मेरे अस्तित्व पर डाल अभिमंत्रणा

फ़ायलों में उलझते रहे जब नयन
कुंजियों पे रहीं दौड़ती उंगलियाँ
मीटिंगों के बुलावे खड़े पंक्ति में
और सुई
​याँ 
 घड़ी की बनी तितलियाँ
संगणक के मेरे दृश्य पट पर प्रिये
चित्र केवल तुम्हारे उभरते रहे
और सप्याह-महिने मेरे दिन सभी
शाख से साल की टूट झरते रहे

ट्रेन में अपने कम्यूट में यों लगे
तुम मेरे पास ही सीट पर हो बसी
डालती जा रहीं मुझपे सम्मोहिनी
सांस में भर उगी भोर की ताजगी
यों समय तो निरंतर गति में रहा
पर मेरे सामने चित्र इक ही बना
तुम रहे टाँकते प्राण उस बिम्ब में
नैन के मेरे आकाश पर जो तना

जब हवा की चढ़ी पालकी से उतर
धूप आकर मेरा मुख लगे चूमती
तो लगे है तुम्हारी पंखुर उंगलियाँ
होंठ की भर छुअन गाल पर झूमती
नभ पे बादल की अठखेलियाँ देख कर
यों लगे जैसे तुम नृत्य हो कर रहीं
मेरे अस्तित्व पर डाल अभिमंत्रणा
एक अध्याय नव प्रीत का रच रही.

पहले जीवन की क्यारी में

मुरझाये सम्बन्धों को मैं फ़िर जीवन्त बना तो दूँगा
पहले विश्वासों की धरती को थोड़ा हमवार बनाओ

सम्क्बन्धों के बीज सींचती, जब अपनत्व भरी इक गागर
सहज अंकुरित हो बन जाते वटवृक्षों की गहरी छाया
लेकिन उगती हुई उपेक्षा उनको कीकर कर देती है
शेष नहीं रह्ता तब उनके पास एक् चुटकी भर साया

कर तो दूँ संचार ज़िन्दगी का मैं इस सूखे पल्लव में
पहले जीवन की क्यारी में कोमलता तो तनिक उगाओ

याचक बनी आंजुरी उठती नहीं कभी मुट्ठी बन ऊपर
ज्कड़ी ​ हुई अपेक्षाओं से, बन्दी बन रहती घेरे में
समय पृष्ठ की सीमाओं से बढ़ता हुआ अपरिचय उनका
रह जाता है एक शून्य बन, पुता हुआ उनके चेहरे में

खोई हुई अस्मिताओं को मैं शीर्षस्थ बना तो दूँगा
पहले तुम अपने अंत:स में संकल्पों के दीप जलाओ

बहती इस जीवन नदिया के इक तट पर तुम हो इक पर मैं
और हमें जो जोड़ रहा वह पुल है टिका भावनाओं पर
निस्पृहता के धागे उसके आधारों को सुदृढ़ करते
औ विध्वंस टिका है उसका चाहत भरी कामनाओं पर

मैं इस पुल को सबन्धों का शिलालेख कर ज​ड़ तो दूंगा
पहले तुम अभिलाषाओं पर अपनी पूर्ण विराम लगाओ

गीत बने अधरों पर आते


व्यस्तताओं के आँकड़ों में उलझे हुये दिवस की सारिणी से विलग होकर एक अजनबी से पल ने चेतना के द्वार पर दस्तक देते हुये बताया कि साधनारत यह मन माँ शारदा के चरणों में गीत कलश से छलकाते हुये आठ शतदलों की पुष्पान्जलि अर्पित कर चुका है. अतएव आज यह आठसौंएकवीं बून्द गीतकलश से माँ शारदा के चरणों में प्रस्तुत है.


