मन की कस्तूरियाँ गंध को घोलती
मन की कस्तूरिया
गीत बन मेरे अधर पर
गीत बन मेरे अधर पर
शब्द जो ख़ुद ही सँवरते गीत बेन मेरे अधर पर
चेतना जी कन्दराओं में
चेतना की गहन कन्दरा में छिपी
मेरी अनुभूतियाँ छटपटाती रहीं
और अभिव्यक्तियाँ बंध गईं बांध में
तोड़ कर बह सकें, कसमसाती रही
शब्द जो भी उठा ले के अँगड़ाइयाँ
व्याकरण की गली में भटक खो गया
होंठ पर चढ़ न पाया सुरों में सजा
अश्रुओं में ढला, मौन ही तो गया
कौन सारे गँवा एक रेखा बना
जो धराशायी होकर गिरी सामने
भावना कक्ष में बंद बैठी रही
आई बाहर नहीं, शब्द को थामने
सरगमों की डगर निर्जनी ही रही
बीन तारीं को बस फुसफुसाते रही
छंद की हर लड़ी अब बिखर रह गई
बोल कर सजने में है कहाँ फ़ायदा
कोई पढ़ता समझता नहीं आज कल
क्या नियम हैं,कहाँ रह गया क़ायदा
मात्राओं की गणना अधूरी रही
कोई। भी संतुलन पूर्ण हो न सका
गिट के नाम पर जो परोसा गया
काव्य के आकलन पर अधूरा रहा
लिखनी हाथ थोड़ी पे अपने रखे
पृष्ठ को देख कर बुदबुदाती रही
भोर का हटाने लगा है आवरण
भोर का आवरण
काल की हाट में
काल की हाट में
धागा जो था तकलियों पर कता
ढल रही साँझ इस ज़िंदगी की यहाँ
जाकर किससे करें शिकायत
कौन है आवाज़ देता
कौन है आवाज़ देता द्वार खोले
शून्य में डूबा वर्तमान
आज वापिस लौट आया
क्या पता किस जन्म का था पुण्य कोई भी बकाया
अंत के द्वारे गया पर खटखटा कर लौट आया
है विदित इतना न रह पाया कोई न रह सकेगा
नयन आगत के सपन हर रोज़ लेकिन आँजता है
जानता हर क्षण निरंतर घट रहा है संचयों से
साँस के घट को सहज ही रोज़ रह रह माँजता है
क्या पता दिन आख़िरी हो कौन सा जो नित उगाया
आज वापिस खटखटा कर द्वार को मैं लौट आया
ज़िंदगानी की डगर पर कब उठे अवरोध कोई
कौन कंकड़ शैल बन कर पंथ को किस और मोडे
रिस रहे घट से सभी कुछ खर्च होता जा रहा है
है असंभव कोई इसमें आज लाये और जोड़े
आज तो मोहलत जरा सी देर की मैं माँग लाया
खटखटा कर आख़िरी द्वारा अभी मैं लौट आया
आज जो है वह कभी कल भी रहेगा कौन बोले
पृष्ठ तो इतिहास के हैं अब खुले बाँहें पसारे
जान न पाये किसंध्या आख़िरी कब आ ढालेगी
और कल न पालक खोले भोर जब आकर पुकारे
आज लिख लूँ शब्द जिनको मैं अभी तक लिख न पाता
द्वार अंतिम खटाकर्टा कर आज तो हूँ लौर आया
नव वर्ष २०२४
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