जो बह न सके थे वे आंसू



आषाढ़ी मेघ घिरे आकर
बैसाख चढ़े अंगनाइ में
जो वह न सके थे वे आंसू
उमड़े सूखी अमराई में

आमों पर बौर, न दिखे पिकी
बस हवा चली मरुथल वाली
फुलवारी पर छाया पतझर
गुलमोहर की सूखी डाली

आँखों से दूर हुई निंदिया
सपने खो गए संशयों में
उत्तर सब उलझे हुए रहे
प्रश्नों के सिर्फ़ प्रत्ययों में

बुझती आसों में प्रश्न नहीं
बस सहमे सहमे उत्तर है
कुछ भय के अनचीन्हे साये
इन सबसे ज़्यादा बढ़ कर है

जो बहन सके थे वे आंसू
ढल रहे चित्र में यादों के
कुछ कर न पाने की कुंठा
हावी हो रही विषादों पे

आपके ही नाम की

दिन उगा या दोपहर थी
याकि बीती शाम थी
साँस ने माला जपी बस 
आपके ही नाम की

आस्था का दीप रक्खा
प्राण में अपने जला कर
सरगमों के तार छेड़े
आपको ही गुनगुनाकर
आपको आराध्य माने
भक्ति में डूबे रहे हम
मान कर विपदा पड़ी तो
आप ले जाएँ बचा कर

आज जब झंझा घिरी तो
आप ही हैं लुप्त जग से
दूर तक दिखती नहीं
परछाई तक भी छांव की

वे कथाएँ जन्म से, पीकर  
घुटी हम आए पलते
आप हैं सच्चे पिता
हर एक संकट आप हरते 
किन्तु ये भ्रम ढह रहा है  
रेत  के प्रासाद जैसा 
जो सहस्त्रों आर्त्तनादों से 
तनिक भी ना पिघलते 

हैं दुखी मथुरा अयोध्या 
कल तलक थीं गर्विता जो 
वक्ष पर अपने संभाले 
रज  पुनीता  पाँव की 

मुट्ठियों से आज फिसली 
बालुओं सी आस्थाएं 
काम कितना आ सकीं हैं 
प्रार्थनाएं वन्दनाएं 
मन्त्र ध्वनियाँ हैं तिरोहित 
क्रन्दनों के शोर में अब 
आपकी यज्ञाग्नियों में 
ज़िंदगी कितनीं जलाएं 

प्राण दाता जिस जगह
करता उपेक्षा प्राण की ही
ये नई लगता प्रथा है
आपके ही गाँव की 

कोई संकेत देता रहा

 कौन संकेत देता रहा साँझ से

आँजने के लिए
चंद  मधुरिम सपन 

ज्यों ही अंतिम चरण
आ गया मंच पर 
दिन के अभिनीत
होते हुए दृश्य का
और तैयार होती 
हुई साँझ ने 
फिर से दुहराई 
अपनी चुनी भूमिका

एक तीली उठी आँख
मलते हुए
जागने लग पड़ी
वर्तिका में अग़न

कौन संकेत देता रहा 

झाड़ियों में घिरे 
झूटपटे में कहीं 
बूँद बन गिर रही
यों लगा चंद्रिका 
स्वर उमड़ते हुए
बादलों से घिरे
देते आभास 
गूंजित हुए गीत का 

मोड़ से देखते 
मुस्कुराते हुए
सुरमई रात के 
काजरी  दो नयन 

कौन संकेत देता रहा 

सीढ़ियाँ चढ़ते चढ़ते
रुकी रात जब
छत के विस्तार को
नापने के लिए
कुछ सितारे रहे
इक प्रतीक्षा लिए
चूनरी का सिरा 
थामने के लिए 

पाँव लेकिन थमे 
उठ न पाए तनिक 
उनको जकड़े रही
एक वासी थकन 

कोई संकेत देता रहा 



फिर आइन चैतिया हवाएँ

 

पूनम की चंदियाई साड़ी धुली ओस के झांझर पहने
स्वर्णकलश से धूप उँडेले आती हैं चैतिया हवायें

मिला भोर का स्पर्श गुनगुना
हुई बालियों में कुछ सिहरन
होने लगी फरफ़ूरी न में
पात पात ने छेड़ीं सरगम 
ट्यूब वेल की ताल ताल पर
थिरक रहां है खलिहानों पथ
पगडंडी पर लगी क़तारें
मंडी तक मनता है उत्सव 

होली मना, विदाई लेकर लौट चुका है शिशिर गाँव से 
तालाबों  के तट पर आकर जल तरंग पायल खनकाएँ 

होड़ पतंगो से करती सी
उड़े गगन तक धानी चूनर 
चौपालों से मुँडेरों तक
लगे झनकने पग के नूपुर
पड़ी ढोलकी पर थापे तो
मुखरित हुई कंठ की सरगम
और गूंज लौटी है वापिस
दिशा दिशा से होती पंचम 