वेदव्यास की अमर कथायें जिन्हें शब्द दे गये गजानन
भोजपत्र पर वाल्मीकि ने जो अंकित कीं राम कथायें
रामचरित मानस जो गंगा के तट पर तुलसी ने गाया
सूरदास ने वर्णित कीं जो माखनचोरी की गाथायें

इनको ही आधार बनाकर मेरे भाव उगा करते हैं
जो वीणा के तारों को छू गीत बने अधरों पर आते

काशी विश्वनाथ आरति के सुर सूरज की अगवानी में
देवसलिल की धाराओं में बोते हैं नूतन इक सरगम
पाखी के कुछ पंख फ़ड़फ़ड़ा उद्वेलित करते समीर को
उसकी चंचलताओं में घुल जाती हैं भावों की सिहरन

मैं उनको ही चुन चुन कर के शब्दों की नैवेद्य सजाता
आँजुरि में से फ़िसल शारदा के चरणों पर वे गिर जाते.

दिलवाड़ा की दीवारों पर अंकित संस्कृतियों का चित्रण
मीनाक्षी, कोणार्क, अलोरा और अजन्ता का अनुमोदन
कुतुब, सीकरी, ताजमहल से पद्मनाभ की गर्भगुफ़ा तक
जमना की रेती पर लेता अंगड़ाई महका वृन्दावन

बन्धी हुई इनके धागों में हाथों में यह थमी लेखनी
जिससे निस्रत शब्द स्वत: ही भित्तिचित्र होकर टँक जाते

किसी नववधू के नयनों में रहा छलछलाता जो पानी
उसमें रहीं तैरती आगत की कुछ इन्द्रधनुष आभायें
या वैधव्य तुषारावृत के निर्जन सी सूनी अंखियों में
जौहर करती हुई निरंतर जीवन की संचित समिधायें

आलोड़ित कर देती हैं ये मन की तंत्री की हर सरगम
गीत, गज़ल औ छन्द सभी बस इनके ही रंगों रँग जाते

तुमने स्वर दे दिया


शब्द थामने की अ​भिलाशा लेकर भटके हुए भाव को
तुमने स्वर दे दिया, अधूरे आधे अक्षर गीत बन गए

सागर की चंचल लहरों से चढ़ते गिरते भाव निरंतर
अधरों का तट छू छू कर लौटे थेमन की गहराई में
 अवरोहो के तल में बैठे सूनी नजरें ताक रहे थे
साथी थे केवल सुर खोये मौन हो चुकी शहनाई मैं

शांत हवाओ की  चादर को  ओढ़े मौन खड़े रागों को
चितवन ने छू लिया तभी वे सहज सुगम संगीत बन गए

वयसन्धि के फिसलन वाले मोड़ो पर जो गए लड़खड़ा
उन उच्छृंखल भावो का तो क्रम से लगना रहा असंभव
छिट पुट इधर उधर आवारा गलियो के शहज़ादे फिरते
सपनो के भी सिंहासने उनकी बांहे पकड़ी हैं कब

अर्थहीन संदर्भ बिना उन भटके शब्दों के पुंजों को
तुमने स्वर दे दिया और वे अल्हड़पन की ​प्रीत बन गए 

कुछ भावो की क्षमता सीमित, छू न सके शब्दो की सीमा
रहे अपरिचित समझ न पाये राग व्यक्तता की परिभाषा
​अवगुंठित अपने में उलझे अपनी पहचानें तलाशते
रहे ढूँढते इक वो पनघट जिससे कोई न लौटा प्यासा

मरुथल की मरीचिकाओं में दिशाहीन भटके भावो को 
तुमने स्वर दे दिया और वे सुखद पलों के मीत बन गए 

राकेश खंडेलवाल
१५ अप्रेल २०१८ 

सूखे कपडे-ज़िंदगी

कल संध्या को 
सूख गए कपडे निकालते 
ड्रायर में से 
जिंममें कुछ थोड़े से नम थे 
और  कहीं पर बाकी थी कुछ 
बासंती सी छुअन गंध की 
उन्हें तहांते , लगा सोचने 
क्या जीवन की गठरी में से बिखर गए जो 
मैले कपडे  
फिर से धुलकर  
नई  गंध ले 
नया  कलेवर  कोई ओढ़े 
सज पाएं जो 
बची उम्र की अलमारी में 
तब संभव है 
हुए नहीं जो पूर्ण अभी तक 
उन सपनों को 
पुनः  सजा लें 

चिर तृप्ति अमरता पूर्ण प्रहर

ओ चांद गगन के तनिक ठहर
है दूर अभी तो बहुत सहर
पाना है शेष अभी मुझको
चिर तृप्ति अमरता पूर्ण प्रहर

