कब संभव है

आशाओं के अवशेषों से सजे हुए खँडहर के वासी
कब संभव है चन्द्रमहल के जा कर द्वारों को छू आयें

घिस घिस कर हाथों की धुंधली होने लग जाए रेखाएं
दिन उगते ही रातों के हाथों की कठपुतली हो जाएँ
कंगूरों पर जा कर अटकीं अभिलाषा की चढ़ती  बेलें
पलक झपकते हरी दूब की अंकशायिनी आ बन जाएँ
 
जब नाविक की पतवारें ही ले जायें मंझधार नाव को
तब कब संभव थके पथिक के पांव नीड़  को छूने पायें
 
जब सूरज का रथ रातों के जंगल में जाकर के खोये
माली खुद गुलाब की क्यारी में लाकर बबूल को बोये
सगर वंशजों की विनती पर अम्बर से उतरी धारायें
भूल अपेक्षित, बहती गंगा में अपने हाथों को धोयें
 
जिन होठों पर चढ़ते चढ़ते शब्द स्वयं ताले जड़ता हो
उन अधरों पर कब संभव है गीत नये आकर सज पायें
 
कान्हा के कर की बांसुरिया अपनी ही सरगम को निगले
आगत के पृष्ठों पर अंकित हो जायें आकर सब पिछले
विक्रेता बन कर मेले में लिये खोमचा जाने वाला
क्रेता के हाथों अपने सौदे के सँग सँग खुद भी बिक ले
 
तब कब संभव अंगारों  के पथ पर चलती हुई मोम की
गुड़ियायें अपना पूरा कद, पहले के जैसा रख पायें

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