पता नहीं किस और छोर से अजब वक़्त यह आया
अजब वक्त यह आया
खेल खिलाता है
खेल खिलाता है जीवन में निशा दिवस वह एक प्रशिक्षक
क़ैद रहा जिसकी मुट्ठी में हर परिणाम पूर्व स्पर्धा के
चाहे सौ मीटर की दूरी या फिर चाहे मैराथन हो
तैरें कोई पीठ पर लेटा या फिर तितली बना हुआ हो
एक रिले की हिस्सेदारी या फिर हो अपना बलबूता
या फिर एक टीम का ज़िम्मा उसके काँधे टिका हुआ हो
प्रतियोगी को मिला हुआ अपना दायित्व निभाना ही है
क्षमता के अनुरूप, भूल कर क़िस्से अपनी व्यथा कथा के
धनुष हाथ हो तो प्रत्यंचा का तनना भी आवश्यक ही
लक्ष्य वेध के लिए ज़रूरी तन का, मन का संकेंद्रण ही
ध्येय प्राप्ति के लिए सुलभ वह कर देता है उपकरणों को
मौक़ा देकर करवाता है नए पंथ का अन्वेषण भी
कुछ प्रयास तो सुलभ किए हैं निर्णय को हासिल करने को
पा जाता है उन्हें वही जो संकल्पित है बिन दुविधा के
जीवन की चौसर पर खेला जाता खेल अनवरत पल छिन
कोई खेले साँसे गिनते, कोई दिल की धड़कन गिन-गिन
लेकिन जीत उसी की होती जो कर्मांयवाधिकारस्ते
हो कर खेला करता है परिणामों की चिंताओं के बिन
ओ अनुरागी आज खेल में उतरो खेलो, तब ही सम्भव
आँगन के तुलसी चौरे पर
शब्द की सीमाओं को अब तोड़ कर
आज लगा है रूठ गया सा
सम्बन्धों के राजमार्ग तक जाती थी जितनी रेखाएं
ढूंढ रहा है पगडण्डी पर बने नहीं उन पदचिह्नों को
फैले हुए विजन में तिरती हुई हवाओं की देहरी पर
खड़ा देखता सूखे तालाबों में बनते प्रतिबिम्बों को
अपने से भी हुआ अजनबी, चाहे है परिचय तलाशना
पर अपने से अपना रिश्ता आज लगा है रूठ गया सा
अँगड़ाई से शुरु उबासी तक फ़ैले दिन का सूनापन
मरुथल की मरीचिकाओं सा भी आकार नजर ना आता
रातों की चादर पर पड़ती हुई सलवटों के गुड़मुड़ के
चक्रव्यूह में बन्दी निद्रा का भी सिरा हाथ ना आता
अंधियारों के गर्भगृहों से ज्योति किरण उपजा करती है
इस थोथे आश्वासन का भ्रम तक हाथों से छूट गया सा
खड़ा महाजन इतिहासों का बहियाँ लिये हाथ में आकर
सब कुछ मिलता नाम लिखा ही कोई पूँजी नहीं जमा की
सुधियां चक्रवृद्धि ब्याजों के समीकरण में उलझी रहती
अपनी ही परछाईं तक भी आकर छूती नहीं जरा भी
बरस बीतते परिवर्तन की खिड़की सदा खुला करती है
आशाओं का भरा कलश यह, आज लग रहा फ़ूट गया सा
कोई नाम तुम्हारा ले तो
आख़िर क्या है मेरा परिचय
मेरा परिचय
आज अचानक गूँज उठी है प्राणों में सुधि की शहनाईपूछ रही इस गहन शून्य में, आख़िर क्या है मेरा परिचय
एक नाम है जो केवल आधार रहा है सम्बोधन का
चेहरा एक चढ़े है जिस पर कई मुखौटे बीते दिन के
अपनी नज़रों के प्रश्नो से रहा चुराता अपनी नज़रें
रहा देखता मुट्ठी में से रहे फिसलते पल छन छन के
धड़कन की खूँटी पर टाँकी सासों की डोरी बट बट कर
लेकिन जीवन की चादर में क्या कुछ कर लाया है संचय
रहा देखता पीछे मुड़ कर शेष न था पगचिह्न कहीं भी
और राह की भटकन का भी कहीं कोई उल्लेख नहीं है
आज यहाँ इस दोराहे पर हुआ दिग्भ्रमित सोच रहा मैं
प्रतिध्वनि बन कर आने वाल अब कोई संदेश नहीं है
यायावर बन कर राहों की मापी हैं दिन रात दूरियाँ
