अनजाने ही संवर गया है

आवाज़ों के प्रतिबिम्बों में जब जब भाव घुल गए मेरे
तब तब नया गीत  आ कोई अनजाने ही संवर गया है

मन के बुककेसों में रक्खी हुई किताबों ने खुल खुल कर
अक्सर ध्यान दिलाया मेरा रही अंनापढ़ी गाथाओं पर
और डायरी के पन्नों पर लिखे हुए वे छंद अधूरे
जिनका था आधार प्रीत में डूबी मादक संध्याओं पर

उनकी किसी पंक्ति ने जब भी मेरे अधर छुए हौले से
सरगम का सुर गीत समूचा बन कर तब तब निखर  गया है

यादों की पगडण्डी पर कुछ धूमिल से आकार् उभरते
प्रश्नचिह्न में ढलकर आँखों के पर्दो पर लहराते हैं
कौतूहल की ओढ़ दुशाला देते अनुभूति पर दस्तक
तो सहसा ही बिसरे सपने फिर संजीवित हो जाते है

उन सपनो का केंद्र बिंदु जब मन पोखर में हलचल करता
जलतरंग की कंपन में  तब गीत कोई आ बिखर गया है

जले प्रतीक्षाओं के दीपक नयनों की देहरी पर जब भी
अकुलाहट बिछ गई गली के जाकर के दोनों छोरो पर
बढ़ी और संभावनाये आ भुजबंधंन में सिहर सिहर कर
रुके भाव शब्दों में ढलकर आकर् अधरों की कोरो पर


फिसली है जब भी स्वर लहरी उन शब्दों की उंगली थामे
शब्दशिल्प इक नया गीत में तब आकर के उभर गया है

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