तो गीत ग़ज़ल कुछ सज जाए

कुछ उथल पुथल  में घिरा हुआ दिन तो हो जाता है तमाम
धीरे धीरे चलकर आती पतझड़ की बूढ़ी थकी शाम
सोचे है झोंका कोई हवा का आ अँगना बुहार  जाए 
तो  गीत ग़ज़ल कुछ सज जाए

रजनी के बिस्तर पर बिछती संध्या की धुली हुई चादर
पर निशा बदलती रहती है करवट पर करवट अकुलाकर
ताका करती हैं प्राची को कब उषा  उभर कर मुस्कानें।
फिर गीत ग़ज़ल कुछ सज जाए

आती है उषा ढके हुए मुख अपना गरम  रजाई  में
लिपटी रहाती है देर तलक इक सूरमाइ जुन्हाई  में
अक्सर सूरज के घोड़ों के उठने में क़दम लड़खड़ाए

क्या  गीत ग़ज़ल फिर  हो पाए

परिचय की परिधि में सिमटे कुछ मूसीकार सुखनवर भी
पर सबके अधरों पर छाई  इन दिनों  ढेर सी  ख़ामोशी
है इंतज़ार ये सन्नाटा, कल परसों शायद छँट जाए
फिर गीत ग़ज़ल कुछ हो जाए

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