फिर अधरों के मधुर स्पर्श ने फूंके प्राण मौन बांसुर में
कई अनूठी सी स्वर लहरी लगा गगन से उतरी आएँ 

घर आँगन खिड़की चौबारा
लगे अल्पना नई सजाने
सरसा पिंजरे में हीरामन 
रामधुनी फिर लगा सुनाने
प्रकट कृपाला के छंदों की
आवाजें घर बाहर उभरी
छत पर पापड़ बड़ी सुखाने
को तत्पर हो गई दपहरी

बतियाने लग गई मुँडेरें इक दूजे से धीरे धीरे 
नव सम्वत् की शुभ्र ऋचाएँ अगरु धूम्र में लिपटी आएँ 





श्वास जन्म भर महके


मौसम की फगुनाहट  बिखरी
चैती ने छेड़ी सारंगी
धानी चूनर उड़े हवा में
मन पाखी बन चहके

झूम उठी पूरी फुलवारी करते अगवानी मधुपों की
कलियों ने लज्जा का घूँघट हौले हौले खोला
बासंती साड़ी में लिपटी पुरवा ने पायल खनकाई
मद्दम स्वर में कचनारों से बेला खुसपुस बोला

झुरमुट में बोगनबलिया​ ​के
खुलकर के निशिगंध यूँ हंसी
सम्मोहित गतिमान समय की
श्वास जन्म भर महके

नन्हे अंकुर हरी दूब  के पलक मिचमिचा जागे
गौरेय्या ने पंख फड़फड़ा रह रह इन्हें दुलारा
फुनगी ने आवाज लगा कर अपने पास बुलाया
लगा गूंजने दूर कहीं पर भोपा का इकतारा

जमना की रेती में चमके
फागुन की पूनम के तारे
संदल की सुवास लहराई
आज हवा में बह के

खलिहानों में पके धान की स्वर्णिम झाँझर खनके
अभिलाषा के बादल उमड़े हुए व्योम पर छा​ये ​
चौपालों पर थाप चंग की, सारंगी  से मिल कर
उड़ी उमंगो की सरगम से झूम झूम बतियाए 

​जड़ी उमंगों​ की ​चूनर में
रक्तिम आभा गुलमोहर की
और आँच यौवन की लेकर
हैं पलाश वन दहके 

अनहोनी कुछ हुई

 

  

अनहोनी कुछ हुई 

 

उषा ने लिख दिया शब्द इक

नील गगन के कोरे पट पर 

प्राची का अध्याय खुला इक 

पीत रक्त से वर्ण सजा कर 

 

आँख मसलते हुये  भोर ने

जल तरंग से हाथ पखारे

कुछ बूँदें उड़ चली हवा में

खुले देव मंदिर के दवारे

 

लगी गूंजने शंखों की ध्वनि 

दीपशिखा में ज्योति भर गई 

आकर फूलों की पंखुरियाँ 

प्रतिमा पग पर आप चढ़ गईं  

 

मलय गंध की साड़ी पहने

इठला कर चल दी पुरवाई 

अनहोनी कुछ हुई लजा कर

अपने में सिकुड़ी अरुणाई

 

एक वृक्ष के वातायन से 

नन्हे पाखी ने नभ देखा

और उड़ चला पंख पसारे

पढ़ लेने को दिन का लेखा 

 

पीछे पीछे चले धूप के

सोनहली रंगों के धागे

पगडंडी से राजपथों तक 

पदचापों के स्वर फिर जागे 

 

चढ़ते हुए दिवस के संग संग 

जीवन की गति तीव्र हो गई

पता नहीं चल पाया किस पल

धूप उतरते हुए ढल गयी

 

संध्या के साजों पर थिरकी

चँदियाई रजनी की पायल

अनहोनी यूँ हुई आज का 

दिन, सहसा  हो बैठा है कल 

मृग तृष्णाओं के जंगल में

 मृग तृष्णाओं केजंगल में 

इक मरीचिका के कोहरे में
लिपटे हुए बिताई हमने
हर सुबहा हर शाम

हाँ ये तो था ज्ञात हमारी
दृष्टि भरम में डूबी
फिर भी सपनों में उलझाता 
जीवन की है खूबी 
उगती रही प्यास होंठों पर 
बढ़ते पग के साथ
दिवास्वप्न शिल्पित होने का
पला एक  विश्वास 

उठ यथार्थ के धरातलों से 
बहे हवाओं की लहरों पर
पतझर की नंगी शाख़ों के
तले किया विश्राम 

झूठे दम्भों, छलनाओं  का 
शून्य रहा अंतर में
नैतिकता का अर्थ तलाशा
विध्वंसित जर्जर में 
मिलते विष को पीकर अपने
मन को था बहलाया
जिसने दंश दिए, उसका भी
है आभार चुकाया 

