एक अनपढ़ी किताब


जीवन का जो अर्थ सिखाती रही एक अनपढ़ी किताब
इसीलिये मुर्झाये खिलने से पहले ही सभी गुलाब

पांखुर पांखुर हो छितराये हाथों में थामे गुलदस्ते
रही टूटती उंगली छूकर उड़ती हर पतंग की डोरी
राहें रहीं बिछाती पग पग पर लाकर के भूलभुलैय्या
मावस की रातें किस्मत में लिये आस की रही चकोरी

होकर प्रश्न उगे क्यारी में सभी अंकुरित किये जबाब
जीवन के जो अर्थ सिखाती रही वही अनपढ़ी किताब

जितनी पढ़ी किताबें सब थी केवल गल्प कथाओं वाली
सपनों वाले राज कुंवर थे निश्चित किये हुये शहजादी
बंधे हथेली की रेखाओं से  सूरज  चन्द्रमा  सितारे
हो जाती मलयजी जहां पर उठती हुई भयंकर आंधी

निशि  वासर के चक्र जहां पर डाल सकें न कोई दबाब
ऐसे स्वप्न नहीं दिखलाती रही एक अनपढ़ी किताब

हम हैं क्या, है चाह हमारी क्या ये नहीं जानने पाये
रहे खोजते सिर्फ़ उसी को जिसका न मिल पाना तय था
कफ़न ओढ़ कर सोई पूनम के आने का स्वप्न सजा कर
आंजुरि में भर ली वे रातें जिनमें स्वाद पराजय का था

चाह दिखें शफ़्फ़ाक सूरतें ओढ़े रहते किन्तु नकाब
छुई नहीं पर करें शिकायत, रही एक अनपढ़ी किताब

परछाइयों भ्रम बन हमें बहका रही हैं

अब नहीं उपलब्धियों के वृक्ष पर आती बहारें
अब नहीं पौधें प्रयासों की पनपती क्यारियों में
भीगती है अब नहीं संकल्प के जल से हथेली
आस बोई पल्लवित होती नहीं फुलावारियों में
 
बढ़ रहा है  धुंध की परछाई का विस्तार केवल
और निष्क्रियता,घटाएं व्योम से बरसा रहीं हैं
 
छाप जो भी पंथ पर छोडी कहीं भी थी पगों ने
उग रहे उनमें अगिनाती झाड़ियों के वन कंटीले
जिस किसी भी नीड़ से आशीष आश्रय का मिला था
हम उसी को ध्वस्त करते खिलखिलाते हैं हठीले
 
हो पराश्रित हम रहे, स्वीकारते लेकिन नहीं हैं
दंभ की भ्रामक ऋचायें बस हमें उलझा रही हैं
 
हम बने बैठे स्वयं ही तीसरा वह नेत्र शिव का
ध्वंस के ही चित्र बनते आये जिसके पाटलों पर
चक्रवातों की परिधि पर कांपते रहते सदा हम
चाहते हैं नाम बरखा के सुहाने बादलों पर
 
हम कभी  सद्भाव की चूमे नहीं हैं गंध फ़ैली
किन्तु कहते हैं हमें अनूभूतियाँ तरसा रही हैं
 
थरथराते हैं परस यदि चांदनी का मृदु मिले तो
और यदि पुरबाइयों का छोर कोई बांह छू ले  
तारकों की छांह आ भुजपाश में हमको भरे जब
होंठ पर आ जाएँ जब भी  आप ही कुछ गीत भूले 

हम स्वयं पहने अनिश्चय के घने लम्बे लबादे
कह रहे परछाइयों भ्रम बन  हमें बहका रही  हैं 

कब संभव है

आशाओं के अवशेषों से सजे हुए खँडहर के वासी
कब संभव है चन्द्रमहल के जा कर द्वारों को छू आयें

घिस घिस कर हाथों की धुंधली होने लग जाए रेखाएं
दिन उगते ही रातों के हाथों की कठपुतली हो जाएँ
कंगूरों पर जा कर अटकीं अभिलाषा की चढ़ती  बेलें
पलक झपकते हरी दूब की अंकशायिनी आ बन जाएँ
 
जब नाविक की पतवारें ही ले जायें मंझधार नाव को
तब कब संभव थके पथिक के पांव नीड़  को छूने पायें
 
जब सूरज का रथ रातों के जंगल में जाकर के खोये
माली खुद गुलाब की क्यारी में लाकर बबूल को बोये
सगर वंशजों की विनती पर अम्बर से उतरी धारायें
भूल अपेक्षित, बहती गंगा में अपने हाथों को धोयें
 
जिन होठों पर चढ़ते चढ़ते शब्द स्वयं ताले जड़ता हो
उन अधरों पर कब संभव है गीत नये आकर सज पायें
 
कान्हा के कर की बांसुरिया अपनी ही सरगम को निगले
आगत के पृष्ठों पर अंकित हो जायें आकर सब पिछले
विक्रेता बन कर मेले में लिये खोमचा जाने वाला
क्रेता के हाथों अपने सौदे के सँग सँग खुद भी बिक ले
 
