आपके ही नाम की
कोई संकेत देता रहा
कौन संकेत देता रहा साँझ से
चंद मधुरिम सपन
फिर आइन चैतिया हवाएँ
स्वर्णकलश से धूप उँडेले आती हैं चैतिया हवायें
मिला भोर का स्पर्श गुनगुना
हुई बालियों में कुछ सिहरन
होने लगी फरफ़ूरी तन में
पात पात ने छेड़ीं सरगम
ट्यूब वेल की ताल ताल पर
थिरक रहां है खलिहानों पथ
पगडंडी पर लगी क़तारें
मंडी तक मनता है उत्सव
होली मना, विदाई लेकर लौट चुका है शिशिर गाँव से
तालाबों के तट पर आकर जल तरंग पायल खनकाएँ
होड़ पतंगो से करती सी
उड़े गगन तक धानी चूनर
श्वास जन्म भर महके
चैती ने छेड़ी सारंगी
धानी चूनर उड़े हवा में
मन पाखी बन चहके
झूम उठी पूरी फुलवारी करते अगवानी मधुपों की
कलियों ने लज्जा का घूँघट हौले हौले खोला
बासंती साड़ी में लिपटी पुरवा ने पायल खनकाई
मद्दम स्वर में कचनारों से बेला खुसपुस बोला
झुरमुट में बोगनबलिया के
खुलकर के निशिगंध यूँ हंसी
सम्मोहित गतिमान समय की
श्वास जन्म भर महके
नन्हे अंकुर हरी दूब के पलक मिचमिचा जागे
गौरेय्या ने पंख फड़फड़ा रह रह इन्हें दुलारा
फुनगी ने आवाज लगा कर अपने पास बुलाया
लगा गूंजने दूर कहीं पर भोपा का इकतारा
जमना की रेती में चमके
फागुन की पूनम के तारे
संदल की सुवास लहराई
आज हवा में बह के
खलिहानों में पके धान की स्वर्णिम झाँझर खनके
अभिलाषा के बादल उमड़े हुए व्योम पर छाये
चौपालों पर थाप चंग की, सारंगी से मिल कर
उड़ी उमंगो की सरगम से झूम झूम बतियाए
अनहोनी कुछ हुई
अनहोनी कुछ हुई
उषा ने लिख दिया शब्द इक
नील गगन के कोरे पट पर
प्राची का अध्याय खुला इक
पीत रक्त से वर्ण सजा कर
आँख मसलते हुये भोर ने
जल तरंग से हाथ पखारे
कुछ बूँदें उड़ चली हवा में
खुले देव मंदिर के दवारे
लगी गूंजने शंखों की ध्वनि
दीपशिखा में ज्योति भर गई
आकर फूलों की पंखुरियाँ
प्रतिमा पग पर आप चढ़ गईं
मलय गंध की साड़ी पहने
इठला कर चल दी पुरवाई
अनहोनी कुछ हुई लजा कर
अपने में सिकुड़ी अरुणाई
एक वृक्ष के वातायन से
नन्हे पाखी ने नभ देखा
और उड़ चला पंख पसारे
पढ़ लेने को दिन का लेखा
पीछे पीछे चले धूप के
सोनहली रंगों के धागे
पगडंडी से राजपथों तक
पदचापों के स्वर फिर जागे
चढ़ते हुए दिवस के संग संग
जीवन की गति तीव्र हो गई
पता नहीं चल पाया किस पल
धूप उतरते हुए ढल गयी
संध्या के साजों पर थिरकी
चँदियाई रजनी की पायल
अनहोनी यूँ हुई आज का
दिन, सहसा हो बैठा है कल
मृग तृष्णाओं के जंगल में
मृग तृष्णाओं केजंगल में
इक मरीचिका के कोहरे मेंलिपटे हुए बिताई हमने
हर सुबहा हर शाम
हाँ ये तो था ज्ञात हमारी
दृष्टि भरम में डूबी
फिर भी सपनों में उलझाता
जीवन की है खूबी
उगती रही प्यास होंठों पर
बढ़ते पग के साथ
दिवास्वप्न शिल्पित होने का
पला एक विश्वास
उठ यथार्थ के धरातलों से
बहे हवाओं की लहरों पर
पतझर की नंगी शाख़ों के
तले किया विश्राम
झूठे दम्भों, छलनाओं का
शून्य रहा अंतर में
नैतिकता का अर्थ तलाशा
विध्वंसित जर्जर में
मिलते विष को पीकर अपने
मन को था बहलाया
जिसने दंश दिए, उसका भी
है आभार चुकाया
क्रूर समय का खड़ा महाजन
निज बहियाँ ले द्वार
साँसों की मोहरों के ऋण का
चुकता किया छदाम
रात उजाले की चंदनिया
