शब्द रह जाते अबोले
पंथ के चालीस वर्ष
सूखे पत्तों पर बूँदों का
दे विदा शरद को दवारे से, हेमंत कर रहा अब नर्तन
सूखे पत्तों पर बूँदों का यह मधुर छेड देना सरगम
चल पड़े शरद के पीछे ही शाखों से हो पीले पत्ते
फिर लगे चूमने दूबों पर रातों में झरती हुई ओस
झुरमुट से झांक रही गूपचुप तारों की छिटक रही किरणे
हर पल अलसाया चलता है पूरे मौसम में ढाई कोस
दोपहरी ढलते ढलते ही तम आकर पाँव पसार रहा
फिर शमादान में शमओं की बस होती मद्दम सी थिरकन
उगती है भोर उबासी ले झीने कोहरे के पर्दे में
अंगड़ाई ले उठता सूरज मुख देख झील के पानी में
बादल की ओढ़ रज़ाई को बिस्तर में पुनः सिकुड़ जाता
रस्ता तकती रह जाए धूप इक भूली हुई कहानी में
थक थक कर बूढ़ी हुई साँझ चलती है हाथ लुकटी ले
रातों पर चढ़ते यौवन का यह अल्हड़ और खिलंडरपन
नदिया के तट का सूनापन कुछ और हो रहा एकाकी
पाखी दक्षिण दिशि को जाकर अब नया बसेरा करते हैं
देहरी बस कान लगती है कोई आहट सुन पाने को
लेकिन राहों के सभी मोड़ जा और कहीं अब मुड़ते हैं
घाटी के पार क्षितिज पर बस टँक गया शून्य ही दिखता है
बासंती सपनों का आशा नयनों में आँज रही अंजन
नवम्बर २०२१
अ से अगर अमावस लिखते
पट से छनती पुखराज किरण सी
एक ज्योति अंगड़ाई ले
पट से छनती पुखराज किरण सी
नीचे उतरी कदम बढ़ाते
तिमिरांचल सब, हवा हो गया
घिरा धुँध का सघन क़ुहासा
एक निमिष में काट दिया अपनी किरणों से
जले सहज दीपक हज़ार फिर
भूतल पर पग पग पड़ते उसके चरणों से
हल्का हल्का सुरमायापन
शेष रहा जो दिशा पश्चिमी
क्षण भर में ही पीत और कुछ जवा हो गया
खुले दिशाओं के वातायन
धीरे धीरे अगवानी करते प्रकाश की
बही हवाओं की झालर ने
झोली भर भर के उँडेल दी फिर उजास की
ठहरी हुई झील के जल में
मुँह को धोकर, अलसाया सा
नीला अम्बर, एक बार फिर नवा हो गया
जाग गई आशा अभिलाषा
इक दूजे का हाथ थाम कार साथ साथ ही
दीपक राग छिड़ा आँगन में
दीवारों पर अलगनियों पर बिना साज ही
कल तक था छाया सन्नाटा
बूँद बूँद कर जमा हुआ जो
प्रतिध्वनियाँ के स्वर से गूँजित रवा हो गया
मैंने वे संदेश पढ़ लिए
विजय पर्व २०२१
मौसम धुआँसा हो गया है
अब नहीं खिलती यहाँ परचाँदनी रातें
बदल मौसम धुआँसा हो गया है
झील सूखी है , महानद
के किनारे गले मिलकर
रो रहे हैं युग बिताया
एक दूजे से बिछड़ कर
देख कर के यह मिलन, इक
धूप का टुकड़ा रुआँसा हो गया है
है बिलखती आग भी
यह आग जलती देख कर के
मेघ मुख को मोड़ अब
आते नहीं है इस डगर पे
लग रहा कल का समंदर,
सूख कर निर्जल कुआँ सा हो गया है
क्रुद्ध झँझाये चढ़ाती
त्योरियाँ हर घड़ी ज़्यादा
आदमी ने खो दिया है
आप ही अस्तित्व आधा
खेत का उगता हुआ पौधा
गिरा झर कर दुआं सा हो गया है
कृष्ण जरा मुझको बतलाना
कृष्ण ज़रा मुझको बतलाना
जब जब नाम तुम्हारा आता
प्रश्न पूछने लगते पल छिन
कृष्ण ज़रा मुझको बतलाना
क्या तुम दोगे उनका उत्तर
कालिन्दी के तट की सिकता
जिसने पगतलियाँ चूमी थी
वृंद कुंज वे जहां बांसुरी की
धुन, प्रतिध्वनि बन गूंजी थी
वे कदम्ब के वृक्ष बने थे
अलगनियाँ वस्त्राभूषण की
और जहां पर चाँद निशा में
खनक पायलों की ठुनकी थी
गए द्वारका जब से, तब से
एक बार न वापिस आए
कृष्ण ज़रा मुझको बतलाना
क्यों न देखा कभी पलट कर
जिसके अधरों के चुम्बन से
मुरली और सुरीली होती
पल में रूठी, पल में मनती
पल में और हठीली होती
नंद गाँव से बरसाने के
पथ की दूरी शून्य हुई थी
उस राधा की याद तुम्हारे
मन को आ क्या नहीं भिगोती
पटारानी रुक्मिणी और भामा
के संग बातों बातों में
कृष्ण ज़रा मुझको बतलाना
ज़िक्र किया क्या। कभी झिझक कर
फिर जब प्रीत संगिनी मन की
आ महलों में बनी देविका
मुरली में सरगम के नूपुर
कैसे बोती कहो सेविका
भावों की अंतर्ज्वाला में
जलते हुए ह्रदय का आँगन
बना हुआ था आहुतियों को
बूँद बूँद पी रही वेदिका
जब वंशी ने आरोहण से
अवरोहण का मौन ले लिया
कृष्ण ज़रा मुझको बतलाना
क्या सुर गूंजा कहीं उभर कर
राकेश खंडेलवाल
सिल्वर स्प्रिंग, मैरीलेंड
अब उस अतीत के खँडहर में
नव वर्ष २०२४
नववर्ष 2024 दो हज़ार चौबीस वर्ष की नई भोर का स्वागत करने खोल रही है निशा खिड़कियाँ प्राची की अब धीरे धीरे अगवानी का थाल सजाकर चंदन डीप जला...
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प्यार के गीतों को सोच रहा हूँ आख़िर कब तक लिखूँ प्यार के इन गीतों को ये गुलाब चंपा और जूही, बेला गेंदा सब मुरझाये कचनारों के फूलों पर भी च...
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जाते जाते सितम्बर ने ठिठक कर पीछे मुड़ कर देखा और हौले से मुस्कुराया. मेरी दृष्टि में घुले हुये प्रश्नों को देख कर वह फिर से मुस्कुरा दिया ...
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परिभाषा उस एक निमिष की खोज रहा हूँ जिस पल तुमने होठों से न कहते कहते आँखों से मुझको हाँ की थी वह पल जब शाकुन्तल सपने, सँवरे थे दुष्यन्त नयन ...