निशा दिवस मैं खोज रहा हूँ

ओ शतरूपे एक तुम्हारी चुप ने कितने प्रश्न उठाए
उनके उत्तर बीजगणित में निशा दिवस मैं खोज रहा हूँ

रहे प्रश्न प्रत्यक्ष, न​हीं है मुश्किल उनके ​ उत्तर देना
बिना किए प्रश्नों के उत्तर होते शत सहस्त्र सम्भावित
असमंजस के गहरे साये घेरे रहते हैं मानस को
जोड़ गुणा के समीकरण में हो न सके कु​छ  भी अनुमानित

नए सूत्र अन्वेषित करता, अंकगणित के विस्तारों में
कोई भी निष्कर्ष न निकला कितनी करता शोध रहा हूँ

कमल लोचने, नयन भंगिमा कितने चक्रव्यूह रच देती
वृत्त,धुरी में,पंखरियों में कितने प्रश्न समाहित होते
अभिमन्यु मन कोशिश करते करते आख़िर थक जाता है
लेकिन जाल बिछे प्रश्नो के, ​ले​श मात्र भी सुलझ न पाते

शतरंजी खानों में होती गुणित विषमताएँ प्रश्नो की
समझ सकूँगा उत्तर का कुछ अता पता भी, सोच रहा हूँ

बिना शब्द की ऊँगली थामे तुमने कितने प्रश्न ​किये हैं ​
दृष्टि वितान मेरा है असफल नापे इनकी सीमा रेखा
जब तक पहला प्रश्न समझ पाने की मैं कोशिश कर पाऊँ
नभ के तारों की संख्या को करते पार इन्हें है देखा

आत्मसमर्पण करता हूँ में सहज तुम्हारे प्रश्नो पर ​बस 
उत्तर दो अब तुम ही इनका, मैं यह कर अनुरोध रहा हूँ

लकीरें रह गई

भाग्य जिसको सोचते थे एक दिन
सामने होकर खड़ा मुसकाएगा
कट गई ये ज़िंदगी करते प्रतीक्षा
हाथ में धुँधली लकीरें रह गई

दिन उगा फिर ढल गया फिर से उगा
मौसमों के साथ ऋतुएँ थी गई
तय रहा। चलना हवा,  तो चली
आएगी झंझाएँ, पुरबा कह गई

चक्रवातों से घिरे चलते रहे
लड़खड़ाते पाँव थे, दुर्गम डगर
पंथ में​ ​विश्रांति की सारी जगह
तेज़ आँधी में समूची ढह ग़ैर

जन्मकुंडली को बना पंडित कहे
हर दिशा, नक्षत्र हर अनुकूल है
साथ चलते बुध, मंगल शुक्र यूँ
फूल में बदले मिले जो शूल है

पर न जाने क्या हुआ, पग जब उठे
राह सम्मुख आइ थी काँटों भरि
पास के पाथेय की थैली भरी
झाड़ियों में थी उलझ कर क्षय गई

उम्रभर वयसंधियों के मोड़ पर
थी मिली फिसलन भरी  ही घाटियाँ
दूर तक कोई सहारा था नहीं
मंज़िलें थी बिन पते की पातियाँ

दृष्टि से ओझल रहा था भाग्यफल
“कुछ नहीं मिलता परिश्रम के बिना
पंडितों ने जो कहा, वह झूठ है”
शाख़ पर आ एक चिड़िया कह गई

हाथ में धुँधली लकीरें रह गई

रिश्ता मेरा और तुम्हारा

तुमने मुझसे पूछा क्या है रिश्ता मेरा और तुम्हारा
मुश्किल हुआ शब्द दे पायें तुमको इसका उत्तर सारा

फूलों का गंधो से जो है, नदिया का बहते पानी से
तट से जो नाता सिकता का, पत्तों का है शाखाओं से
तुमसे मेरा रिश्ता प्रियवर कुछ ऐसा ही सम्बंधित है
किसी तपस्वी का ज्यों तप से या यज्ञों का समिधाओं से

आरति से ज्यों बँधा हुआ है मंत्रों का स्वर गया उचारा
सच कहता हूँ मीत यही है रिश्ता मेरा और तुम्हारा