फिर भी क्या मेरे गतिक्रम से राहों का विस्तार हुआ क्षय
एक कथा जिसको दोहराते आये कवि, विक्षिप्त दोनों ही
मुझको भी तो व्यसन रहा उस सरगम को ही स्वर देने का
सुनता कौन? महज है टिक टिक टंगी हुई दीवार घड़ी की
आज सोचता अर्थ मिला क्या यूं ही जीवन भर रोने का
जीवन भर व्यापार चला है फिर भी संचित हुआ शून्य ही
यहाँ तिमिर का उजलाहट से होता रहा नित्य क्रय विक्रय
सन्नाटे का शासन है
पुराने ढंग से फिर पत्र कोई
मैं सोचता हूँ तुम्हें लिखूँ अब
पुराने ढंग से फिर पत्र कोई
औ जोड़ दूँ सब बिखरते धागे
तितर बितर हो गए समय में
वे भाव मन के जो पुनकेसरों के पराग कण में लिपट रहे हैं
जो गंध में डूबती हवा की मधुर धुनों में हुए हैं गुंजित
बुने हैं सपने हज़ार रंग के निखारते शिल्प अक्षरों का
उतार रखते जिन्हें कलम से हुआ है हर एक रोम पुलकित।
गुलाब पाँखुर कलम बना कर
भिगो सुवासों की स्याहियों में
करूँ प्रकाशित वे भाव अपने
जो उमड़े अक्सर ही संधिवय में
गगन के विस्तृत पटल पे अंकित करूँ सितारों से शब्द अपने
या राजहंसों के फैले पर पर लिखूँ निवेदन सतत प्रणय का
मैं चाहता हूँ सितार तारों की झनझनाहट अभिव्यक्त कर दूँ
उन्हें बना कर पर्याय अपने लगन में भीगे हुए हृदय का
मैं गुलमोहर के ले पाटलों को
चितेरू मेंहदी की बूटियों में
औ फिर रंगूँ अल्पनाएँ पथ पर
जो साथ चल कर सका था तय मैं
कब टेक्स्ट में आ ह्रदय उमड़ता न फ़ेसटाइम में बात वो है
जो पत्र में ला उकेर देती है तूलिकाएँ रंग अक्षरों से
कब व्हाटसेप्प में हुआ तरंगित वह राग धड़कन की सरगमों का
जो नृत्य करता हुआ बजा है गुँथे शब्द के सहज स्वरों में
मैं सोनजूही के फूल लेकर
दूँ गूँथ वेणी के मोगरे में
औ सिक्त होकर विभोर हो लूँ
तुम्हारे तन से उड़ी मलय में
प्रार्थना के ये अधूरे गान
प्राण की वट वर्तिकाएँ दीप तो निशि दिन जलाए
वाटिका से पुष्प चुन कर साथ श्रद्धा के चढ़ाए
सर्व यामी मान कर आराधना करता रहा मैं
आज जाना वाक् हीना श्रव्य हीना मूर्तियाँ है
प्रार्थना में फिर निरर्थक गान गाकर क्या करूँगा
तुम कहे जाते रहे करुणानिधानी , तो बताओ
आर्त्त नादों से घिरे तुम, है कहाँ करुणा तुम्हारी
तुम बने थे कर्मयोगी और योगेश्वर कहाए
हो कहाँ तुम? आज कल योगी बने हैं बस मदारी
व्यर्थ लगती हैं सभी सम्बोधनों की पदवियाँ तब
मैं तुम्हारे नाम को देकर विशेषण क्या करूँगा
डिग रही है आस्था, बैसाखियों पर बोझ डाले
और नैतिकता समूची टैंक रही है खूँटियों पर
स्याह काले कैनवस पर दृष्टि को अपनी टिकाए
मानवीयता है प्रतीक्षित रंग आए कूँचियों पर
मरुथली झंझाओं ने घेरे हुए हैं द्वार गालियाँ
बध रहे इस शोर में मल्हार गाकर क्या करूँगा
जो थी शोणित में घुली निष्ठाएँ पहली धड़कनों से
टूटती हर साँस के पथ पर तिरोहित हो रही हैं
मान्यताओं की धरोहर जो विरासत में मिली थी
इस समय के मोड़ पर आ, मुट्ठियों से रिस रही हैं
जब कसौटी कह रही है पास के। विश्वास खोटे
मैं अधूरी आस के प्रासाद रच कर क्या करूँगा
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नव वर्ष २०२४
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