वेद की मंत्रित ऋचाएँ

 भोर होते घोलता है

धमनियों में, कौन आकर
वेद की मंत्रित ऋचाएँ 

थरथाराहट शिंजिनी सी
तैरती है
तन बदन में 
चित्र संवरे अँजुरी में
रश्मियों के 
आचमन में 

और फिर आकार लेती 
हैं ह्रदय में
व्यक्तिगत सम्वेदनायें

दीप जलते पंथ में 
आह्वान करते 
हैं गति का 
पाँव  बढ़ते हैं
बिना सोचे हुए 
तय क्या नियति का 

और दिखती सामने
मंज़िल, बिखेरे
दीप्त होकर ज्योत्सनाएँ 

चंद डावाँडोल निश्चय
घोलते हैं
संशयों की धुँध सम्मुख
फिर अनिश्चय 
ला बिछता
है विजन का शून्य सा चुप 

मन क्षितिज के पार ढूँढे
मिल सकें
अब कुछ नई सम्भावनाएँ 

सम्भव नहीं गीत बन पाना

 




शब्द कबूतर के पंखों पर बैठ गगन में उड़ते फिरते
सम्भव नहीं कलम पर आकर उनका गीतों में ढल जाना

उड़े हृदय के तलघर से जब भाव बदलियोंकी सूरत ले 
खुले नयन के वातायन से सब के सब हो गए प्रकाशित 
एक हवा के चपल झकोरे की ऊँगली को थाम चल पड़े 
और लौट कर आना उनका नहीं रह गया था संभावित 

चाहा तो था भावों को कुछ शब्दों की आकृति में ढालूँ 
संभव नहीं, रहा शब्दों का  पर, कोई साँचा बन पाना 

पिघली हुई वेदनाएं हों, या हो करुणा कहीं प्लावित 
उठती हो मल्हार कहीं से या मांझी के स्वर हों गूंजे 
थाप पड़े कोई ढोलक पर, चंग बज रहा हो झम झम झम 
तान छेड़ती  कोई मुरली या कोई अलगोजा गूंजे 

सरगम का हर सुर रह जाता अपने में ही सिमट सिमट कर 
बिना शब्द के अर्थहीन हो रह जाता स्वर का सध पाना 

तितर बितर धागों से उलझे  भाव  ना बंधने पाते क्रम में
बिना व्याकरण  के शब्दों का क्या अस्तित्व कौन बतलाए
रख आना बाहर निकाल कर तार समूचे सारंगी के 
 एक अपेक्षा करते रहना  मीठी कोई तान बजाए 

कभी उमड़ आते भावों का ढलना आकृति में शब्दों की 
सम्भव होता, लेकिन रहता नहीं अर्थ वह ही रह पाना

दिसम्बर २०२१ 





I 

अधरों की फायल में

 शब्द जिसे सज कर ढलना था

किसी ग़ज़ल में या कि गीत म
होकर क़ैद रह गया अधरों की
फायल की लाल डोर में

बेचारी भावना ह्रदय के
 कितनी बार द्वार से लौटी
रहा निरंतर द्वारपाल देता
ही रहा समय की गोटी
बंधे रह गए अक्षर के सिक्के
आँचल के फटे छोर में

बेघर सारे अलंकार अब
मानचित्र की तानाशाही
व्यर्थ ही रही उपमाओं की
सुबह शाम की आवाजाही
लय के साथ धुनें भी खोई
दरवाज़े पर मचे शोर में

बेचारी लक्षणा व्यंजना
थकी गिड़गिड़ा करते विनती
दिन सप्ताह महीने बीते
एक एक कर के अनगिनती
लौटी मुँह लटकाए संध्या
आस उगी जो तनिक भोर में

प्रीत की अनुभूति मेरी

 


जानता हूँ
शब्द मे क्षमता नहीं
अभिव्यक्त कर दें प्रीत की अनुभूति मेरी

भाव मन के
जब उठे अंगड़ाई लेकर
शब्द में ढलते हुए ही अर्थ बदले हैं अचानक
रूपरेखा जो बनी
वह तनिक आकार ले ले
पूर्व इसके ही बदल देता निदेशक आ कथानक


रह गई
फिर से अधूरी
भूमिकाएँ जो चुनी अपने लिए, अभिनीत मेरी

जब बनाए
आस के कोमल घरोंदे
कामनाओं के दिवास्वप्नों सुनहरी क्यारियों में 
तब चढ़ा कर
त्योरियाँ अपनी कुपित 
मौसम बदल देता उन्हें केवल करीली झाड़ियों में

थी लिए
आवंटनों की 
ही प्रतीक्षा  हर संवारती आस की आपूर्ति मेरी 

पुल बनाए
सांत्वनाओं के सजीले बोल लेकर
ठोकरों वाली डगर को पार कर  मंज़िल सजाने
खोखले आधार
टिक पाते कहाँ बहती हवाओं की बनाई  नींव पर, तो
बढ रहे पहले कदम पर ही लगे हैं भूमि को शैय्या बनाने 

