2021 नव वर्ष ( गीत कलश पर ९०१वीं प्रस्तुति )

 


आशाओं के नए सूर्य को अब दिशिबोध लिखें
नई नीति के संकल्पों का हम संबोध लिखें

बीता बरस साथ लाया था पृष्ठ सियाही के
जो था लेखा जोखा सारा अंधकार में खोया
दिन की धूप चुरा ले जाती रही, भरी दोपहरी
और रात का एकाकीपन रिस नयनों से रोया
उगी भोर हाथों में लेकर प्रश्नपत्र थी भटकी
कोई सुलझा सकने वाला उसको मिला नहीं था
संध्या घर लौटी राहों में पूरा दिवस गँवा कर
रीता हाथों का कासा आख़िर तक  भी रीता  था

नव आशा​ ​के दीप जला अगवानी को थाली में
बिखरे कल के कलुषों   का मिल कर प्रतिरोध लिखें

गया बरस बीता उजाड़ कर सपनों की फ़सलो को
बड़े चाव से जो साधों ने आँखो में बोई थी 
आगे बढ़ते हुए कदम पीछे को वापिस लौटे 
बिछी सामने राह स्वयं में ही जैसे खोई थी 
पीछे छोड़ा जिसे हुआ वो घर भी अब अनजाना 
रिश्ते फिर से जुड़े नहीं सब परिचित चहरे खोये 
चुगता रहा वक्त का पाखी अपने पर फैलाकर 
बीज दिलासों के जितने भी मन ने मन में बोये 

कोरा नया कैनवास अब यह नया वर्ष लाया है 
आओ हम तुम मिल कर इस पार्ट नव अनुरोध लिखें 

स्वस्ति मंत्र अधरों पर लेकर हम सब करें प्रतीक्षा
अभिलाषाएँ नवल अल्पना से रच दें दहलीज़ें 
मानचित्र से गए वर्ष के सब पदचिह्न मिटाकर
नए पंथ अब चित्रित कर दे पौष कृष्ण की तीजें
नई आस के नव स्वप्नों में इंद्रधनुष की आभें
भर कर, सुरमा करके अपनी आँखों में फिर आँजें
उगते हुए दिवस की अरुणाई से सुबह संवारें
और सिंदूरी चूनर से सज्जित कर रख लें साँचें

कुंठा, क्षोभ, हताशा,हतप्रभता को आज भुलाकर
नए पृष्ठ पर नई उमंगों का नव शोध लिखें 

सपनों का अपराध नहीं है

 

अपनी झोली में बगिया के शब्द सुमन तो चुन न पाया 
लेकिन चाहा लिखा कथानक चर्चित हो, मंचित हो जाना 

सपनों का अपराध नहीं है जिन्हें आँजती आँखें दिन में 
दोषी है मन, महल बनाता रखकर नींवें बही हवा की 
आगत की मरीचिकाओं के भ्रम में डूबा बिखरा देता 
वर्त्तमान के मरुथल में जो छागल भरी हुई है आधी 

पहली सीढी पर पग रखने का विश्वास संजो ना पाया 
चाहे एक साथ ही पल में चार पांच मंज़िल चढ़ जाना 

चढ़ती हुई रात का हो या सपना उगती हुई भोर का
सपना तो अभियुक्त नहीं, वादी प्रतिवादी अवचेतन ही
आकांक्षाओं के व्यूहों में घिर कर रहता साँझ सकारे
औ यथार्थ के दर्पण में छवि देख नहीं पाता अपनी भी 

सीखा नहीं राह से गुज़रे हुए पंथियों के अनुभव से 
लेकिन चाहे जीवन पथ की हर उलझी गुत्थी सुलझाना 

चुटकी भर शब्दों की चाहत कोई विशद ग्रंथ हो जाना 
रहे व्याकरण से अनजाने संज्ञा क्या है और क्रिया क्या
क्या सम्भव है परिणति उनकी,किसने देखे नयन संजोए
जिन सपनों को कोई परिचय अपना भी मिल नहीं सका था 

सावन के मेघों से आते रहे नयन में उमड़ उमड़ कर
सपनों का अपराध नहीं है उनका छिन्न भिन्न हो जाना 

प्राण न होते कभी प्रतिष्ठित

अक्षत चन्दन धूप जलाकर, किसे पूजता है अनुरागी 
हर सिन्दूर पुते पत्थर में प्राण न होते कभी प्रतिष्ठित 

