याद की आज फिर से किताबे खुली

याद की आज फिर से किताबे खुली
सामने आ गई एक उजड़ी गली
जिसकी खिड़की के टूटे हुए कांच में
झाँकती चंद परछाइयां मनचली

हो परावर्तिता चित्र धुंधले दिखे
सामने खंडहर हो चुकी भीत पर
एक कंचा रहा धूल से झांकता
झुंड से गिर गया बाजियां जीत कर
सामने नीम पर शाख में झूलती
कुछ पतंगे लिए कट चुकी डोरियां
एक झोंका हवा का सु​नाता  हुआ
सरगमो में वो भूली हुई लोरियां

यों लगा झनझनाती हुई पैंजनी
फिर से पनघट से लौटी इधर को चली
सामने थी रही वो ही ​सूनी  गली

खेल का सामने वो ही मैदान था
जिसमे अक्सर कबड्डी के खेले हुए
गेंद की चोट खा बिखरी ​पंढरियाँ 
चूड़ियों और गुटको के मेले हुए
आज भी लग रहा उड़ रहीं गिल्लियां
छूके डंडे, किन्ही पाखियों की तरह
एक पल भी कभी होवे ​विश्राम  का
उन दिनों कोई इसकी नही थी वजह

जिस का सान्निध्य था बस समय के परे
चाहे राते घिरी या कि शामें ढली
सामने वस रही वो ही उजड़ी गली

नीम का पेड़ वो इक घनी छाँह का
जिसके नीचे कथाएँ गई थी बुनी
कोई आल्हा कहे छेड़ सारंगियाँ
कोई रामायणी के अधर से सुनी
आज भी उसके आँगन में दीपक रखा
और तुलसी के चौरे के अवशेष थे
पर सभी वे हुए गुम शहर में कहीं
इस तरफ़ आया करते जो दरवेश थे

कोशिशों में भुलाने की तल्लीन् है
आज के पल लुभाते हुए ये छली
भूलती ही नहीं आज भी वह गली


आज निकले गली के उसी मोड़ से
आ गए दूर कितने पता ना चला 
एक पल पार जो था किया एक दिन 
मार खा वक्त की शेष अब न रहा 
है शशोपंज क्या उसका सतीत्व भी 
है अभी तक बदलते हुए दौर में 
याद के पाखियों का बने नीड फिर 
लौट कर के कभी एक उस ठौर में 

जानते हैं असंभव है ये बात पर 
चाह तो उड़ती  फिर फिर वही को चली 
 भूलती ही नहीं  एक संकरी गली  ​

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