आस्था से प्रश्न करने.

हो गईं हैं बन्द बजनी घंटियाँ सब फोन वाली
डाक बक्से में कोई भी पत्र अब आता नहीं है
मौसमों की करवटें हर बार करती हैं प्रतीक्षा
किन्तु शाखा पर कोई पाखी उतर गाता नहीं है
 
ज़िन्दगी का पंथ मंज़िल के निकट क्यों है विजन वन
आज मन यह लग गया है आस्था से प्रश्न करने.
 
दृष्टि के वातायनों में चित्र बनते हैं अधूरे
सांझ की सारंगियों के साथ रोते तान पूरे
हर दिशा से भैरवी का उठ रहा आलाप लगता
स्वप्न में भी कोई कहता है नहीं आ पास छू रे
 
एक आशा भी निराशा की पकड़ उंगली खड़ी है
उम्र के वटवृक्ष से झरते दिवस कब पाये रुकने
 
दस्तकें दहलीज पर आकर स्मृति की थरथराये
द्वार के पट थाम लिखता मौन ही केवल, कथाएं 
शून्य की चादर क्षितिज के पार तक विस्तार पाती 
पास आते, हर  घड़ी, लगता सहम जाती हवाएं 
 
कट चुकी सम्बन्ध की हर इक नदी जो थी प्रवाहित 
शेष हैं बस नैन की दो वादियों में चंद  झरने 
 
सिन्धु में इक पोत पर बैठा हुआ मन का पखेरू 
आह भरता ताकता है भाव के संचित सुमेरू 
साध का हो अंत रहता मरुथली बरसात जैसा 
और अम्बर पर बिखर कर रह गया हर बार गेरू 
 
फ्रेम ईजिल पर टंका  छूटा नहीं है तूलिका को 
उंगलियाँ उठ पायें इससे पूर्व लगती जाएँ झुकने 

मेरा योग इसमें नहीं है जरा भी

इसे गीत कह दो या कविता बताओ 
मेरा योग इसमें नहीं है जरा भी
 
लिखे शब्द जो शब्द की साधना में
वही शब्द बस साथ मेरे हुये हैं
कभी जिनको आशीष ने छू लिया था
वही भाव बस मुझको घेरे हुये हैं
उन्हें व्याकरण से परे छन्द ने था
उठा कर किसी एक क्रम में सजाया
बिना ज्ञान के और परिमार्जनों के
वही कंठ में आ मेरे गुनगुनाया
 
जिसे चाहो वह रंग इन पर चढ़ा लो
हरा लाल केसर या पीला गुलाबी
 
खुले होंठ पर थरथरा रह गई जो
कभी अर्थ अपना नहीं  बात पाई
ना चढ़ पाई थी तार की गोख तक जो
नहीं रागिनी ने  जरा गुनगुनाई
उसी बात को शब्द के कैनवस पर
चढ़ा कर नये रंग भरने लगा हूँ
नई एक सरगम धुनों में सजाकर
वही एकलय   गीत करने लगा हूँ
 
इसे भावना का कहो क्रम निरंतर 
या बादल के पट से बिखरती विभा सी 
 
नयन की गली में टंगे अलगनी पर
सपन चुनरी की तरह फरफराते 
कोई स्पर्श जिनके निकट आ ना पाया 
हवा की तरह भी कभी आते जाते 
उन्हें छंद के चाक पर मैं चढ्क्षाकर 
नया एक आकार देने लगा हूँ 
दिशा बोध की इक उफनती नदी में
 उन्हें साथ लेकर मैं बहाने लगा हूँ 
 
इसे चाहे उन्माद का नाम दे लो 
छुअन या कि  अपनत्व की है ज़रा सी 

और मेरी खामोशी गीत गुनगुनाती है

सांझ की तराई में
शाल सुरमई ओढ़े
धुन्ध में नहाई सी
कोई छवि आकर के दिलरुबा बजाती है
और मेरी खामोशी गीत गुनगुनाती है
 
ओस जैसे झरती है
फूल की पंखुरियों पर
उगते दिन की राहों में
मोती जैसे कदमों से पास बैठ जाती है
और मेरी खामोशी गीत गुनगुनाती है
 
तारकों की छाया में
चाँदनी की कोई किरन
नभ की गंगा में उतर
अपना मुँह धोते हुए डुबकियाँ लगाती है
और मेरी खामोशी गीत गुनगुनाती है
 
