स्वप्न फ़िर भी आँज लें हम

दस्तकें देने लगा है द्वार पर नववर्ष साथी

बीज गमलों में लगायें आओ फ़िर से कामना के

जानते परिणति रहेगी,दोपहर में ओस जैसी

स्वप्न फ़िर भी आँज लें हम आँख में संभावना के



आज फ़िर से मैं कहूँ हों स्वप्न सब शिल्पित तुम्हारे

इस बरस खुल जायें सब उपलब्धियों के राज द्वारे

रुत रहे नित खिड़कियों पर धूप की अठखेलियों की

सांझ अवधी हो उगे हर भोर ज्यों गंगा किनारे

दस्तकें दें द्वार पर आ वाक्य नव प्रस्तावना के



घिस गई सुईयां यही बस बात रह रह कर बजाते

थाल में पूजाओं के, टूटे हुये अक्षत सजाते

रंगहीना हो चुकी जो रोलियां, अवशेष उनके

फ़िर भुलावे के लिये ला भाल पर अपने लगाते

मौन हैं घुंघरू, गई थक एक इस नृत्यांगना के



इसलिये इस बार आशा है कहो तुम ही सभी वह

जो कि चाहत के पटल पर चढ़ न पाया, है गया रह

जो अपेक्षित था अभी भी है नहीं आगे रहे जो

वर्ष का नव रूप जिसको जाये कर इस बार तो तय

प्राप्तिफ़ल लिख दो समय के शैल पर आराधना के


३१ दिसम्बर २०११

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एक पत्थर को हम पोत सिन्दूर से

जोकि बस में नहीं था किसी के कहीं
आस बस इक उसी की लगाते रहे
 
 
बुझ गई आखिरी दीप की वर्त्तिका
रोशनी लड़खड़ाते हुए गिर पड़ी
रात के गर्भगृह में रही बन्दिनी
भोर के हाथ में थी लगी हथकड़ी
स्वर प्रभाती के सब मौन हो रह गये
आरती की नहीं घंटियाँ बज सकीं
दिन चढ़े देर तक सोई थी नीड़ में
एक चिड़िया गई सांझ से थी थकी
 
 
और हम सरगमों पर सजा, रात भर
का है मेहमाँ अंधेरा ये गाते रहे
 
 
थी टिकी उत्तरी ध्रुव के अक्षांश पर
रात की चादरें थीं बहुत ही बड़ी
संशयों में घिरी दूर के मोड़ से
ताकती रह गई धूप सहमी बड़ी
द्वार पर आगमन के पड़ी आगलें
जो कि क्षमताओं की रेख से थीं अधिक
और था सामने हंस ठठाता रहा
खिल्लियाँ सी उड़ाते दिवस का बधिक
 
 
अपने विश्वास की चिन्दियाँ देखते
हम हवा की मनौती मनाते रहे
 
 
कोई आ पायेगा धुन्ध को चीर कर
जानते थे नहीं शेष संभावना
किन्तु फिर भी कहीं आस की ले किरन
हम छुपाते रहे पास का आईना
इक अविश्वास पर फिर मुलम्मा चढ़ा
मूर्तियों को नमन नित्य करते हुए
जो कि अनभिज्ञ अपने स्वयं से रहे
उन नक्षत्रों की गतियों से डरते हुए
 
 
एक पत्थर को हम पोत सिन्दूर में
भोर संध्या में मस्तक नवाते रहे

खुद ना प्रश्न चिह्न बन जायें


कुछ प्रश्नों क्रे उत्तर मैने दिये नही बस इस कारण से
मेरे उत्तर नव प्रश्नो का कारण कहीं नहीं बन जायें

घड़ी प्रहर पल सभी रहे हैं प्रश्नों के घेरे में बन्दी
घटते बढ़ते गिरते उठते साये तक भी प्रश्न उठाते
गति में रुके हुए या मुड़ते पथ की हर सहमी करवट पर
हर पग की अगवानी करते प्रश्न चिह्न ही बस टँग जाते

गायन वादन रुदन हँसी के स्वर सब प्रश्नों के अनुचर हैं
चाहे जितनी बार छेड़ कर देखें स्वर की नय़ी विधायें

ऐसा भी तो नहीं प्रश्न के उत्तर ज्ञात नहीं हौं मुझको
लेकिन मेरे उत्तर भी तो करते रहे प्रश्न ही आकर
जब भी करी व्याख्या कोई, झुकी कमर को दिये सहारा
खड़े हो गये सन्मुख मेरे प्रश्नचिह्न आकर अकुलाकर

