जाल सन्नाटे निरंतर बुन रहे हैं

सभ्यता के कौन से इस मोड़ पर है आ खड़े हम
बढ़ रही यूँ भीड़, काँधे हर कदम पर छिल रहे है
कान तो बंधक हमारे हेडफ़ोनो की जकड़ में
होंठ हैं चुप, जाल सन्नाटे निरंतर बुन रहे हैं

रीतियाँ अब संस्कृतियों की उपेक्षित हो रही हैं
रह गए सम्बंध सीमित कुंजियों की खटखटों पर
कोई भी त्योहार हो या पर्व हो वार्षिक दिवस का
आश्रित हो कर खड़े सब वहाट्सेप्प की चौखटों पर

खा चुके हैं ठोकरें जिन पत्थरों से राह में हम
पथ हमें फिर से दिखाने को उन्ही को चुन रहे हैं

अजनबियत की घटाए ओढ़ बैठी हैं दिशाएँ 
आइने के बिम्ब। ही पहचान में आते नहीं है
भोर की आ अलगानी पर बैठते जितने पखेरू
देखते हैं प्रश्न लेकर , कोई सुर गाते नहीं है

सोच बिन छीना हमीं ने कंठ स्वर कल पाखियों के
आज इनको मौन पाकर, हम सरों को धुन रहे हैं

उग रहे कितने प्रभंजन भेजते हम ही निमंत्रण
राह को झंझाएँ कितनी द्वार तक आकर। बुहारें
स्वार्थ की लिप्साओं में लिपटे हुए एकाक्षी हम
एक ही प्रतिबिम्ब अपना सिर्फ, दृश्यों में निहारें 

भेजती चेतावनी नित, भोर, संध्या और दुपहरी 
पर पलक को मूँद कर हम, कब कहाँ कुछ सुन रहे हैं 

1 comment:

Satish Saxena said...

वाह , बहुत खूब !

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