तब कब संभव अंगारों  के पथ पर चलती हुई मोम की
गुड़ियायें अपना पूरा कद, पहले के जैसा रख पायें

तुम पर निर्भर

मैंने तो शब्दों में अपने मन के भाव पिरोये सारे
तुम पर निर्भर, तुम जो चाहो वो ही इनका अर्थ निकालो
 
लिखता हूँ मैं शब्द हवा के झीलों में ठहरे पानी के
और पलों के जिनमें पाखी उड़ने को अपने पर तोले
तुम सोचो तो संभव वे पल होलें किसी प्रतीक्षा वाले
तुम चाहो तो हवा कुन्तलों की झीलें नयनों कि होलें
 
शब्द उच्छ्रुन्खल आवारा हैं इधर उधर भटका करते हैं
तुम पर निर्भर तुम चाहो तो गीत बना कर इनको गालो
 
मेरे शब्द गुंथे माला में फूलों की लिख रहे कहानी
तुमको उनमें पीर चुभन की दिखी और हो जाती गहरी
शब्दों ने था लिखा झुका है मस्तक कोई देवद्वार पर
तुमने ढूंढा करूँ प्रार्थना सुनती नहीं मूर्तियाँ बहरी
 
शब्द शब्द में प्रश्न छुपे हैं शब्द शब्द में उनके उत्तर
तुम पर निर्भर उत्तर ढूंढों या प्रश्नों को कल पर टालो
 
मेरे स्वर की,अभिव्यक्ति की  सीमाएं कुछ तुमसे कम हैं 
मैं अपने खींचे वृत्तों में रह  जाता  हूँ होकर बंदी
तुम पर निर्भर, तुम मेरी अभिव्यक्ति उड़ा ले जाओ नभ में
तुम चाहो तो शब्द न रहें तनिक भावना के सम्बन्धी
 
अधरों पर मेरे जो आईं बातें, तुम चाहो तो फिसलें
तुम पर निर्भर, तुम चाहो तो सरगम देकर इन्हें सजा लो

बढ़ती रहीं नित्य बस यही अपेक्षाएं

मुझे विदित हैं अपनी सारी सीमाएं
और तुम्हारी बढ़ती हुई अपेक्षाएं

बच्चे सी जिद चन्दा मुट्ठी में पकड़ें
आसमान को अपनी बाहों में जकड़ें
बहती नदिया पार करें जल पर चल कर
उड़ें क्षितिज के पार  समय को पल पल कर

मरुथल पर बादल बन बरखा बरसायें
यही तुम्हारी मुझसे रही अपेक्षाएं

दूरी के प्रतिमान परों में बंध जाएँ
भंवरे बात तुम्हारी ही बस दोहरायें
कलियों की मुस्कानों से सज रहती हों
हम दोनों की दूरी में आ संध्याएँ

निशा सदा ही चंद्रज्योत्सना बिखराएँ
बढ़ती रहीं नित्य बस यही अपेक्षाएं

जो कि असंभव रहा वही हो ले संभव
दिखने से पहले सपने हो जायें सच
अभिलाषा  का द्वार स्पर्श हो पारस का
चले इशारे ही पाकर सूरज का रथ

हवा करे संचय, ना कुछ भी बिखरायें
रही ज़िन्दगी से भी यही अपेक्षायें

रहा खींचता रह रह परदे

जोवन के इस रंगमंच पर हम  थे रहे व्यस्त अभिनय में
कोई डोरी थाम पार्श्व से रहा खींचता रह रह परदे

यद्यपि बतलाई हमको थी गई भूमिका विस्तारों में
और रटाये गए वाक्य वे, जो सब हमको दुहराने थे
एक एक पग नपा तुला था बँधा मंच की सीमाओं में
और भंगिमायें व्याख्यित थीं जिनमें शब्द रंगे जाने थे

रहा खेलता सूत्रधार पर लिए हाथ में अपने पासे
उसकी मर्जी जिस मोहरे को जैसे चाहा वैसे धर दे

देता था संकेत हमें कोई नेपथ्य खडा  तो होकर
रहा  निगलता बढ़ता हुआ शोर लेकिन सारी आवाजें
द्रश्य  दीर्घा से ओझल हो रहे मंच के तले पंक्ति में
रही  मौन की सरगम बजती सजे हुए  सारे साजों में

अंक बदलते रहे किन्तु हम परिवर्तन को समझ न पाए
रहे ताकते निर्देशक कोई फिर आकर नूतन स्वर दे

प्रक्षेपण से जहां हुआ तय ज्योतिकिरण होना संकेंद्रित
वहां परावर्तन करने को प्रिज्मों ने आकार ले लिया
बिखरी हुई पटकथाओं के मध्य एक गति दे देने का
निर्देशक ने नूतन निर्णय बिना किसी को कहे ले लिया

आतुर होकर रहे ताकते, फिर से जो अभिनीत हो सके
ऐसा कोई नया कथानक फिर लाकर हाथों में धर दे