अपनी जगा आस्था तूने जिस मंदिर के द्वार बुहारे 
सीढ़ी सीढ़ी  से कंकर चुन पांखुरियों से राह सजाई 
कलश आस्थाओं के भर कर सींची थी जिस की फुलवारी 
संध्या में अपराह्न भोर में स्तुतियाँ और  आरतियां गाई 

उस मंदिर की खंडित प्रतिमा, व्यर्थ चढ़ाता रहा सुमन तू 
बधिर मूर्तियों पर कब होते स्वर कंठों के जाकर गुंजित 

जो मूरत  आधार शिला को स्वयं ढहाती कब पूजती है 
उसकी नियति नहीं बन पाए वह आराध्य किसी साधक का 
टूट चुके गुम्बद के साये से निहारता सूने पथ को 
शायद इधर कोई आ जाए अपने पथ से भूला भटका 

लेकिन मुरझाये फूलों को चुनता नहीं कोई पूजन को 
अभिलाषाएं बन मरीचिका होती रहें नयन में अंकित 

सिंहासन पर बैठ सोचता जो हर कोई उसको पूजे 
उसे जगह कब मिल पाती हैं कल परसों के इतिहासों में 
उसको तो नकार देते हैं याचक के फैले कासे भी 
अनुनय कितना करे, नाम भी शेष नहीं रहता साँसों में 

पाकर के नैराश्य, जलाना आशादीप नियति जीवन की 
देव गिर गया जो नजरों ने ,फिर से न हो पाता पूजित .  

पुरखों के देवालय में

 दुविधाओं में घिरा हुआ मन चाहे  वहीं लौटना फिर फिर

जहाँ शांति मिलती आइ है उस पुरखों के देवालय में 


बदले हुए समय की गतियाँ ,बदलें  नित्य प्राथमिकताएँ

पंथ स्वयं ही कदम कदम पर अवरोधों के फ़न फैलाए

मंज़िल के मोड़ों से पहले दिशा बदलती रही दिशा भी

भटकावों के चक्रव्यूह का बिंदु कौन गंतव्य बनाएँ


ऊहापोहों में जकड़ा हर निश्चय हुआ अनिश्चय चाहे

निर्देशन जो जीवन दे दे सच को जीने के आशय में


रहे उगाते नभ की अंगनाई में सूरज चाँद सितारे 

पुष्प पाटलों से सज्जित कर रखे सदा ही देहरी द्वारे 

जो था रहा कल्पनाओं के परे  उसी को वर्त्तमान कह

अपने को अपने ही भ्रम में उलझाते थे साँझ सकारे 


असमंजस में घिरे हुए हम कोशिश में है भूले अपनी

भूले, हर ढलती संध्या को जाकर के इक मदिरालय में 


नित्य छला करते हम अपने स्वयं प्रतिष्ठित विश्वासों को 

दिवा स्वप्न से कर देते हैं अपने संचित अहसासों को 

बसंती मनुहारों को हम ओढ़ा कर पतझर की चूनर

मन के स्पंदन में बोते  हैं टूट टूट बिखरी  साँसों को 


फिर से जीवन जीने का क्रम समझ सकें हम, इसीलिए ही

उगी भोर के साथ निकल कर जाते है फिर विद्यालय में 



21 November 2020



समय की तीव्र गति में चन्द पल वे रह गये थम कर
सिमट कर आये थे तुम जिस घड़ी भुजपाश में मेरे
 
बजे जब वायलिन कोई नदी के मौन से तट पर
सुरों की सरगमों के साथ लहरें नृत्य करती हौं
बुढ़ाई सांझ की धुंधला गई सी एनकों पर से
लड़ी सी जुगनुओं की यों लगे बुझती दमकती है
 
तुम्हारा नाम ही बस तैरता है वाटिकाओं में
कहीं पर दूर लगता बांसुरी धुन कोई है टेरे
 
लिखे हों श्याम पृष्ठों पर गगन के दूधिया अक्षर
उन्हीं में हैं अनुस्युत पत्र जो तुम लिख नहीं पाये
परस ने ओस के छेड़ी जो सिहरन पुष्प पाटल पर
उसी में गूँजते हैं गीत  हमने साथ जो गाये
 