घिर रहे
असमंजसों की
बंदिनी बन रह गई है भावनाओं की सकल अभिव्यक्ति मेरी 

क्या करूँ मीट तुम रूठते ही नहीं

 सोचता हूँ मनाऊं मैं मनुहार कर 
क्या करूँ  मीत तुम रूठते ही नहीं 
जानता हूँ मैं जाने अजाने सदा 
तोड़ता ही रहा साथ चलते कसम 


ध्यान मेरा लगा था धुनों की तरफ़
मैं बजाता रहा हो मगन बांसुरी
और देखा नहीं सामने है खुली
थरथराते अधर की मधुर पाँखुरी
मेरी अवहेलना को नकारे हुए
तुम जलाते रहे प्रीत की बस अगन


चाह है केसरों की  भरी क्यारियाँ
संदली गात में लहलहाती हुई
दृष्टि के एक क्वांरे  परस से रही
इस घड़ी के उतरने तलक़ अनछुई
आज उन्मादिता भर लूँ भुजपाश में
शांत कर लूँ तड़पती हुई सी तपन 


भावनाओं के उठते हुए ज्वार की
एक उद्भ्रांत होती हुई सी लहर
बह रही है नियंत्रण बिना हर घड़ी
भोर हो साँझ हो या कि हो दोपहर 
बस उसी के भँवर में रहे घूमते
रूठी मनुहार के सब अधूरे सपन 

कोहरा

 

साथ में हेमंत के कोहरा घना घिरने लगा
और सूरज दोपहर को उग के फिर छिपने लगा 

भोर वाली लालिमाएँ लुप्त सारी हो गई 
सुरमई संध्याएं लगता पंथ में ही खो  गईं
दॄष्टि के आकाश पर बादल उमड़ तिरने लगा  

सांझ  की बारादरी पे डल  गई काली चिकें 
द्वार की नजदीकयों में  दूर के ही भ्रम दिखें 
सूझ को बस स्पर्श का ही साथ अब मिलने लगा 

रात की ठंडी अंगीठी पर चढ़ा पकता हुआ 
सूप यह मशरूम का कुछ और भी गाढ़ा हुआ 
फिर उफन  कर फर्श पर टिप टिप यहां गिरने लगा 

साथ में हेमंत के कोहरा घना घिरने लगा 




शब्द रह जाते अबोले

 




भावनाओं में बदलते मौसमों की रंगतें हैं
ले रही करवट नयी ही आज उभरी चाहतें  है
है खड़ा ऋतुराज आ कर के शिशिर के द्वार लगता
कल्पना में हो रहीं कुछ  कुछ अजब सी आहटें हैं

आज सुधियों ने विगत के कुछ भुलाए पृष्ठ  खोले
आए  सम्मुख चित्र जिनमे  शब्द थे रहते अबोले

गुलमोहर की छांव वाली एक बासंती दुपहरी
और अधलेटी हुई वह स्वर्ण सी काया छरहरी
कुंतलों में ले रही अँगड़ाइया काली घटाएँ
मेहंदियों से बात करती वे हथेली दो, रुपहरी

दृश्य ये बहते शिरा के रक्त में तूफ़ान घोले
थरथराते अधर लेकिन शब्द रह जाते अबोले

दॄष्टि  के वातायनों से वे निगाहें झांकती सी 
प्रीत की गहराइयों का भेद  जैसे आंकती सी 
बिन उठाये प्रश्न अपने उत्तरों की खोज करती 
हर घड़ी अनुराग के पल, और ज्यादा मांगती सी 

बह रही संप्रेषणाएँ बिन हृदय के द्वार खोले 
ये अनोखे पल कि जिनमें  शब्द तो रहते अबोले 

चूनरी के छोर रह रह उँगलियों से थे उलझते
झनझना कंगन निरंतर चूड़ियों से बात करते 
और त्रिवली में भँवर पड़ते हुए वे सरसियों के
होंठ हिलते ही लगे कुछ मोगरे के फूल झरते

कल्पनाएँ कल्पना के और भी आयाम खोले 
गीत में ढलने लगे वे भाव जो रहते अबोले

राकेश खंडेलवाल 
नवम्बर २०२१ 











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पंथ के चालीस वर्ष



फिर वही साँझ आ ढल गई चित्र में
सुधि  में शहनाइयाँ गूंजने लग गयीं
होंठ फिर थरथराने लगे याद कर 
जब मिला था अधर का परस किसलायी

तीर जमुना के आकर ठहर थी गयी
कार्तिकी पूर्णिमा की धवल चाँदनी
छेड दो तारको में तरंगे उठा
नीर की धार में इक मधुर रागिनी
वृंद के कुंज कुछ और महके ज़रा
मुस्कुराने लगी दीप की वर्तिका
दॄष्टि  के व्योम में थी तड़पने लगी 
अपने आँचल को लहरा चपल दामिनी 

ज़िंदगी आ गई एक उस मोड़ पर 
जिस पे आकर हुईं सब दिशायें नयी 

साँझ ढलती हुई अपने सिंदूर से 
रंग गई थी कपोलों की अंगनाइयाँ 
कुँतलों  में। टंकी मोगरे की कली
छू के होती सुवासित थी पुरबाइयाँ
नैन की खिड़कियों के सिरे थाम कर
झांकते आगतों के सुकोमल  सपन 
भावना की लहरती हुई झालरें
करती अतिरेक थी मन की गहराइयाँ 

