आपकी ओढ़नी का सिरा चूम

शाख के पत्र सब नॄत्य करने लगे
पांखुरी पांखुरी साज बन कर बजी
क्यारियों में उमड़ती हुई गंध आ
रुक गई एक दुल्हन सरीखी सजी
पर्वतों के शिखर से उतर कर घटा
वादियों में नये गीत गाने लगी
आपकी ओढ़नी का सिरा चूम जब

एक झोंका हवा का हुआ मलयजी.

5 comments:

नीरज गोस्वामी said...

क्या बात है राकेश भाई....बहुत खूब....
नीरज

Udan Tashtari said...

Bahut sunder.

रचना said...

ek achchii abhivyakti

पंकज सुबीर said...

बधाई हो आपको इस रचना के लिये । अंधेरी रात का सूरज का पूरा कच्‍चा माल मेरे पास आ चुका है अब बस एक काम आप अवश्‍य करें कि आपकी एक तस्‍वीर जो कि हाई रेसोल्‍यूशन में हो कम से कम 300 डीपीआई की मुझे तुरंत मेल कर दें क्‍योंकि विज जी ने आपका फोटो शायद ब्‍लाग से उठा लिया है जो कि कम डीपीआई का होने के कारण उसके ग्रेन्‍स छपाई के दौरान फट जाऐंगे । कृपया अपनी तस्‍वीर जल्‍द भेजें ।

ललितमोहन त्रिवेदी said...

ओढ़नीको चूमकर आते मलयजी झोंके मुझे भी सराबोर कर गए हैं ! इस रेशमी एहसास की सुंदर अभिव्यक्ति के लिए बधाई !

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...