पंथ के चालीस वर्ष



फिर वही साँझ आ ढल गई चित्र में
सुधि  में शहनाइयाँ गूंजने लग गयीं
होंठ फिर थरथराने लगे याद कर 
जब मिला था अधर का परस किसलायी

तीर जमुना के आकर ठहर थी गयी
कार्तिकी पूर्णिमा की धवल चाँदनी
छेड दो तारको में तरंगे उठा
नीर की धार में इक मधुर रागिनी
वृंद के कुंज कुछ और महके ज़रा
मुस्कुराने लगी दीप की वर्तिका
दॄष्टि  के व्योम में थी तड़पने लगी 
अपने आँचल को लहरा चपल दामिनी 

ज़िंदगी आ गई एक उस मोड़ पर 
जिस पे आकर हुईं सब दिशायें नयी 

साँझ ढलती हुई अपने सिंदूर से 
रंग गई थी कपोलों की अंगनाइयाँ 
कुँतलों  में। टंकी मोगरे की कली
छू के होती सुवासित थी पुरबाइयाँ
नैन की खिड़कियों के सिरे थाम कर
झांकते आगतों के सुकोमल  सपन 
भावना की लहरती हुई झालरें
करती अतिरेक थी मन की गहराइयाँ 

यज्ञ के कुंड में अग्नि प्रज्ज्वलित हुई 
साँझ होने लगी और भी सुरमई

संस्कृति की धरोहर उठी जाग कर
वेद के मंत्र फिर गूंजने लग गए
पाणि से पाणि के एक अनुबंध के
सूत्र , शत जन्म क गूँथने लग ग़ये
आहुति आहुति साक्ष्य देकर अग़न
जोड़ने लग गई सप्त पद के वचन
चार पग भिन्न राहों में जो थे बढ़े
एक ही पंथ को चूमने लग ग़ये

लक्ष्य की हर डगर प्राप्ति अनुकूल दे
देके आशीष यह प्रार्थनाएँ गयी

आज फिर सागरों के निमंत्रण सजे
साथ लेकर नई एक सम्भावना
ज़िंदगी के सफ़र में इसी मोड़ पर
साथ चलने लगी मुस्कुरा आहना
मन की आकांक्षाएँ हुई दीप्तिमय
आप ही पुष्पिता हो डगर सज गई
खुल रहा है नया पृष्ठ इक, राह में
साथ लेकर नए मोड़ की कामना

प्राप्त करते हुए हाथ आशीष का
प्रार्थना में सतत देह है झुक रही 


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