वहीं जाकर माना लेंगे

  चले ये सोच कर भारत, वहाँ छुट्टी मना लेंगे
पुरानी याद जो छूटी हैं गलियों में उठा लेंगे

वहाँ पर पाँव रखते ही नयन के स्वप्न सब टूटे
जो कल परसों की छवियाँ थी सभी इतिहास में खोई
कहीं दिखता न पअपनापन उमड़ती बेरुख़ी हर सू
नई इक सभ्यता के तरजुमे में हर ख़ुशी खोई

वो होली हो दिवाली हो , कहें हैप्पी मना लेंगे
मिलेंगे वहात्सेप्प संदेश तो आगे बढ़ा देंगे

कहीं भी गाँव क़सबे में ,न परचूनी दुकानों पर
खिलौने खाँड़ वाले साथ बचपन के ,नहीं दिखते
न  पूए हैं मलाई के ,न ताजा ही इमारती हैं
जिधर देखा मिठाई के चिने डिब्बे ही बस सजते

यहाँ जो मिल रहा उसको वहीं फ्रिज से उठा लेंगे
चलें मन हम ये दीवाली  जा अपने घर  मना लेंगे

हमारे पास हैं मूरत महा लक्ष्मी गजानन की
घिसेंगे सिल पे हम चंदन, सज़ा कर फूल अक्षत भी
बना लेंगे वहीं पूरी कचौड़ी और हम गुझिया
बुला कर इष्ट मित्रों को  मनेगी  अपनी दिवाली

पुरानी रीतियाँ को हम पुनः अपनी निभा लेंगे
उजालों के लिए मिट्टी के फिर दीये तलाशेंगे
पुराने बाक्स से लेकर उन्हें फिर से जला लेंगेवही

1 comment:

Udan Tashtari said...

वाकई अब तो तलाश ही सकते हैं मिलती नहीं सब कितना बदला सा है.. दीपावली मुबारक!!!

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