पूनम की रातों का रिश्ता  बिखरी हुई ज्योत्सनाओं से
जुड़ी हुई वल्गायें सूरज के रथ की ज्यों खिली धूप से
उद्यापन का नैवेद्यों से और समर्पण से जो रिश्ता
रिश्ता तुमसे मेरा ऐसे बौद्ध मठों का ज्योंकि स्तूप से

साहूकार से समबन्धित ज्यों कर्जदार के घर का द्वारा
वैसे ही तो है शतरूपे रिश्ता मेरा और तुम्हारा

कलासाधिके ! हर रिश्ता कब परिभाषित होने पाया है  
मेरा और तुम्हारा रिश्ता- छंदों का रिश्ता गीतों से  
मंदिर से जो गंगाजल का, मदिरा का जो पैमाने से 
रिश्ता मेरा और तुम्हारा,संस्कृतियों का जो रीतों से 

नीरजनयने असफ़ा रहे ग्रंथ जिसका उत्तर देने में
उसी प्रश्न में गूँथा हुआ है रिश्ता मेरा और तुम्हारा 

राकेश खंडेलवाल 

धूप से उठ के दूर



ओ मेरे आवारा मन चल  धूप से उठ के दूर कहीं पर 
इसमें शेष उजास नहीं है केवल है अंधियारा  बाक़ी

हर इक बार उगा है सूरज नए नए आश्वासन लेकर 

ओढ़ सकेंगी नई सुबह मेंसिर पर कलियाँ शाल सुनहरी 
चीर कुहासे और धुंध को कोसरसेगा मतवाला मौसम
खोलेगी नवीन सम्वत् के द्वार गुनगुनी हुई दुपहरी 

लेकिन जागी नई भोर जबआँख मसलते ले अँगड़ाई
उसमें केवल तिमिर घुला थानहीं सुनहरा रंग ज़रा भी 

निश्चय तो था हुआ व्योम से अंशुमान  जब धूप बिखेरे
हर इक कोना रहे प्रकाशित इक समान ही हर कण कण में 
लेकिन चल कर आसमान से धूप रुक गई कँगूरों पर
एक किरण भी उतर न चमकी कोहरे में लिपटे आँगन में 

रहे ताकते चित्र धूप के जो बरसों से  गये  दिखाए
किंतु न बंधी गठरिया अब तक एक बार जो खुली निशा की 

नहीं आज की तथाकथित यह धूप नहीं गुण रूप धूप का
चन्दा के इकतरफा रुख सीएक ओर  ही रही प्रकाशित 
चढ़ बैठी बादल की छत पर  नहीं उतरती आ गलियों में
इससे करना कोई अपेक्षा बिलकुल नहीं रहा सम्भावित

घुटती है आशाए तम से भरे हुये सीले तलघर में 
कहें धूप से उठ के दूर चली जा चाहत नहीं प्रभा की 

घिरता है अंधियारा







उषा की डोली के संग संग घिरता है अँधियारा 
संध्या तक बेचारा सूरज फिरता मारा मारा 

किससे करे शिकायत, सत्ताधीश हुए हैं बहरे 
राजमहल के राजमार्ग पर लगे हुए हैं पहरे 
आश्वासन के मेघ बरसते, बिन पल भर डैम साढ़े 
और कुमकुमे सारे ही उनके बंगलों में ठहरे 

बरस बीतने पर बदले ऋतु , आशा दिए सहारा 
अभी आजकल दोपहरी में भी घिरता अँधियारा 

राजनीति के दांव पेंच में सत्य नकारा जाता 
बढ़ाते विश्व तापक्रम को भी अब झुठलाया जाता 
घिरते हुए प्रभंजन, चक्रवात  एवं अति वृष्टि 
प्राकृतिक विपदाएं  कह  कह कर समझाया जाता 

आने वाली पीढ़ी की किस्मत मेम है जल खारा 
उनकी जन्मकुंडली पर यों घिरता है अंधियारा 

बरसो बीते राह जोहते भोर नई कल आए 
मेघाच्छादित अम्बर में सूरज किरणें बिखराए
दर्पण पर जम गई धूल को पौंछे आ पूरबाइ
देश विदेश भटकता कोई घर वापिस आ जाए

