आज का din

चलो आज का दिन भी बीता

कुछ परिवर्तन हुआ नही था
जैसा कल था आज वही था
चित्र बना इक टंगा हुआ था

कल जैसे
आशा का घट फिर रहा आज भी रीता

रही ताकती डगर राह को
भूली भटकी एक निगाह को
साथ लिये इक बुझी चाह को 

रही प्रतीक्षा 
लिए आज फिर से वनवासिन सीता

वही धूप बीमार अलसती
नीरवता रह रह कर हंसती
पत्ती तक भी एक न हिलती

इतिहासों का
अंकित घटनाक्रम था फिर से जीता
चलो आज का दिन भी बीता


No comments:

जो ला​ई थी हवा उड़ाकर

आज वीथियों में गुलशन की चहलकदमियां करते करते  मिला एक कागज़ का टुकड़ा जो ला ​ई  थी हवा उड़ाकर  मैंने झुक कर उसे उठाया और ध्यान से उसको द...