर
ये व्यथा कितनी दुहरा चुके
अब सँवारो वे अनुभूतियाँ
शून्य से झांकती जो रहीं
कोई दे पाये अभिव्यक्तियाँ

कुछ मिलन, कुछ विरह, अश्रु कुछ, फिर ना उलझो इसी रीत में
शब्द होठों से खुद ही झरें, एक गरिमा भरो गीत में

शब्द जो ढालते छन्द में
अर्थ उनके समझ कर लिखो
दर्पणों में बने बिम्ब से
अक्षरों में उतर कर दिखो
तब ही संप्रेषणा के सिरे
खुद ब खुद सारे जुड़ जायेंगे
गाऒ तुम जो खुले कंठ से
स्वर सभी उसको दुहरायेंगे

चीर  देखो  भरम  दृष्टि के  फर्क दाधि और नवनीत में
स्वर स्वयं आके जुड़ जाएंगे. एक गरिमा भरो गीत में

पल वे असमंजसों के रहे जो कभी

शेख चिश्ती की दरगाह की जालियां
जिनपे लटकी हैं मन्नत भरी डोरियां
रंगभरती हुई आंख के चित्र में
आस को नित्य झूला झुलाती हुई
 
एक चंचल हवा का झकोरा पकड़
करतीं अठखेलियाँ मुस्कुराती हुई
कामना के संवरते हुए पृष्ठ ्पर
शब्द लिखती हैं कुछ गुनगुनाती हुई
 
कर रही प्रज्ज्वलित नैन के गांव में
स्वप्न के दीप ला ला के चौपाल पर
कुछ्ग अपेक्षायें पंकज बनाती हुई
ज़िन्दगी के पड़े शान्त स्थिर ताल पर
 
बरगदों पर बँधे सूत में गुंथ गईं
हाथ की कोई रेखा बनी अजनबी
और शंकाओं से ग्रस्त होने लगे
पल वे असमंजसों के रहे जो कभी

द्वार अजमेर की बुर्जियों के तले  
दे रही दस्तकें चंद  कव्वालियां 
बज रहीं सरगमों से लगा होड़ कुछ 
ताल पर उठ रहे हाथ की तालियां 

एक अरसा हुआ आस के व्योम में 
योन दिलासों की उड़ती पतंगें रही 
आज बीता भले घिर के नैराश्य में 
कल का सूरज खिलायेगा कलियाँ सभी 

रखा एक सिंदूरी पत्थर

 
शहर की उस वीरान गली में जहां हमारा बचपन बीता
अभी तलक  पीपल के नीचे  रखा एक सिंदूरी पत्थर 
 
वो पीपल जिसने सौंपी थी उलझी हुई पतंगें हमको 
जिसकी छाया में संध्या में रंग भरे कंचे ढुलके थे 
जिसकी शाखा ने सावन की पैंगों को नभ तक पहुंचाया 
जिसके पत्रों की साक्षी में शपथों के लेखे संवरे थे 
 
उसकी आंखें अभी तलक भी बिछी हुई हैं सूने पथ पर
शहर की उस वीरान गली में नहीं गूंजते  हैं अब पद स्वर 
 
उस पीपल की बूढ़ी दाढ़ी में उलझी सूतों की डोरी 
जिन्हें मन्नतों ने मावस की छतरी के नीचे बांधा था 
तन पर टके हुए लगते हैं धूमिल वे सब स्वस्ति चिह्न अब
नत  होते शीशों ने जिनको साँझ सवेरे आराधा था
 
 
शेष नहीं है आज किन्तु अब चावल भी आधी चुटकी भर 
किंकर्तव्यविमूढ़ा  है मन  दिन की इस बदली करवट पर 
 
शहर की उस वीरान गली का नक्शे में भे एचिह्न न बाकी
जिसमें फ़ागुन की फ़गुनाहट गाती थी निशिदिन चंगों पर
संझवाती का दिया जहाँ से निशि को दीपित कर देता था
मंत्रों के स्वर लहराते थे मंदिर के गुंजित शंखों पर
 
शह्र की उस वीरान गले एकी याद अचानक यों घिर आई
बिना पते का पत्र डाकिया लाया हो जैसे लौटा कर

ओस की बूँद आ पंखुरी से मिले

यूँ लगा जैसे कल की परीक्षाओं के
प्रश्नपत्रों के उत्तर सभी मिल गये
बीज बोया नहीं एक भी, साध की
क्यारियों में सुमन आप ही खिल गये
साधना के बिना कोई वर मिल गया
प्रार्थना के बिना पूर्ण पूजा हुई
रात की श्यामला चूनरी का सिरा
जड़ सितारे स्वयं आज झिलमिल हुआ
 
आप ऐसे मिले ज्यों मिले ओस की
बूँद आकर किसी पंखुरी से गले
आप ऐसे मिले पूर्व की गोख में
रश्मियाँ ज्यों क्षितिज से मिली हों गले
 
कल्पना ने कभी कल्पना की नहीं
चित्र से आप जीवन्त हो जायेंगे
शब्द जितने बिखर रह गये पृष्ठ पर
आप ही गीत के छन्द हो जायेंगे
नैन की वीथियों में भटकते हुए
दृश्य बन जायेंगे स्वप्न की बाँसुरी
साध यायावरी के किसी लक्ष्य से
जुड़ गई एक अनुबंध की पाँखुरी 
 
दृष्टि के पाटलों पर घिरे जो हुए
वे कुहासे सभी एक पल में ढले
आप ऐसे मिले ज्यों मिले ओस की
बूँद आकर किसी पंखुरी से गले
 
द्वार देवालयों के खुले आप ही
एक प्रतिमा स्वयं अवतरित हो गई
स्वप्न ने स्वप्न में जो संजोई कभी
एक घटना सुखद वह घटित हो गई
बिन तपस्या उतर आई भागीरथी
बिन अपेक्षा दिया सिन्धु ने रत्न ला
शतगुणित सत्य बन सामने आ गया
कल्पना का तनिक जोकि अनुमान था
 
यूं लगा पूर्व के संचयित पुण्य सब 
सामने आ गए एक पल में फले 
आप ऐसे मिले ज्यों मिले ओस की
बूँद आकर किसी पंखुरी से गले
 
लोह का एक टुकड़ा परस पारसी
पा अनायास जैसे कि कंचन हुआ
एक सूखा हुआ तॄण पड़ा भूमि पर 
गंध में डूब कर जैसे चन्दन हुआ
मौसमों की हुई चूनरी फागुनी
दोपहर में गगन दीप जलने लगे
दक्षिणांगी हुए नभ के नक्षत्र सब 
साँझ की चौघड़ी में संवरने लहे 

हर लहर हो गई यूं तरंगित तनिक 
जैसे डोली किसी नवदुल्हन की चले
आप ऐसे मिले ज्यों मिले ओस की
बूँद आकर किसी पंखुरी से गले 

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में...