सुन अभी अभी तो आई है
यह किरण दूधिया गांव मेरे
हाँ अभी अभी तो साँसों में
ले सुरभि गुलाब के फूल तिरे
छलकी न दृष्टि घूंघट से अभी
थरथराये नहीं स्पर्श पाकर अधर
है दूर अभी हां दूर अभी
चिर तृप्ति अमरता पूर्ण प्रहर

हाँ आतुर हुई उंगलिया कुछ
वीणा में आ जाए कसाव
धड़कन को और धड़कना है
रागों को मिल जाये बहाव
है शेष अभी इन राहों पर
जो शुरू हुआ इक बार सफर 
सुन चंदा दूर अभी भी है
चिर तृप्ति अमरता पूर्ण प्रहर

मिलने है एक बिंदु पर आ
यह सकल धरा विस्तृत वितान
कर बन्द पलक, रख नयन खुले
एक नये जगत को हो प्रयाण
कल्पित हर एक कल्पना की
सीमा से आगे शून्य विवर
सुन चांद, वहीं पर संभव है
चिर तृप्ति अमरता पूर्ण प्रहर

जिस तरह आप चाहें

आदमी हम नही, झुनझुने हो गये
जिस तरह चाहे वैसे बजा लें हमें

हम हैं कठपुतलियां, जो बंधी डोर से
कर रहा है नियंत्रित कोई और है
नाचते हम उसी के इशारों तले
हम पे अपना नही सूत भर जोर है
मौलवी पादरी मंदिरों के गुरु
और पंडे हमारे हैं सर्वोपरी
दिन  दुपहरी घिरे रात या सांझ हो
बस उन्ही की किये जा रहे चाकरी

वो जो चाहें रखें कर खड़ा धूप में
चाह हो, कुर्सियों पर बिठा लें हमे

सोच अपनी हमारी नही है तनिक
अपना मस्तिष्क तो शून्य से है भरा 
जंतरों मन्तरों गंडे ताबीज से
है हुआ ये चमन ज़िन्दगी का हरा
सारे नक्षत्र गुरुओं की अंटी में है
जिन चुड़ैलों को बस में किये मौलवी
चुटकियों में अघोरी की नक्शे छुपे
भेंट बलिदान से मिल सकेंगे अभी

हम करेंगे हकीकत समझ अनुसरण
स्वप्न कैसा भी कोई दिखा दे हमें

राजनीतिक गडरिये  हमें हांकते
हम चले जा रहे झुंड में भेड़ से
सब्ज चश्मे चढ़ाये हुये आंख पर
हम खडे रह गये है बंधे पेड़ से
दिन बदलते रहे रात ढलती रही
हम जहां से चले हैं अभी तक वहीं 
जानते है कि बदलाव सम्भव नही
बस दिवास्वप्न की चूसते रसभरी

शीश नत कर खड़े हम समर्पित हुए
आप भी चाहें, उल्लू बना दें हमें 

गीत नहीं अब लिख​ता हूँ मैं

गीत नहीं अब लिखता हूँ मैं
समयाशिला पर जमी काई है
शब्द गीत के चुनते चुनते
अक्षर अक्षर
​ ​
फिसला हूँ मैं
 
बुनियादों में दिन की जाकर
ठहर गए सूरज के घोड़े
सपन रात की देहलीजों पर
रुके रहे पलकें न छोड़े
ओस किरण के चुम्बन की
अभिलाषाओं के शीश महल के
खंड खंड होती आशा के
टुकड़ों को रह रह कर जोड़े
 
बही हवा की झालारियों में
सेमल के फाहों के जैसा
आवारा हो उड़ता हूँ मैं
 
पथ उद्देश्यहीन हो पथ में
घूमा करते हैं बन फिरकी
ढकी नीम की शाखाओं से
मिलती है नीड़ो की खिड़की
​रि
क्त हुये पाथेय पात्र में
संचय की अक्षमता भर कर
विश्रांति के पल देते हैं
द्वारे पर से फिर फिर झिड़की
 
