शब्द अधर से परे रह गये

जितने भी थे शब्द अधर के गलियारे से परे रह गये
लहरों के सँग बहे नहीं सब दीप किनारे खड़े रह गये
 
सुर ने तो सरगम को भेजा सांझ सवेर स्नेह निमंत्रण
किन्तु हठी रागिनियों के था हुआ नहीं मन का परिवर्तन
बिना टिकट वाले पत्रों से, सब सन्देश लौट कर आये
सुर को सम्भव हो सका वह शब्द राग में बोकर गाये
 
ले सका नव पल्लव सूखी शाखा पर फिर से अँगड़ाई
एक बार जो फ़िसल गिरे वे पत्र झरे के झरे रह गये
 
अभिलाषित रह गया तिमिर के घने घिरे व्यूहों में बन्दी
गिरा लड़खड़ा भाव वही जिसने चाहा होना स्वच्छन्दी
बन्धी हुई माला के मनके एक एक कर सारे बिखरे
और व्याकरण नित्य कलम से कहती रही और मत लिख रे
 
उठे हाथ थे लिये कामना अक्षयता का वर पाने को
लेकिन आराधित के आगे सिर्फ़ जुड़े के जुड़े रह गये
 
रही तूलिका बंदी कर में छुअन कैनवास की पाई
रंगपट्ट को निगल चुकी है कोई धुंधली सी परछाई
चित्र नयन की दीवारों ने टांका नहीं एक भी अब तक
अंधियारे ने निगल रख लिया इन्द्रधनुष का पूरा सप्तक
 
शब्द , रंग, चित्र सभी ने रखी बढाये मन से दूरी
और फ्रेम में कोरे कागज़ ही बस केवल मढे रह गए

3 comments:

Udan Tashtari said...

अद्भुत!!वाह!!

Udan Tashtari said...

चित्र नयन की दीवारों ने टांका नहीं एक भी अब तक
अंधियारे ने निगल रख लिया इन्द्रधनुष का पूरा सप्तक



-वाह!!

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत सुन्दर भाव..

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...