निद्रा के पल क्यों न बाँटे


तुम तो सोते रहे रात भर नींद चैन कीले खर्राटे
रही अनिद्रा प्रश्न उठाती, निद्रा के पल  क्यों न बाँटे
सप्त पदी की लगा दुहाईतुमने हर अधिकार जताया
तुमको जो कुछ लगा हाथ मेंसारा ही तुमने हथियाया
पाँच किलो रबड़ी खाने का जब जब मुझको मिला निमंत्रण
आधी घर पर लानी होगीवरना ! कह कह कर धमकाया
सारे फूल ले गईं चुन करछोड़े हैं मुझको बस काँटे
ये बतलाओ आधे आधेये सब क्यों न मुझसे बाँटे
मैं ग्वाला मथुरा का वासीकॄष्ण कन्हैया का आराधक
माखन मिश्री के मेरे भोगों में तुम बनती हो बाधक
सवामनी के जिजमानों ने भिजवाये जो भरे टोकरे
सब के सब डकार डाले हैं चुटकी भर भी लिया न पाचक
मैं कुछ कहता हूँ तो कहतीपड़े अकल पर मेरी भाटे
ये बतलाओ आधे आधे तुमने मुझसे क्यों न बाँटे
कितने दिन तक और सहूँ मैं कहो तुम्हारी तानाशाही
बीत चुके दस बरसऔर तुम अब भी करती हो मनचाही
रसगुल्लेचमचमकाजू की बरफ़ी सब ही छीन चुकी हो
कम से कम अब एक छोड़ दो मेरी खातिर बालूशाही
एक बार का सौदा करकेरोज उठाता हूँ मैं घाटे
ये बतलाओ आधे आधेतुमने मुझसे क्यों न बाँटे

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