यज्ञ के कुंड में अग्नि प्रज्ज्वलित हुई 
साँझ होने लगी और भी सुरमई

संस्कृति की धरोहर उठी जाग कर
वेद के मंत्र फिर गूंजने लग गए
पाणि से पाणि के एक अनुबंध के
सूत्र , शत जन्म क गूँथने लग ग़ये
आहुति आहुति साक्ष्य देकर अग़न
जोड़ने लग गई सप्त पद के वचन
चार पग भिन्न राहों में जो थे बढ़े
एक ही पंथ को चूमने लग ग़ये

लक्ष्य की हर डगर प्राप्ति अनुकूल दे
देके आशीष यह प्रार्थनाएँ गयी

आज फिर सागरों के निमंत्रण सजे
साथ लेकर नई एक सम्भावना
ज़िंदगी के सफ़र में इसी मोड़ पर
साथ चलने लगी मुस्कुरा आहना
मन की आकांक्षाएँ हुई दीप्तिमय
आप ही पुष्पिता हो डगर सज गई
खुल रहा है नया पृष्ठ इक, राह में
साथ लेकर नए मोड़ की कामना

प्राप्त करते हुए हाथ आशीष का
प्रार्थना में सतत देह है झुक रही 


सूखे पत्तों पर बूँदों का

 


दे विदा शरद  को दवारे से, हेमंत कर रहा अब नर्तन 
सूखे पत्तों पर बूँदों का यह मधुर छेड देना सरगम

चल पड़े शरद के पीछे ही शाखों से हो पीले पत्ते
फिर लगे चूमने दूबों पर रातों में झरती हुई  ओस
झुरमुट से झांक रही गूपचुप तारों की छिटक रही किरणे
हर पल अलसाया चलता है पूरे मौसम में ढाई कोस 

दोपहरी ढलते ढलते ही तम आकर पाँव पसार रहा
फिर शमादान में  शमओं की बस होती मद्दम सी थिरकन 

उगती है भोर उबासी ले झीने कोहरे के पर्दे में
अंगड़ाई ले उठता सूरज मुख देख झील के पानी में 
बादल की ओढ़ रज़ाई को बिस्तर में पुनः सिकुड़ जाता 
रस्ता तकती रह जाए धूप इक भूली हुई कहानी में 

थक थक कर बूढ़ी हुई साँझ  चलती है हाथ लुकटी ले 
रातों पर चढ़ते यौवन का यह अल्हड़ और खिलंडरपन

नदिया के तट का सूनापन कुछ और हो रहा एकाकी
पाखी दक्षिण दिशि को जाकर अब नया बसेरा करते हैं
देहरी बस कान लगती है कोई आहट सुन पाने को
लेकिन राहों के सभी मोड़ जा और कहीं अब मुड़ते हैं 

घाटी के पार क्षितिज पर बस टँक गया शून्य ही दिखता है
बासंती सपनों का आशा नयनों में आँज रही अंजन 
नवम्बर  २०२१ 











अ से अगर अमावस लिखते

 




कलम तुम्हारे हाथों में है, जो भी लिखो संतुलित लिखना 
अ  से अगर अमावस लिखते हो तो फिर अमृत भी लिखना 

आंसू, आहें असंतोष की लिखते आये हो गाथाये 
भूख गरीबी बेकारी की घिसी पिटी  बस वही कहानी 
लिखो, किरण ने  अभिलाषा की जिन्हें सुनहरा कर रखा है 
आशाओं के इंद्रधनुष से भीगी हुई आँख का पानी 

निष्ठाओं में संकल्पों में लिपटे विश्वासों को लिखना 
अ  से लिखते अगर अमावस, तो फिर अमृत  भी तो लिखना 

बहुत सरल होता है आक्षेपित उँगली का ऊपर उठना 
लेकिन बाक़ी की तो चिन्हित करती आइ सदा तुम्हें ही
अपने अधिकारो की बातों को उछालने से कुछ पहले
सोचो ज़रा निभाना कितना और कहाँ दायित्व तुम्हें भी 

अपने संघर्षों को लिखते हो तो योगदान भी लिखना 
अ से अगर अमावस लिखनी है तो फिर अमृत भी लिखना 

डूबा है आकाश कहासे में तो किरण भोर की भी है
तम के भ्रम सब एक निमिष में रश्मि रश्मि से कट जाते हैं 
जलते हुए दिए शरदीली अंधियारी गहरी मानस को
नहीं भूलना अंगड़ाई ले कर दीवली कर जाते हैं 

जब अपनी उपलब्धि लिखो तो किसका कितना ऋण भी लिखना
अ से जब जब लिखो अमावस तब तब तुम अमृत भी लिखना 




नव वर्ष २०२४

नववर्ष 2024  दो हज़ार चौबीस वर्ष की नई भोर का स्वागत करने खोल रही है निशा खिड़कियाँ प्राची की अब धीरे धीरे  अगवानी का थाल सजाकर चंदन डीप जला...