किंतु बुझा हर दीप आस का स्नेह चूक गया सारा
शंनैः: शनै: हर एक दिशा में घिरता ही अंधियारा 






पत्थरों पर गीत लिखे

पत्थरों पर गीत लिक्खे आज तक जो शिल्पियों ने
है तुम्हारे रूप की आराधना का एक उपक्रम

बन गए है ताज कितने रंग गई कितनी अजंता
और फिर कोणार्क ने कितनी सुनाई है कहानी
शिल्प खजूराइ निरंतर गढ़ रहा प्रतिमाएँ जितनी
रूप के सागर,कथा के एक पन्ने की निशानी

कर समाहित शब्दकोशों की सभी उपमाए लिखा
किंतु कर पाए नहीं इक अंश का भी पूर्ण वर्णन

गीत लिक्खे पत्थरों पे रच अहल्याए युगों ने
शिल्प ने बन राम की पदरज उन्हें आकर सँवारा
वह तनिक संशोधनों का ही परस था गीत तन को
संतुलित कर मात्राएँगेयता को था निखरा

लिख रही है जान्हवी जो घाट पर वाराणसी के
रूप के शत लक्ष जो आयाम उन से एक वंदन 

पत्थरों पर गीत लिक्खे जो समय की करवटों ने 
वे अमिट हैं लेख संस्कृति के शिलाओं पर थिरकते 
जल प्रपातों ने कलम बन कर लिखे हैं घाटियों में
वे सुबह से साँझ तक गाती हुई धुन में संवरते 

शब्द शिल्पी ! आज जब तुम हाथ में थामो कलम तो 
इस तरह लिखना रहे इतिहास में बन शैल अंकन 

धूप की अनगिन शिखाएं



रात का श्रृंगार करती चाँद की उजली विभाएँ 
और दिन को आ सजाती धूप की अनगिन शिखाएं 

फागुनी रसगन्ध में डूबी हुई हर इक दिशा है 
चेतिया धुन में हवाएं लग रही हैं गीत गाने 
मोरपंखी साध छेड़े सांस में शहनाईयो  को 
लग रहीं हैं धड़कनों पर पैंजनी अब गुनगुनाने 

मौसमी इन करवटों पर आओ सुधबुध भूल जाएँ 
कर रहीं श्रृंगार दिन का धूप की अनगिन शिखाएं 

खेत की पगडंडियों पर फिर लगी चूनर लहरने
दृष्टि के आकाश पर आकर बिछी चादर बसंती
झूमती अंगनाइयों के संग पनघट पर उमंगें
भावनाओं की गली में प्रीत की बंसी सरसती

कल तलक निर्जनसजीं हैं दुल्हनों सी आज राहें 
और दिन को रँग रही हैं धूप की अनगिन शिखाएँ 

लग गई हैं कोंपलें शाखाओं पर फिर सुगबुगाने 
भोर को देते निमंत्रण आ पखेरू चहचहाते 
चल पड़े निर्झर बिछौना छोड़  कर गिरिश्रृंग वाला
और  लहरों पर बिखरते मांझियों के बोले गाते 

जो बिखेरे रंग इन्द्रधनुषीदिशाओं में प्रक्रुति ने
हम उन्हीं में डूब कर नूतन उमंगों को सजायें

अपने बियावान सन्नाटे


तुमको, मुझको, सब को  घेरे अपने बियावान सन्नाटे
दूर दूर तक पत्ता तक भी हिलता नजर  नहीं आता है

उगी भोर से संध्या के ढलने तक बढ़ती आपाधापी
बाहर भीड़ें छील रही है राहों पर चलते कांधो को
अधरों पर चिपकी मुस्कानों के परदे से झाँके कुंठा
और विषमताए गहराती है मन पर छाये अवसादों को

बुझी आस पर मौन कलपती टूटे सपनो की बाँसुरिया
कोई सिसकी का स्वर भी तो आकर नहीं सँवर पाता ही

आवारा राहों पर ख़ुद को छलते छलते चलते है सब
ज्ञात भले है सारी राहें एक वृत्त में बँधी हुई है
दिशाहीन गंतव्य हीन बस गतिमय रहना ही निश्चित है
कठपुतले हैं, डोर न जाने किन हाथों में सधी हुई है