लुटी कल्पना यायावर की
फटी हुई गठरी में भरकर
देहरी देहरी फिरता हूँ मैं

संदेशो के रहे छूटते 
उगली के पोरो से धागे
भावो की अनुभूति निरंतर
अनुमति अभिव्यक्ति को मांगे
लेकिन जुड़ते नही स्वरों से
मन  की अंगड़ाई के फेरे
अंधकूप सी नीरावताएँ
​छाईं 
 रहती सांझ सवेरे

आईने के पार खड़ी 
परछाई का परिचय तलाशता
निर्निमेष बस तकता हूँ मैं

गीत नहीं अब लिख
​ता  हूँ मैं 

निद्रा के पल क्यों न बाँटे


तुम तो सोते रहे रात भर नींद चैन कीले खर्राटे
रही अनिद्रा प्रश्न उठाती, निद्रा के पल  क्यों न बाँटे
सप्त पदी की लगा दुहाईतुमने हर अधिकार जताया
तुमको जो कुछ लगा हाथ मेंसारा ही तुमने हथियाया
पाँच किलो रबड़ी खाने का जब जब मुझको मिला निमंत्रण
आधी घर पर लानी होगीवरना ! कह कह कर धमकाया
सारे फूल ले गईं चुन करछोड़े हैं मुझको बस काँटे
ये बतलाओ आधे आधेये सब क्यों न मुझसे बाँटे
मैं ग्वाला मथुरा का वासीकॄष्ण कन्हैया का आराधक
माखन मिश्री के मेरे भोगों में तुम बनती हो बाधक
सवामनी के जिजमानों ने भिजवाये जो भरे टोकरे
सब के सब डकार डाले हैं चुटकी भर भी लिया न पाचक
मैं कुछ कहता हूँ तो कहतीपड़े अकल पर मेरी भाटे
ये बतलाओ आधे आधे तुमने मुझसे क्यों न बाँटे
कितने दिन तक और सहूँ मैं कहो तुम्हारी तानाशाही
बीत चुके दस बरसऔर तुम अब भी करती हो मनचाही
रसगुल्लेचमचमकाजू की बरफ़ी सब ही छीन चुकी हो
कम से कम अब एक छोड़ दो मेरी खातिर बालूशाही
एक बार का सौदा करकेरोज उठाता हूँ मैं घाटे
ये बतलाओ आधे आधेतुमने मुझसे क्यों न बाँटे

ड्यौढ़ी पर गुलाब खिलते हैं-

जब जब आई अँगनाई में
फ़ागुन की रंगीन पूर्णिमा
या दोपहरी में चैती की
मिला धूप का स्पर्श गुनगुना
सुधियों की दुल्हन की
आंखों में उग आये स्वप्न सिन्दूरी
विपदाओं की झंझाओं का
हुआ शोर उस वक्त अनसुना
जब से चित्र तुम्हारे उपजे दृष्टि क्षितिज के वातायन पर
तब ही से गुलाब के पौधे नित ड्यौढ़ी पर आ खिलते हैं

लहरें जब मद्दम से स्वर में
आकर के तट से बतियाई
झाड़ी में से जुगनू ने जब
देखी थी अपनी परछाईं
लगी फ़ड़फ़ड़ाने पा
​खी 
 के
पर की घर के पथ में सरगम
सुरमाये नभ के आँचल पर
छवि तब एक उभर कर आई
रँगे दिशाओं के पल्लों पर चित्र सभी वे रहे तुम्हारे
जहाँ दिवस औ निशा चार पल नित ही गले मिला करते हैं

शिशियारी फुलवारी करती
है हिमांत की जब अगवानी
रंग बिरंगे स्वप्न सजाने
लगती श्वेत राह वीरानी
नव जीवन पाने लगते हैं
सूखी शाखाओं पर पत्ते
आलावों पर नाचा करती
नई बाल सोनहली धानी
मौसम की मदभरी हवायें नाम तुम्हारा गाया करती
पंखुड़ियों पर पड़ी ओस से जब उजियारे कण मिलते हैं

नव वर्ष २०२४

नववर्ष 2024  दो हज़ार चौबीस वर्ष की नई भोर का स्वागत करने खोल रही है निशा खिड़कियाँ प्राची की अब धीरे धीरे  अगवानी का थाल सजाकर चंदन डीप जला...