शब्द की सीमाओं को अब तोड़ कर
आज लगा है रूठ गया सा
सम्बन्धों के राजमार्ग तक जाती थी जितनी रेखाएं
ढूंढ रहा है पगडण्डी पर बने नहीं उन पदचिह्नों को
फैले हुए विजन में तिरती हुई हवाओं की देहरी पर
खड़ा देखता सूखे तालाबों में बनते प्रतिबिम्बों को
अपने से भी हुआ अजनबी, चाहे है परिचय तलाशना
पर अपने से अपना रिश्ता आज लगा है रूठ गया सा
अँगड़ाई से शुरु उबासी तक फ़ैले दिन का सूनापन
मरुथल की मरीचिकाओं सा भी आकार नजर ना आता
रातों की चादर पर पड़ती हुई सलवटों के गुड़मुड़ के
चक्रव्यूह में बन्दी निद्रा का भी सिरा हाथ ना आता
अंधियारों के गर्भगृहों से ज्योति किरण उपजा करती है
इस थोथे आश्वासन का भ्रम तक हाथों से छूट गया सा
खड़ा महाजन इतिहासों का बहियाँ लिये हाथ में आकर
सब कुछ मिलता नाम लिखा ही कोई पूँजी नहीं जमा की
सुधियां चक्रवृद्धि ब्याजों के समीकरण में उलझी रहती
अपनी ही परछाईं तक भी आकर छूती नहीं जरा भी
बरस बीतते परिवर्तन की खिड़की सदा खुला करती है
आशाओं का भरा कलश यह, आज लग रहा फ़ूट गया सा
कोई नाम तुम्हारा ले तो
आख़िर क्या है मेरा परिचय
मेरा परिचय
आज अचानक गूँज उठी है प्राणों में सुधि की शहनाईपूछ रही इस गहन शून्य में, आख़िर क्या है मेरा परिचय
एक नाम है जो केवल आधार रहा है सम्बोधन का
चेहरा एक चढ़े है जिस पर कई मुखौटे बीते दिन के
अपनी नज़रों के प्रश्नो से रहा चुराता अपनी नज़रें
रहा देखता मुट्ठी में से रहे फिसलते पल छन छन के
धड़कन की खूँटी पर टाँकी सासों की डोरी बट बट कर
लेकिन जीवन की चादर में क्या कुछ कर लाया है संचय
रहा देखता पीछे मुड़ कर शेष न था पगचिह्न कहीं भी
और राह की भटकन का भी कहीं कोई उल्लेख नहीं है
आज यहाँ इस दोराहे पर हुआ दिग्भ्रमित सोच रहा मैं
प्रतिध्वनि बन कर आने वाल अब कोई संदेश नहीं है
यायावर बन कर राहों की मापी हैं दिन रात दूरियाँ
फिर भी क्या मेरे गतिक्रम से राहों का विस्तार हुआ क्षय
एक कथा जिसको दोहराते आये कवि, विक्षिप्त दोनों ही
मुझको भी तो व्यसन रहा उस सरगम को ही स्वर देने का
सुनता कौन? महज है टिक टिक टंगी हुई दीवार घड़ी की
आज सोचता अर्थ मिला क्या यूं ही जीवन भर रोने का
जीवन भर व्यापार चला है फिर भी संचित हुआ शून्य ही
यहाँ तिमिर का उजलाहट से होता रहा नित्य क्रय विक्रय
सन्नाटे का शासन है
पुराने ढंग से फिर पत्र कोई
मैं सोचता हूँ तुम्हें लिखूँ अब
पुराने ढंग से फिर पत्र कोई
औ जोड़ दूँ सब बिखरते धागे
तितर बितर हो गए समय में
वे भाव मन के जो पुनकेसरों के पराग कण में लिपट रहे हैं
जो गंध में डूबती हवा की मधुर धुनों में हुए हैं गुंजित
बुने हैं सपने हज़ार रंग के निखारते शिल्प अक्षरों का
उतार रखते जिन्हें कलम से हुआ है हर एक रोम पुलकित।
गुलाब पाँखुर कलम बना कर
