मातृ दिवस: नमन

आदि से अंत तक
शून्य से ब्रह्म तक
ज़िन्दगी के प्रथम स्वप्न से हो शुरू
आस की डोर में
सांझ में भोर में
तुम ही मेरी सखा, तुम ही मेरी गुरू

तुम ही आराध्य हो
तुम सहज साध्य हो
प्रेरणा धड़कनों के सफ़र की तुम्ही
पंथ सम्भाव्य में
मन के हर काव्य में
एक संकल्प लेकर बसी हो तुम्ही

दर्द की तुम दवा
पूर्व की तुम हवा
चिलचिलाती हुई धूप में छाँह हो
कष्ट की आह में
कंटकी राह में
तुम सहारे की फैली हुई बाँह हो

सॄष्टि आरंभ तुमसे
तुम्ही पर खतम
बस तुम्हारा ही विस्तार सातों गगन
एक तुम आरुणी
एक तुम वारुणी
एक तुम ही हवा एक तुम ही अगन

सॄष्टि की तुम सॄजक
प्यास को तुम चषक
मेरे अस्तित्व का तुम ही आधार हो
बिन तुम्हारे कभी
चन्द्रमा न रवि
है अकल्पित कहीं कोई संसार हो

हर धड़ी, एक क्षण
एक विस्तार, तॄण
जो भी है पास में, तुमने हमको दिया
किन्तु हम भूलते
दंभ में झूलते
साल में एक दिन याद तुमको किया

कैसी है ये सदी
कैसी है त्रासदी
भूल जाते हैं कारण हमारा है जो
हैं ॠणी अन्त तक
प्राण के पंथ पर
साँस हर एक माता तुम्हारी ही हो

9 comments:

mamta said...

मेरे अस्तित्व का तुम ही आधार हो

ये पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगी और इस एक पंक्ति मे ही सब कुछ आ जाता है।

Udan Tashtari said...

कैसी है ये सदी
कैसी है त्रासदी
भूल जाते हैं कारण हमारा है जो
हैं ॠणी अन्त तक
प्राण के पंथ पर
साँस हर एक माता तुम्हारी ही हो

---बहुत खूब, राकेश भाई. माँ को शत शत नमन, इस पावन दिवस पर. आपकी रचना पढ़ते माँ की याद में आंख भर आई.

sunita (shanoo) said...

राकेश जी,आपकी कविता ने आज आँखो को नम कर दिया है,..बहुत सुन्दर विचार है,...
हर धड़ी, एक क्षण
एक विस्तार, तॄण
जो भी है पास में, तुमने हमको दिया
किन्तु हम भूलते
दंभ में झूलते
साल में एक दिन याद तुमको किया
बहुत-बहुत बधाई,..माँ को भी मेरा शत-शत नमन ।
सुनीता(शानू)

Mired Mirage said...

सुन्दर कविता है । किन्तु जब भी हम माँ को याद करें तो यह भी याद रखें कि ये बच्चे ही माँ को माँ बनाते हैं । सो उन्हें मेरा नमन !
घुघूती बासूती

rachana said...

बहुत सुन्दर!!

परमजीत बाली said...

सुन्दर रचना है।

राकेश खंडेलवाल said...

माँ की आरती में आपके सम्मिलित होते हुए स्वर इसे और गौरवान्वित कर रहे हैं

मोहिन्दर कुमार said...

राकेश जी... आप की कविता ने सब कुछ कह दिया एक मां की महानता के बारे में... सच कहा आप ने... हमारा अस्तित्व मां के कारण ही है.. उसका कर्ज हम इस जीवन को दे कर भी नहीं चुका सकते...

Kavi Kulwant said...

बहुत खूब राकेश जी...देरी के लिए क्षमा..
कवि कुलवंत

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