मिली नित्य बेस्वाद
सपनों से जो भरी अंजुरी
रिस जाती हर बार
दो घूँट चाँदनी के आकर
होंठों तक, फ़िस्कल गए
हम टूटी नौकायें लेकर
सागर में निकल गए
टूटी प्रतिमा के खंडहर सा
छिन्न भिन्न इतिहास
पंगु हुए इस वर्तमान पर
अब लिखना है नाम
राकेश खंडेलवाल
फ़रवरी २०२१
यौवन को दोषों की
शब्द है कृशकाय
अपने कक्ष की एकाकियत में
पक्ष पूरा एक
फिर एकांत में घिर रह गया
बंद हैं वातायनों के
पट, न दस्तक दें हवाएँ
हर दिशा बिखरा रही
अवरोध के संग वर्जनाएँ
यौवन को दोषों की
कथाएँ सुनाने में
जीवन का तारतम्य
शून्य में घिर रह गया
मोड़ सूने फिर हुए
पगडंडियों की यात्रा के
शब्द औंधे मुँह पड़े
यों हाथ छूटे मात्रा के
कंठ से गूंजा स्वर
होंठों की देहरी पर
कुछ कहे बिन
आज फिर चुप रह गया
बिंदु पर रेखाओं के
अब दिग्भ्रमित हो पाँव ठहरे
धुँध में डूबे हुये सब
परिचयों के आज चेहरे
धड़कन से साँसों को
अनुपाती करने में
पास का योग भी
घट कर ही रह गया
धागा उलझ उलझ रह जाए
सतरंगी आँच से
कुछ पलाश रूपभरी सतरंगी आँच से
एक गात उभर रहा सामने नयन के आ
जब भी निहारा है प्रिज़्म वाले काँच से
शतरूपे दृष्टि के वितान पर दिशाओं में
चित्र एक तेरा ही हर घड़ी उभरता है
थरथराती पाँखुरों से फिसलता हुआ तुहिन
द्रवित हुआ लगता है कुहसाइ भोर में
सरसराहटें झरी जो चूनरी के कोरों से
चूमती हैं कलियों को मधुपों के शोर में
मधुलके प्रभावित है मधुवन समूचा ही
पवन भी यहाँ आ के लड़खड़ाता चलता है
गूंजता है अलगोजा आप ही हवाओं में
जल तरंग छेड़ती है नव धुने सितार पर
बादलों के झुंड नृत्य करते हैं व्योम में
फगुनाहट। छाती है गाती मल्हार पर
साधिके कलाओं का एक अंश पा तेरा
पुष्प धन्व सतरंगे रंग में संवरता है
2021 नव वर्ष ( गीत कलश पर ९०१वीं प्रस्तुति )
नई नीति के संकल्पों का हम संबोध लिखें
बीता बरस साथ लाया था पृष्ठ सियाही के
जो था लेखा जोखा सारा अंधकार में खोया
दिन की धूप चुरा ले जाती रही, भरी दोपहरी
और रात का एकाकीपन रिस नयनों से रोया
उगी भोर हाथों में लेकर प्रश्नपत्र थी भटकी
कोई सुलझा सकने वाला उसको मिला नहीं था
रीता हाथों का कासा आख़िर तक भी रीता था
नव आशा के दीप जला अगवानी को थाली में
बिखरे कल के कलुषों का मिल कर प्रतिरोध लिखें
नव वर्ष २०२४
नववर्ष 2024 दो हज़ार चौबीस वर्ष की नई भोर का स्वागत करने खोल रही है निशा खिड़कियाँ प्राची की अब धीरे धीरे अगवानी का थाल सजाकर चंदन डीप जला...
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प्यार के गीतों को सोच रहा हूँ आख़िर कब तक लिखूँ प्यार के इन गीतों को ये गुलाब चंपा और जूही, बेला गेंदा सब मुरझाये कचनारों के फूलों पर भी च...
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जाते जाते सितम्बर ने ठिठक कर पीछे मुड़ कर देखा और हौले से मुस्कुराया. मेरी दृष्टि में घुले हुये प्रश्नों को देख कर वह फिर से मुस्कुरा दिया ...
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परिभाषा उस एक निमिष की खोज रहा हूँ जिस पल तुमने होठों से न कहते कहते आँखों से मुझको हाँ की थी वह पल जब शाकुन्तल सपने, सँवरे थे दुष्यन्त नयन ...