तुमने स्वर दे दिया


शब्द थामने की अ​भिलाशा लेकर भटके हुए भाव को
तुमने स्वर दे दिया, अधूरे आधे अक्षर गीत बन गए

सागर की चंचल लहरों से चढ़ते गिरते भाव निरंतर
अधरों का तट छू छू कर लौटे थेमन की गहराई में
 अवरोहो के तल में बैठे सूनी नजरें ताक रहे थे
साथी थे केवल सुर खोये मौन हो चुकी शहनाई मैं

शांत हवाओ की  चादर को  ओढ़े मौन खड़े रागों को
चितवन ने छू लिया तभी वे सहज सुगम संगीत बन गए

वयसन्धि के फिसलन वाले मोड़ो पर जो गए लड़खड़ा
उन उच्छृंखल भावो का तो क्रम से लगना रहा असंभव
छिट पुट इधर उधर आवारा गलियो के शहज़ादे फिरते
सपनो के भी सिंहासने उनकी बांहे पकड़ी हैं कब

अर्थहीन संदर्भ बिना उन भटके शब्दों के पुंजों को
तुमने स्वर दे दिया और वे अल्हड़पन की ​प्रीत बन गए 

कुछ भावो की क्षमता सीमित, छू न सके शब्दो की सीमा
रहे अपरिचित समझ न पाये राग व्यक्तता की परिभाषा
​अवगुंठित अपने में उलझे अपनी पहचानें तलाशते
रहे ढूँढते इक वो पनघट जिससे कोई न लौटा प्यासा

मरुथल की मरीचिकाओं में दिशाहीन भटके भावो को 
तुमने स्वर दे दिया और वे सुखद पलों के मीत बन गए 

राकेश खंडेलवाल
१५ अप्रेल २०१८ 

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