कितनी बार संजोई मुट्ठी में पर धूप

नयनों के गमलों में आशा बोती तो है फूल निशा दिन
लेकिन विधना की कूची से पंखुड़ियां छितरा जाती हैं

पुन: प्राथमिकता पाती हैं आवश्यकता फुलवारी की
और प्यास फिर रह जाती है बिना बुझी नन्ही क्यारी की
धड़कन से सिंचित बीजों का रुक जाता है पुन: अंकुरण
एक बार फिर, राख निगल लेती अंगड़ाई चिंगारी की

बुनते हुए नीड़ तिनकों से दिवस बरस में ढल जाते हैं
निमिष मात्र में आंधी की थिरकन उनको बिखरा जाती है

कितनी बार संजोई मुट्ठी में पर धूप न रहती कर में
आती उतर घटा मावस सी सावन भादों बिन ही घर में
जिसे बरसना था उपवन में वह आँखों में बरसा करती
और ओस की बूँद अटक कर ही रह जाती है अम्बर में

लगता है डर छूने से भी अभिलाषा की परछाई को
सहमी हुई भावना जाने क्यों रह रह सिहरा जाती है

रहता है अधिकार गंध पर अपनी ही, कितना चन्दन को
पट निर्धारित अब करते हैं समय प्रार्थना को वन्दन को
जिस कठपुतली के धागों का होता कोई और नियंत्रक
उसको क्या विकल्प होता है सिवा मौन रह अनुमोदन को

भ्रामक गल्प कथायें लगती हैं अनुकूल हवा की बातें
या फिर अग्निपरीक्षा् कुन्दन को अक्सर निखरा जाती है

3 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

रहता है अधिकार गंध पर अपनी ही, कितना चन्दन को

बड़ी गहरी अभिव्यक्ति।

News Punjabi said...

Rakesh Khandelwal ji bahut acchha likha mujhe kaafi pasand aya........
Christmas flowers

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत सुन्दर गीत ...

सूर्य फिर करने लगा है

रंग अरुणाई हुआ है सुरमये प्राची क्षितिज का रोशनी की दस्तकें सुन रात के डूबे सितारे राह ने भेजा निमंत्रण इक नई मंज़िल बनाकर नीड तत्प...