पतझरों के पत्तों पर
रंग की कलम कोई
मौसमों से ले लेकर
कल्पना के आँगन के चित्र कुछ बनाती है 
और मेरी खामोशी गीत गुनगुनाती है

नाम कोई गुनगुना कर

दे रहा है कोई दस्तक सांझ मन के द्वार आकर
लग गई गाने हवायें नाम कोई गुनगुना कर
 
एक अनचीन्ही  छुअन सी पास आकर छेड़ती है
नैन के पट खोल देती और फिर फिर भेड़ती है
चित्रमय होकर पलक की सीढ़ियों पर खिलखिलाती
एक पल चुपचाप  रहती दूसरे में टेरती है
 
मैं समझ पाता नहीं हूँ क्या ये वही संभाविता : है
मैं हुआ जिसका प्रतीक्षित रात दिन पलकें बिछाकर
 
गूँजती है दूर से बन बांसुरी आवाज कोई
फिर बुलाती पास कोई गंध सुधियों में समोई
दृष्टि के बारादरी में एक उत्कंठा उभरती
किन्तु प्रतिमायें रही हैं जा क्षितिज के पार सोई
 
अटकलें उलझी हुई असमंजसों के दायरे में 
लग रहा है कोई चाहे थामना उंगली बढ़ाकर
 
प्यास के छींटे भिगोते चाहना को और बढ़ कर
अनमनापन और ज्यादा हो रहा प्रतिपल मचलकर
चित उछटता है निरन्तर साथ पल की धड़कनों के
दृष्टि टिकती है नहीं हर बिंदु  से गिरती फ़िसल कर
 
फिर उभरने को हुआ आतुर ह्रदय में भाव कोई
और फिर से रह गया मन यह  स्वयं में कसमसाकर
 
सुरमई नभ पर उभरते बादलों के चित्र जैसे
पत्तियों की सरसराहट बुन रही लगता संदेसे
रात की मुंडेर पर से चान्दनी की ले कमन्दें
कोई है आभास चढ़ता और गिरता आस पर से
 
दृष्टि  हो यायावरी हर इक दिशा को खटखटाती 
कोई पर देता नहीं पहचान द्वारे पर सजा कर 

लौ सिमट बातियों को रुलाती रही

 
 
सारिणी में समय की कहीं खो गई 
भावना, साध जिसको सजाती रही 
 
दोपहर  की पिघलती हुई धूप आ
याद के रंग मन पर नये ,मल गई
जीर्ण परदे से बादल के छनती हुई
कोई परछाईं आकर ह्रदय छल गई
अत्र कुशलम, तो हो अस्तु भी तत्र ही
रह गये सोचते जितने सम्बन्ध  थे
और हम फिर उलझ उस नियम में गये
जिसके कारण हुये मन के अनुबन्ध थे
 
सूर्य की हर किरण वक्र हो व्योम से
सिर्फ़ परछाईयाँ ही बनाती रही
 
सारे सन्देश उत्तर बिना खो गये
दृष्टि  लेकर गई जो कबूतर बनी
शब्द के,पृष्ठ के मध्य में यूँ लगा
और गहरी  हुई, जो हुई अनबनी
था अपरिचय घटा सावनी बन घिरा
और बरसा गया फ़िर से एकाकियत
ज़िन्दगी मौन ही मुस्कुराती रही
हम रहे पूछते क्या है उसकी नियत
 
प्रश्न बन जो ह्रदय से चली भावना
श्याम विवरों में जाकर समाती रही
 
आईने में खड़े अजनबी का पता
खोजते खोजते थक गई ये नजर
वृत्त जो अर्ध था प्रश्न के चिह्न का
बस उसीमें अटक रह गया हर सफ़र
बिन्दु लगने कहां थे-ये निश्चित हुआ
लग गये पर कहाँ, कुछ नियंत्रण नहीं
इसलिये नीड़ था जोकि कल सांझ का
आज गंतव्य बन कर रहा वो वहीं
 
तार टूटे हुए साज के में, सिमट
सरगमी भावना छटपटाती रही
 
मंच पर ज़िन्दगी के घटित हो रहा
क्या ,है क्या आयेगा ये पता है नहीं
कौन बन कर निदेशक इशारे करे
जान पाये न कल, न सकेंगे कभी
जो हुआ सो हुआ, और होना है जो
हो रहे, पत्थरों की लकीरें बना
और हम शेष साहस जुटाते रहें
ताके सम्भावितों का करें सामना 
 
मंदिरों में जले दीप सब बुझ गये
लौ सिमट बातियों को रुलाती रही

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में...