धन्क के रंग में अंकित सपन समवेत नयनों के
हवा की गंध को रहते हमारे साये ही घेरे


शरद योवन की सीढ़ी पर प्रथम पग रख रहा उस पल
पिघल करचाँदनी टपकी निशा की शुभ्र चूनर से
स्वयं आकर टंके थे फूल नभ के ओढ़नी में आ
चमक  चंदा चुराता था तुम्हारे कर्ण झूमर से

हुआ है पंथ जो यह उननचालिस मीलों का
मेरी सुधियों में लेते हैं वही पगचिह्न। बस फेरे 

दिवाली २०२०

 


एक अदेखे भय से जकड़ी हुई गली से पगडंडी 
हर चौराहे पर हर दिशि में लटकी हुई लाल झंडी 
पग झिझक करते हैं करने पार द्वार को देहरी को 
होता है प्रतीत मोड़ों के पार खड़ी आकर चण्डी 
बीते हुए बरस आँखों में आने दूभर होते हैं 
आँखो पर दस्तक देते हैं सपने बीती चुके कल के 
“दीवाली पर जगमग जगमग जब सारे घर होते थे 

रही थरथराती दीपों में प्रज्ज्वलित हुई वर्तिकाएँ
क्या जाने किस खुली डगर से आएँ उमड़ी झंझाएँ
खील बताशे खाँड़ खिलौने बाज़ारों में नहीं दिखे
हलवाई की दूक़ानों पर गिफ़्ट बाकस भी नहीं चिने
होंठों तक आते आते शुभ के स्वर पत्थर होते हैं 
गल्प समझते हैं बच्चे भी सिमट रह गए कैमरों में
दीवाली पर जगमग जगमग जब सारे घर होते थे 

बुझी हुई आशाओं के सारे ही स्पंदन रुके लगे 
लेकिन फिर भी मन की अंगनाएँ में। इक विश्वास जगे
तिमिर हटाने को काफ़ी है एक दीप की जाली शिखा
एक किरण से दीपित होती है कोहरे में घिरी दिशा
 यही आस्था लिए आज हम गति को तत्पर होते हैं
खींचें स्याह कैनवस पर हम चित्र आज वे बहुरंगी
दीवाली पर जगमग जगमग जब सारे घर होते हैं 

हुई थी बात जब तुम से


हुई थी बात जब तुम से हुई ऐसी कई बातें 
अभी भी याद हैं मुझको वे संध्या में घिरी रातें

हवा के एक झोंके ने छुए कुंतल तुम्हारे थे 
उतर कर आ गए नीचे क्षितिज पर से सितारे थे 
विभा की ओढ़नी थामे मचलती थी गगन गंगा 
अधर के शब्द भावों में नयन ने तब उचारे थे 

सुधी के पाटलों पर हैं  वही अंकित मुलाक़ातें 
हुई थी बात जब तुम से हुई अक्सर नई बातें

सिमट आया निकट आकाश का नीलभ आमंत्रण
खिले मधुमास  में सहसा हुआ अनजान परिवर्तन
अकेलापन चला लेकर उसी नादिया किनारे पर 
जहाँ हमने किया था प्रीति का अनमोल गठबंधन 

मधुर स्मृति की निधि हैं वे मिली उस रोज़ सौग़ातें 
हुई थी बात जब तुमसे हुई थी ना नई बातें 

अभावों के क्षणों में क़ैद हैं हम आज अर्थों बिन
बने नयनों के सपने हैं वही खर्चे हुए पल छिन
हुए हम आज यायावर उमड़ती धुँध के सहचर 
मगर जीते हैं अब भी वे कटे थे साथ अपने दिन 

सजी हैं आज उन बातों के फूलों की ही बारातें 
हुई थी जब कभी तुमसे, हुई थी बस वही बातें 


*उसमें तेरा राम नहीं है*


अरे उपासक रोली चंदन लेकर जिसको सजा रहा ह

प्रतिमा एक सुशिल्पित है पर उसमें तेरा राम नहीं है!


राम एक विस्तार परे जो किसी कल्पना की सीमा के

राम एक दर्शन है जिससे जन्म लिया है संस्कृतियों ने 

राम एक अध्याय अनवरतसिमट नहीं पाया ग्रंथों में 

वर्णित हो न सका कितने ही यत्न किए युग के कवियों ने!


वाल्मीकि से ले तुलसी तक और गुप्त ने शब्द सँवारे

लेकिन शब्दों की सीमा में बँधने वाला राम नहीं है!