चाहत एक लुभाती प्रतिपल  एक अदेखी उस मंज़िल की
जिसका ज़िक्र नहीं दरवेशो से भी कोई सुन पता है

लौटी वापस सूनी नज़रें द्वार खटखटा दिशा दिशा के
कोई चेहरा नहीं जड़ी हो जिस पर चिप्पी पहचानो की
तथाकथित परिचय की सीमा, है मरीचिका अपनेपन की
अर्थहीनता बतलाती है कृत्रिमतायें मुस्कानों की

शायद कल का सूरज कोई परिवर्तन का अवसार लाए
इसी आस को ढोते ढोते पूरा समय गुज़र जात। है

बसंत ऋतु

जो बसन्ती चादरों का स्वप्न था
बर्फ़ की इस शुभ्रता में खो गया
आपने दे दी शिशिर को जो विदा
आ यहाँ उसका बसेरा हो गया
राह पर, पगडंडिय्पं-दालान में
है असंभव पां टिक पायें कहीं
शून्य से जब अंश नीचे दस गिरा
तापमापी यंत्र हो चुप रह गया. 

और हम पंचांग में अंकित रहे 
पंचमी के ज़िक्र को पढ़ते रहे 

शारदे के हाथ से वीणा मिली 
उंगलियां झंकार लें, असफल रही  
हाथ को जकड़े शिथिलतायेँ रहीं 
कोई अक्षर लिख नहीं पाए कहीं 
देह पर  तह बन रहे अटके कई 
कोट,स्वेटर और मफलर टोपियां 
ओढ़ कर हस्त्राण भी, ठिठुरा करी 
कंपकंपाती हाथ की सब उंगलियां 

है बसन्ती ऋतु कलेण्डर कह रहा 
दिन मगर सब शीत में जकड़े रहे 

नील अम्बर बादलों में खो गया
बूँद गिरते भूमि पर जमती रही
पीत आभा फूल कलियों की गुमी
बर्फ़ की तह के  तले जमती रही 
सूर्य रथ की है तितर वल्गाएँ सब
 भूल प्राची की प्रतीची की दिशा 
देख नभ को जानना सम्भव नहीं 
नाम मौसम का ,समझ पाना पता

और मौसम की ठिठोली देखते 
दाँत में बस उँगलियंधरते rahe

सूरज की छवियाँ दिखलाने


जो कल तक छलते थे हमको सपनो के आश्वासं देकर
आए है इस बार हमें वे सूरज की छवियाँ दिखलाने

वायदों की कजराई  ने थे रोज  साँझ नयनों में आँजे
देते हुए  दिलासा उगती हुई भोर में सच हो लेंगे
किन्तु भोर की प्रथम रश्मि के आते आते हुए तिरोहित
संभव रहा नहीं फिर वे इक अंश मात्र भी शिल्पित फोगे

कितने बरस बीतते आये, एक इसी धुन को दोहराते
वे आये हैं उन्ही धुनों को नए राग में फिर सिखलाने

ढलते हुए और नव उदिता सूरज की छवियों का अंतर
कब कर पाई है अभाव की ऎनक के पीछे से नज़रें
इश्क़ मोहब्बत की ग़ज़लों की हों या बासी अख़बारों की
तरसी हुई आस को लगती एक सरीखी सारी सतरें

महीने भर के रोजे रख कर जो आतुर है इफ़्तारी को
वे लाए है उसको मीनू अगले महीने  का समझाने

सूरज की छवियाँ बदली कब, बदले मौसम की करवट से
नयनी की मरीचिकाओं ने ही हर बार रखा भरमाकर
रंग रश्मियों ने तो बदला नहीं कभी भी ऋतु हो कोई
कुछ रंगीन काँच के टुकड़े भ्रमित करें उनको छितराकर

उतर चुकी है चढ़ी कलाई की एक एक कर सारी परतें
वे लाये हैं  खोटे सिक्के एक बार फिर  यहाँ भुनाने

नव वर्ष २०२४

नववर्ष 2024  दो हज़ार चौबीस वर्ष की नई भोर का स्वागत करने खोल रही है निशा खिड़कियाँ प्राची की अब धीरे धीरे  अगवानी का थाल सजाकर चंदन डीप जला...