झुकी हुई नजरें बिछ जाती हैं हर एक दिशा में पथ की
इनसे दामन साफ़ बचाकरे कहो किस तरफ़ कदम बढ़ायें

प्रश्न प्रश्न ही रहते चाहे उत्तर का आवरण ओढ़ लें
उत्तर भी समझाया जाये अगर, नहीं हो पाता उत्तर
क्यों,कब,कहाँ,किसलिये,किसने,कैसे क्या जब शब्द उठे तो
मौन कंठ रहना चाहा है पल में पूर्ण समर्पण कर कर

प्रश्नों के उत्तर,उत्तर के प्रश्न और फिर उनके उत्तर
इनके रचे  व्यूह में घिर हम खुद  ना प्रश्न चिह्न बन जायें

चित्र बन रह जायें जब इतिहास

बोझ से लगने लगें सम्बन्ध के धागे जुड़े जब
आस हो कर के उपेक्षित द्वार से खाली मुड़े जब
कैद में बन्दी अपेक्षा की रहें सद्भावनायें
स्वार्थ के पाखी बना कर झुंड अम्बर में उड़ें जब
 
 
तब सुनिश्चित संस्कृतियों की हमारी वह धरोहर
जो विरासत में मिली थी, खर्च सारी हो गई है
 
 
छू न पायें याद की दहलीज को जब वे कहानी
मुद्रिकायें भी रहा करती रहीं जिनमें निशानी
अनकहे सन्देश लेकर थीं बहा करती हवायें
पास आ अनुभूतियों के रुत हुआ करती सुहानी
 
 
जान लेना तब मुलम्मों से भरी यह चन्द्रिका सी
पूर्णिमा के शब्द को भी अर्थ नूतन दे गई है
 
 
चित्र बन रह जायें जब इतिहास के सब स्वर्ण पन्ने
अर्थ की अनुभूतियों से ध्यान लग जाये बिछड़ने
मूल्य की भारी कसौटी हो परखती भावना को
सावनों को देख पत्ते वृक्ष से लग जायें झड़ने
 
 
सौंप जो मिट्टी गई थी होंठ को भाषायें कोमल
आज अपनी अस्मिता खोकर अनामिक हो गई है
 
 
शब्द कोशों से उधारी माँगती हो बात अपने
अर्थ को,हर व्याख्याके के पृष्ठ लगती हो पलटने
उलझनों के चक्रच्यूहों में घिरी संवेदना के
देख कर अपनी दशायें अश्रु ही रह पायें झरने
 
 
जान लेना तब हमारी उम्र की उपलब्धियों को
आज की पीढ़ी उठा ले ताक पर जा धर गई है

सुरभित इस मन का वृन्दावन


काजल की कजराई में जब डूबे कलम कल्पनाओं की
हस्ताक्षर उस घड़ी उर्वशी कर देती है मुस्कानों में
अलकों में आ गुँथ जाते हैं मेघदूत वाले सन्देसे
वाणी सरगम बन जाती है वंसी से उठती तानों में
 
शतरूपे !-तुम दूर सदा ही हो भाषा की सीमाओं से
कर देता है निमिष ध्यान का, सुरभित इस मन का वृन्दावन
 
युग के महाकाव्य अनगिनती, अंकित आकाशी अक्षों में
दृष्टि किरण से अनुबन्धित हो, सृष्टि प्रलय पलकों में बन्दी
चितवन में चित्रित सम्मोहन के सब मंत्र मेनका वाले
सांसों के कोमल स्पर्शों से, मलय वनों को मिले सुगन्धी
 
कलासाध्य हर एक कला की तुम ही केवल एक उपासित
चित्रकारिता हो नर्तन हो, हो गायन हो अथवा वादन
 
काल-सन्धि पर बने हुये हैं शिल्प एक तुमको ही अर्पित
मीनाक्षी कोणार्क अलोरा, ताजमहल, सांची खजुराहो
रंग कूचियों की अभिलाषा खींचें चित्र तुम्हारे ही बस
शिलाखंद की यही कामना, मूर्ति तुम्हारी में ढलता हो
 
मृगनयने !हर काव्य कहानी और लेख का लख्श्य तुम्हीं बस
शब्द शब्द पर भाव भाव पर रहा तुम्हारा ही आच्छादन

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...