ज्यों ज्यों होती जाती शाम
आज का din
कुछ परिवर्तन हुआ नही था
जैसा कल था आज वही था
चित्र बना इक टंगा हुआ था
कल जैसे
आशा का घट फिर रहा आज भी रीता
रही ताकती डगर राह को
भूली भटकी एक निगाह को
साथ लिये इक बुझी चाह को
रही प्रतीक्षा
लिए आज फिर से वनवासिन सीता
वही धूप बीमार अलसती
नीरवता रह रह कर हंसती
पत्ती तक भी एक न हिलती
इतिहासों का
अंकित घटनाक्रम था फिर से जीता
चलो आज का दिन भी बीता
कितने दीप जले सुधियों कर
कल संध्या जब पंडितजी ने अञ्जुरी में गंगाजल डाला
सच बतलाना उस पल मन में कितने दीप जले सुधियों के
सम्भव है लहराये होगे पलको के पर्दे पर कितने
चित्र एक अलसाई संध्या के जो कैनवास पर उभरे
और कसमसाये होंगे वे हिना रंगी उंगली के बूटे
जो उस पल पल्लू की गुत्थी के व्यूहों में जा थे ठहरे
और गुदगुदाई होंगी वे चुहलें जो की थी सखियों ने
सच बतलाना उस पल मन मे कितने दीप जले सुधियों के
यज्ञ कुंड की अग्नि शिखा के साथ साथ नर्तित होते वे
सपने जो थे परे कल्पना की सीमा के, उससे पहले
स्पर्श अजनबी सा आहुति के लिए थाम कर उँगलियों को
तारतम्य में रहा बांधता असमंजस के सब पल फैले
निश्चित मुझको खुलते होंगे कोष तुम्हारी कुछ स्मृतियों के
सच बतलाना उस पल मन मे कितने दीप जले सुधियों के
मंत्रपूरिता जल से भीगी हुई हथेली सिहरी थी जब
कमल पखुरियों ने खींची थी रेखाएं नूतन सपनों की
नयनो ने मद भरे पलो के आगत का आजा था काजल
सुरभि संजोई सौगंधों ने अधरों पर थिरके वचनों की
नये पंथ पर पगतालियो को जब सहलाया था कलियों ने
सच बतलाना उस पल मन में कितने दीप जले सुधियों के
अनायास ही गीत बुन गये
शब्द स्वयं ही मुझ तक आये, अनायास ही गीत बुन गये
बहर काफ़िये औ रदीफ़ की मेरे शब्द कोश से दूरी
नहीं व्याकरण की गलियों का पता मिला मुझको नक्शे मे
और सफ़र में पग धरने को मेरा आकर साथ चुन गये
छन्द भेद की सारिणियों का मुझको कोई ज्ञान नहीं है
कहां अन्तरा रुकता, होती कहाँ वाक्य की पुनरावृत्तियां
इनका भेद किस तरह जानूँ, ये मुझको अनुमान नहीं है
बांधा करती है शब्दों की डोरी कोई कलाकार की
मेरी झोली रही कृपण ही शब्दों से भी भावों से भी
और कभी संप्रेषणता सेहो न सकासाक्षात्कार भी
थे चाहे अनगढ़ लेकिन सब किसी छन्द की राह धुन गये
फूल सूखे किताबों में मिलते नहीं
दिये जलाकर ढूंढ रहे
तमस राह में
दिया जला कर
ढूंढ रहै तकदीर
जिन हाथो में
शेष न कोई
बाकी रही लकीर
कबिरा की
विकलांग लुकाठी
हाथों में थामें
सांस भिखारिन उस
द्वारे पर
आ भिक्षा मांगे
जिस द्वारे पर
पंक्ति बना कर
सत्तर खड़े फ़कीर
बिना सुई की
घड़ियां पहने
इठलाती दीवार
टिका हुआ है
कैलेंडर सा
परसों का अखबार
खबर छपी कल
लुटने वाली
धड़कन की जागीर
रही रिक्त
सन्देश बिना
इक काँधे की झोली
सूनी छत पर
कोई चिरैय्या
आकर न बोली
लक्ष्मण रेखा
खींच खड़ा खुद
जमनाजी का तीर
मंजिल
जीवन पथ पर पल पल उगती रही लालसा इक मंज़िल की
इस मंज़िल पर आकर पाया मन्ज़िल ढूंढ रही खुद मंज़िल
थी मरीचिकाओं में लिपटी इस मंज़िल पर आती राहें
झंझाओ की भूलभुलैया पल पल पर डाले थी डेरे
यात्रा में पाथेय नीङ का कोई अंतर शेष नही था
पता नही था सांझ ढली कब और किस घड़ी उगे सवेरे
इस मंज़िल पर आकर यह मन प्रश्न स्वयं से ये करता है
इस मअंजिल की बहॉग दौड़ में क्या कुछ तुझे हुआ है हासिल
मोड़ मोड़ पर झंझाओ से जूझा एकाकी यायावर
बोता रहा कदमतलियों में लाकर सूरज चांद सितारे
पार किये अनगिन कंटक वन फूल सजाने को इस पथ पर
यज्ञ परीक्षा की आहुति में होम किये सब स्वप्न सँवारे
थी असाध्य जो और असंभव करते रहे तपस्याएं वे
किंतु एक बादल का टुकड़ा भी छाया को न पाया मिल
इस मंज़िल पर आकर जाना, हर इक मंज़िल दिवास्वप्न है
धुँधलाये दर्पण में तिरती किसी धुंये की परछाई सी
करती है सम्मोहित मन को सुखद सुनहरे सपने दर्शा
मौन किसी निर्जन में बजती हो प्रतीत एक शहनाई सी
मंज़िल की राहों पर चलकर पा जाता हर कोई मंज़िल
कोई पाए मनचाही तो बने किसे की भटकन मंज़िल
में इस मंज़िल पर
संस्कार तो बंदी लोक कथाओं मर
संस्कार तो बन्दी लोक कथाओं में
रिश्ते नातों का निभना लाचारी है
जन्मदिनों से वर्षगांठ तक सब उत्सव
वाट्सएप की एक पंक्ति में निपट गये
तीज और त्योहार, अमावस पूनम भी
एक शब्द "हैप्पी" में जाकर सिमट गये
सुनता कोई नही, लगी है सीडी पर
कथा सत्यनारायण कब से जारी है
तुलसी का चौरा अंगनाई नहीँ रहे
अब पहले से बहना भाई नहीं रहे
रिश्ते जिनकी छुअन छेड़ती थी मन में
मधुर भावना की शहनाई, नहीं रहै
दुआ सलाम रही है केवल शब्दो में
और औपचारिकता सी व्यवहारी हैं
जितने भी थे फेसबुकी संबंध हुए
कीकर से मन में छाए मकरंद हुये
भाषा के सब शब्द अधर की गलियों से
फिसले, जाकर कुंजीपट में बंद हुए
बातचीत की डोर उलझ कर टूट गई
एक भयावह मौन हर तरफ तारी है
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उम्र ढलते ही
नव वर्ष २०२४
नववर्ष 2024 दो हज़ार चौबीस वर्ष की नई भोर का स्वागत करने खोल रही है निशा खिड़कियाँ प्राची की अब धीरे धीरे अगवानी का थाल सजाकर चंदन डीप जला...
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