भिगो सुवासों की स्याहियों में
करूँ प्रकाशित वे भाव अपने
जो उमड़े अक्सर ही संधिवय में
गगन के विस्तृत पटल पे अंकित करूँ सितारों से शब्द अपने
या राजहंसों के फैले पर पर लिखूँ निवेदन सतत प्रणय का
मैं चाहता हूँ सितार तारों की झनझनाहट अभिव्यक्त कर दूँ
उन्हें बना कर पर्याय अपने लगन में भीगे हुए हृदय का
मैं गुलमोहर के ले पाटलों को
चितेरू मेंहदी की बूटियों में
औ फिर रंगूँ अल्पनाएँ पथ पर
जो साथ चल कर सका था तय मैं
कब टेक्स्ट में आ ह्रदय उमड़ता न फ़ेसटाइम में बात वो है
जो पत्र में ला उकेर देती है तूलिकाएँ रंग अक्षरों से
कब व्हाटसेप्प में हुआ तरंगित वह राग धड़कन की सरगमों का
जो नृत्य करता हुआ बजा है गुँथे शब्द के सहज स्वरों में
मैं सोनजूही के फूल लेकर
दूँ गूँथ वेणी के मोगरे में
औ सिक्त होकर विभोर हो लूँ
तुम्हारे तन से उड़ी मलय में
प्रार्थना के ये अधूरे गान
प्राण की वट वर्तिकाएँ दीप तो निशि दिन जलाए
वाटिका से पुष्प चुन कर साथ श्रद्धा के चढ़ाए
सर्व यामी मान कर आराधना करता रहा मैं
आज जाना वाक् हीना श्रव्य हीना मूर्तियाँ है
प्रार्थना में फिर निरर्थक गान गाकर क्या करूँगा
तुम कहे जाते रहे करुणानिधानी , तो बताओ
आर्त्त नादों से घिरे तुम, है कहाँ करुणा तुम्हारी
तुम बने थे कर्मयोगी और योगेश्वर कहाए
हो कहाँ तुम? आज कल योगी बने हैं बस मदारी
व्यर्थ लगती हैं सभी सम्बोधनों की पदवियाँ तब
मैं तुम्हारे नाम को देकर विशेषण क्या करूँगा
डिग रही है आस्था, बैसाखियों पर बोझ डाले
और नैतिकता समूची टैंक रही है खूँटियों पर
स्याह काले कैनवस पर दृष्टि को अपनी टिकाए
मानवीयता है प्रतीक्षित रंग आए कूँचियों पर
मरुथली झंझाओं ने घेरे हुए हैं द्वार गालियाँ
बध रहे इस शोर में मल्हार गाकर क्या करूँगा
जो थी शोणित में घुली निष्ठाएँ पहली धड़कनों से
टूटती हर साँस के पथ पर तिरोहित हो रही हैं
मान्यताओं की धरोहर जो विरासत में मिली थी
इस समय के मोड़ पर आ, मुट्ठियों से रिस रही हैं
जब कसौटी कह रही है पास के। विश्वास खोटे
मैं अधूरी आस के प्रासाद रच कर क्या करूँगा
Sent from my iPad
एक झूठी ज़िंदगी के बोल
एक झूठी ज़िंदगी के बोल तिरते हैं हवा में
न्यूज़ चैनल हो कि हों अख़बार की खबरें यहाँ पर
राजनीतिक लाभ को अब दांव पर है जिंदागनी
और फिर फिर से यही दुहराई जाती है कहानी
एक ही किरदार प्यादों का लिखा है चौसरों पर
प्राण की आहुति चढ़ा रख लें सुरक्षित राजधानी
होड़ में डूबी हुई निष्ठाये रक्खी ताक पर अब
क्या पता किसको कसौटी सत्य की खोई कहाँ पर
कुर्सियों की चाह रखती आँख पर पट्टी चढ़ा कर
राजसिंहासन। चढ़े धृतराष्ट्र, हक़ अपना बता कर
राज्य की वल्गाएँ थामे, अनुभवी शातिर खिलाड़ी
शेष दरबारी मगन हैं बांसुरी अपनी बजा कर
