सुरभित इस मन का वृन्दावन


काजल की कजराई में जब डूबे कलम कल्पनाओं की
हस्ताक्षर उस घड़ी उर्वशी कर देती है मुस्कानों में
अलकों में आ गुँथ जाते हैं मेघदूत वाले सन्देसे
वाणी सरगम बन जाती है वंसी से उठती तानों में
 
शतरूपे !-तुम दूर सदा ही हो भाषा की सीमाओं से
कर देता है निमिष ध्यान का, सुरभित इस मन का वृन्दावन
 
युग के महाकाव्य अनगिनती, अंकित आकाशी अक्षों में
दृष्टि किरण से अनुबन्धित हो, सृष्टि प्रलय पलकों में बन्दी
चितवन में चित्रित सम्मोहन के सब मंत्र मेनका वाले
सांसों के कोमल स्पर्शों से, मलय वनों को मिले सुगन्धी
 
कलासाध्य हर एक कला की तुम ही केवल एक उपासित
चित्रकारिता हो नर्तन हो, हो गायन हो अथवा वादन
 
काल-सन्धि पर बने हुये हैं शिल्प एक तुमको ही अर्पित
मीनाक्षी कोणार्क अलोरा, ताजमहल, सांची खजुराहो
रंग कूचियों की अभिलाषा खींचें चित्र तुम्हारे ही बस
शिलाखंद की यही कामना, मूर्ति तुम्हारी में ढलता हो
 
मृगनयने !हर काव्य कहानी और लेख का लख्श्य तुम्हीं बस
शब्द शब्द पर भाव भाव पर रहा तुम्हारा ही आच्छादन

4 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

बादल मन को छाये हैं,
या कविता बन आये हैं।

Shardula said...

:)

रंजना said...

अद्वितीय....!!!!

Udan Tashtari said...

अद्भुत!!

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में...