राम एक अध्यात्म समूचा आदि रहित हैअंत रहित है 

पुष्प वाटिका के प्रांगण मेंरूप प्रेम में डूबा लेखन

राम गूढ़ता है अवगुंठितराम एक अनुभूति सहज सी

राम भेजता वन महिषी  कोमौन हृदय का अंतर्वेदन!


तुझ में रामराम में तू हैउसका इंगित तेरा उपक्रम

कोई क्रिया नहीं उत्प्रेरक जिसका होता राम नहीं है!


जीवन की पहली धड़कन सेसाँसों की गति के अंतिम पल

समय सिंधुकी लहर-लहर पर अंकित है बस नाम एक ही

हर बोली मेंहर भाषा में  जन जन के मन का सम्बोधन 

कंठ स्वरों से मुखरित होता आया है बस राम एक ही 


करे प्रतिष्ठित मर्यादाएँकर्मवीर जो वचनबद्ध  हो

हर इक युग में प्रतिमानों से सज्जित होताराम वही है!


क्षणिक दो घड़ी के लिए जग तमाशा

किसी धुँध में तू उलझता रहा है
नज़र के लिए सामने रख छलावा
दिवास्वप्न की थाम रंगीन डोरी
रहा डूबता जब भी उतरा ज़रा सा

अरे वावले सत्य पहचान ले अब
क्षणिक दो घड़ी के लिए जग तमाशा

यहाँ जो है तेरा, तेरी अस्मिता है
सिवा उसके पूँजी कोई भी नहीं है
जो है सिर्फ़ तेरा ही इक दायरा है
परे जिसके कुछ भी तो तेरा नहीं है

कोई साथ तेरे महज़ एक भ्रम है
न दे  खुद को कोई भी झूठा दिलासा

यहाँ एक शातिर मदारी समय का
दिखाता है पल पल नया ही अज़ूबा
कभी एक पल जो नज़र ठहरती है
उभरता वहीं पर कोई दृश्य दूजा

यहाँ बिम्ब संवरे नहीं दर्पणो में
जो दिखता है वो ही  दिखे है धुआँसा

चली रोज झंझा नई  इक उमड़ कर
उठे हर कदम पर हजारों बगूड़े 
दिशाएँ बुलाती उमड़ती घटाएं
हुए फेनिली हर लहार के झकोरे

दिवास्वप्न से दूर कर ले नयन को
हटेगा तभी ये घिरा जो कुहासा



लिखने का कोई अर्थ नहीं होता है



काव्य पंथ पर लम्बी दौड़ लगाने के अभिलाषी, सुन ले
केवल लिखने की ख़ातिर लिखने का अर्थ नहीं होता है 

मन के भावों की क्यारी में  अनुभूति जब बो देती है
बड़े जतन से बीज और फिर देखभाल कर उन्हें सींचती
तब ही तो फूटा करते हैं अर्थ लिए रचना के अंकुर 
अभिव्यक्ति की सीमा तब ही कोई नया आयाम खींचती 

चारण सा व्यवहार भले ही उलट फेर कर ले शब्दों की 
अंतर्मन का भाव कोई भी  उनमे व्यक्त नहीं होता है 

रंगपट्टिका कब रंग पाती इजिल टंका कैनवस यूँ ही 
जब न तूलिका निर्धारण कर उस पर कोई रेख उकेरे
एक प्रवाहित अभिव्यक्ति को दिशाबोध से सज्जित कर के
चुने अलंकण रंगो के जो उसमें नूतन चित्र चितेरे 

दिशाहीन अल्हड़ता देती भले क्षणिक आह्लाद हृदय को
आने वाला पल या कल, उससे आश्वस्त नहीं होता है 

कविता तो होती नित युग में, क्या युग की कविता होती वो 
कोई विरला ही मानस या रश्मि रथी  का सर्जन करता 
विज्ञापन से परे शारदा के आँगन का कोई  पुजारी 
बिना कोई संकल्प संजोए सार्थक यज्ञ नहीं कर सकता 

विद्रोहों के स्वर छेड़े जो कलम, लीक से हट कर चलते 
कितन भी हो आश्वासन, उसको आश्वस्ति नहीं कर सकता 








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नव वर्ष २०२४

नववर्ष 2024  दो हज़ार चौबीस वर्ष की नई भोर का स्वागत करने खोल रही है निशा खिड़कियाँ प्राची की अब धीरे धीरे  अगवानी का थाल सजाकर चंदन डीप जला...