और जन गण मन भटकता पर्वतों पर घाटियों में
ज़िंदगी के यक्ष प्रश्नो का मिले उत्तर जहां पर
जो चुने आशाओं ने, वे सब हुए अज्ञात वासी
दूर तक दिखती नहीं परछाईं भी कोई ज़रा भी
हाट में अब मोल साँसों का नहीं कौड़ी बराबर
भीर संध्या दोपहर सब धुँध में लिपटी धुआँसी
एक झूठी ज़िंदगी का मोल क्या है, बोल क्या है
प्रश्न पर चर्चा सदी की, आज भी होती वहाँ पर
आज की आधी कथा सी
घिर रहे आश्वासनों के मेघ अम्बर में निरंतर
कल सुबह आ जाएगी फलती हुई आशाएं लेकर
ये अँधेरे बस घड़ी भर के लिए मेहमान है अब
कल उगेगा दिन सुनहरी धुप के संग में चमक कर
दे नहीं पाती दिलासा बात अब कोई ज़रा भी
प्राण से अतृप्त मन पर छा रही है अब उदासी
वायदों के सिंधु आकर रोज ही तट पर उमड़ते
और बहती जाह्नवी में हाथ भी कितने पखरते
रेत के पगचिह्न जैसी प्राप्ति की सीमाएं सारी
शंख के या सीपियों के शेष बस अवशेष मिलते
ज़िंदगी इस व्यूह में घिर हो गई रह कर धुँआ सी
एक कण मांगे सुधा जा हर कली है आज प्यासी
घेरते अभिमन्युओं को, जयद्रथों के व्यूह निशिदिन
पार्थसारथि हो भ्रमित खुद ढूंढता है राह के चिह्न
हाथ हैं अक्षम उठा पाएं तनिक गांडीव अपना
आर ढलता सूर्य मांगे प्रतिज्ञाओं से बंधा ऋण
आज का यह दौर लगता गल्प की फिर से कथा सी
बूँद की आशा लिए है अलकनंदा आज प्यासी
पास आये हैं सुखद पल तो सदा यायावरों से
पीर जन्मों से पसारे पाँव , ना जाती घरों से
जो किये बंदी बहारों की खिली हर मुस्कराहट
मांगती अँगनाई पुष्पित छाँह, सन्मुख पतझरों से
किन्तु हर अनुनय विवशता से घिरी लौटी निराशी
जेठ में सावन तलाशे, ज़िंदगी यह आज प्यासी
नई भोर की अगवानी में
जीवन की उलझी राहों में
पूरे अड़सठ दीप जलाए
नदिया की धारा पर दौने में
रखकर के सहज बहाया
और नया इक दीप जलाया
साँसों की सुरभित क्यारी में
धड़कन के कुछ बीज बो रहा
और सपन अंकुरित हो रहा
आगे बढ़ते हुए नकारी
आगत के जलकलश सजा कर
छिड़के द्वारे पर छलका कर
दहलीज़ों के संधिपत्र पर
आज कर रहे हैं हस्ताक्षर
राही चल, बस निस्पृह होकर
नव वर्ष २०२४
नववर्ष 2024 दो हज़ार चौबीस वर्ष की नई भोर का स्वागत करने खोल रही है निशा खिड़कियाँ प्राची की अब धीरे धीरे अगवानी का थाल सजाकर चंदन डीप जला...
-
प्यार के गीतों को सोच रहा हूँ आख़िर कब तक लिखूँ प्यार के इन गीतों को ये गुलाब चंपा और जूही, बेला गेंदा सब मुरझाये कचनारों के फूलों पर भी च...
-
मूर्च्छित है भावना, बिंध वक्त के पैने शरों से लेखनी हतप्रभ शिथिल है, मौन लेखन ओढ़ता है काल के तो चक्र चलते हैं सदा होकर दुधारे युद्ध तो थमता ...
-
इस पनघट पर तो छलकी हैं सुबह शाम रस भरी गगरैया लेकिन प्राणों के आँगन में तृषा रही बाकी की बाकी अधरों पर उग रही प्यास ने कितने ही झरने प...