क्रूर समय का खड़ा महाजन
निज बहियाँ ले द्वार
साँसों की मोहरों के ऋण का
चुकता किया छदाम

रात उजाले की चंदनिया
मिली नित्य  बेस्वाद 
सपनों से जो भरी अंजुरी
रिस जाती  हर बार 
दो घूँट चाँदनी के आकर
होंठों तक, फ़िस्कल गए
हम टूटी नौकायें लेकर
सागर में निकल गए

टूटी प्रतिमा के खंडहर सा
छिन्न भिन्न इतिहास 
पंगु हुए इस वर्तमान पर
अब लिखना है नाम

राकेश खंडेलवाल 
फ़रवरी २०२१ 

यौवन को दोषों की

 शब्द है कृशकाय

अपने कक्ष की एकाकियत में 

पक्ष पूरा एक

फिर एकांत में घिर रह गया


बंद हैं वातायनों के

पट, न दस्तक दें हवाएँ

हर दिशा बिखरा रही

अवरोध के संग वर्जनाएँ 

यौवन को दोषों की

कथाएँ सुनाने में 

जीवन का तारतम्य

शून्य में घिर रह गया


मोड़ सूने फिर हुए 

पगडंडियों की यात्रा के 

शब्द औंधे मुँह पड़े

यों हाथ छूटे मात्रा के

कंठ से गूंजा  स्वर

होंठों की देहरी पर 

कुछ कहे बिन

आज फिर चुप रह गया 


बिंदु  पर रेखाओं के

अब दिग्भ्रमित हो पाँव ठहरे

धुँध में डूबे हुये सब

परिचयों के आज चेहरे

धड़कन से साँसों को 

अनुपाती करने में

पास का योग भी

घट कर ही रह गया 

धागा उलझ उलझ रह जाए

 

​कटी फटी  सपनों की चादर को जब भी चाहा तुरपाऊँ
धागा उलझ उलझ रह  जाए टाँका लगने से पहले ही

सूरज ने समेट कर रख ली जब अपनी किरणो की गठरी
और निशा के पग की पायल कहीं दूर लग पड़ी खनकने
मन  की अकुलाहट घर वापिस जाते पाखी के पर थामे
खिड़की के पल्लों को पकड़े दूर क्षितिज पर लगी अटकने 

दृष्टि खींचती है आकृतियाँ खुले गगन पर सूरमा लेकर 
धुआँ धुआँ होकर रह  जातीं खाका बनने से पहले ही 

शनैः  शनैः  होती विलीन जब राहों की ध्वनियाँ-प्रतिध्वनियां 
जुगनू आकर ढली सांझ की दहलीजों पर दीप  जलाते 
सुधि के संदूकों के ताले जो बरसों से बंद पड़े थे 
अनायास ही बिन कुंजी के एक एक कर खुलते जाते 

चाहा जब जब उन्हें  खोल कर एक बार फिर से संगवाऊं 
छीर छीर होकर रह जाते, तह के खुलने से पहले ही 

कमरे की दीवारों पर आ प्रश्न बुना करते हैं जाले 
किन्तु थरथराकर  रह  जाते, संभावित सारे ही उत्तर 
अंकगणित के समीकरण को बीजगणित से सुलझाने  की 
कोशिश में मिटने लगते हैं लिखे हुए सारे ही अक्षर 

बिछी ज़िंदगी की चौसर पर रही सुनिश्चित हार सदा ही
मोहरे  सारे  पिट जाते हैं, पासा गिरने से पहले ही 

सतरंगी आँच से


जीवन की बगिया में आज फिर दहक उठे
कुछ पलाश रूपभरी सतरंगी आँच से
एक गात उभर रहा सामने नयन के आ
जब भी निहारा है प्रिज़्म वाले  काँच से

शतरूपे दृष्टि के वितान पर दिशाओं में
चित्र एक तेरा ही हर घड़ी उभरता है

थरथराती पाँखुरों से फिसलता हुआ तुहिन
द्रवित हुआ लगता है कुहसाइ भोर में
सरसराहटें झरी जो चूनरी के कोरों से
चूमती हैं कलियों को मधुपों के शोर में

मधुलके प्रभावित है मधुवन समूचा ही
पवन भी यहाँ आ के लड़खड़ाता चलता है

गूंजता है अलगोजा आप ही हवाओं  में
जल तरंग  छेड़ती है नव धुने सितार पर
बादलों के झुंड  नृत्य करते हैं व्योम में
फगुनाहट। छाती है गाती मल्हार पर

साधिके कलाओं का एक अंश पा तेरा
पुष्प धन्व सतरंगे रंग में संवरता है

नव वर्ष २०२४

नववर्ष 2024  दो हज़ार चौबीस वर्ष की नई भोर का स्वागत करने खोल रही है निशा खिड़कियाँ प्राची की अब धीरे धीरे  अगवानी का थाल सजाकर चंदन डीप जला...