सिकता छूने में असमर्थ रह गई

झाड़े लगवाये,मजार पर चादर नित्य चढ़ाईं जाकर
गंडॆ मंतर ताबीजों से सारे देवी देव साध कर
तुलसी चौरे दीप जलाये, बरगद की देकर परिक्रमा
दरगाहों की जाली पर रेशम के डोरे कई बाँध कर

थे निश्चिन्त मंज़िलें पथ के मोड़ों तक खुद आ जायेंगी
पर पगतली राह की सिकता छूने में असमर्थ रह गई

उमड़े हुए मेघ जितने भी आये थे चल चल कर नभ में
उनकी गागर रीती की रीती ही भेज सका  रत्नाकर   
तॄष्णाओं को रही सींचती जलती हुई तृषा अधरों की
आता हुआ सावनी  मौसम गया प्यास फ़िर से दहका कर

हवा वारुणी आईं थी तो लेकर लुटी हुई इक गठरी
जली हुई कंदीलें सारी आशाओं की व्यर्थ रह गईं.

सपनों के अंकुर उग आयें बोये बीज एक क्यारी में
मन की, सौगन्धों के सम्मुख सम्बन्धों से रखा सींच कर
लेकिन उगीं नागफ़नियाँ ही  सभी अपेक्षायें ठुकरा कर
दृश्य न बदला चाहे जितना देखा हमने पलक मींच कर

था मतभेद सारथी-अश्वों में बासन्ती मौसम रथ के
सभी चेष्टायें सहमति की करते करते तर्क रह गईं

खुलते हुए दिवस की खिड़की नहीं कर सकी कुछ परिवर्तित
चुरा ले गया किरणें सारी, जाता हुआ भोर का तारा
संध्या ने छत पर रांगोली लेकर काजल जो पूरी थी
उसका रंग बदल न पाया.चढ़ कर कोई रंग दुबारा

खिंची हुईं रेखा हाथों की  हर संभव कोशिश ठुकरा कर
समय पृष्ठ पर शिला लेख बन,बिन बदले कुछ अर्थ रह गईं

किस इंतजार में


खोया  है किस इंतजार में असमंजस में उलझ रहे मन
तू है नहीं शिला कोई भी जिस पर पड़ें चरण रज आकर
 
विश्वामित्री साधें लेकर तूने कितना अलख जगाया
अभिलाषा का दीप द्वार पर निशि वासर बिन थके जलाया
यज्ञ धूम्र ने पार कर लिया छोर सातवें नभ का जाकर
आस शिल्प को रहा सींचता, पल पल तूने नीर चढ़ाया
 
डोला नहीं किन्तु इन्द्रासन सुन  कर अनुनय भरी पुकारें
आई नहीं मेनका कोई तुझ पर होने को न्यौछावर
 
अपने आप बदलती कब हैं खिंची हुई हाथों की रेखा
बैठा है किस इंतजार में, होगा नहीं कोई परिवर्तन
करना तुझको अनुष्ठान से आज असंभव को भी संभव
तेरे द्वारे आये चल कर खुद ब खुद जय का सिंहासन
 
लड़ कर ही अधिकार मिला करता, समझाया इतिहासों ने
थक जायेगा मीत कौरवी साधों को समझा समझा कर
 
अपनी तंद्रा तोड़ याद कर तू कितना सामर्थ्यवान है
तू निश्चय करता है, सागर आकर के कदमों में झुकता
तेरे विक्रम की गाथायें स्वर्णाक्षर में दीप्तिमयी हैं
महाकाल का रथ भी तेरा शौर्य देखने पल भर रुकता
 
नभ के सुमन सजाने को आ जायेंगे तेरी अँगनाई

उन्हें तोड़ने को संकल्पित ज्यों ही हो तू हाथ बढ़ाकर

यशोधरा का सन्देश और एक और पक्ष ---लौट जाओ प्यार के संसार से

इतिहास का दूसरा पक्ष --मान लें -महल से निकलने के पश्चात सिद्धार्थ प्रेम के वशीभूत वापिस आये तो उस समय यशोधरा के मन की बात:-

लौट जाओ प्यार के संसार से सिद्धार्थ अब तुम
पग तुम्हारे बुद्ध बनने की दिशा में उठ गए  हैं

जानती हूँ अब न रोकेंगे तुम्हें कुन्तल घनेरे
और चुम्बक बन न पायेन्गे अधर ये थरथाराते
भंगिमायें नैन की जो बीन्धती थी पुष्प शर बन
इक अदेखी रेख पर गिरने लगी हैं लड़कहडाते

लौट जाओ प्यार के संसार से तुम अब भ्रमित से
मोह के सब पाश ढीले आज पड़ने लग गये हैं

है विदित किलकारियाँ शिशु की नहीं बाधा बनेंगी
जिस डगर की डोर तुमने थाम ली यायावरी मन
इक अबोधी प्रश्नचिह्नित दृष्टि लौटेगी पलट कर 
पार करने में हुई असमर्थ ओढ़े आज तुम तम

लौट जाओ प्यार के संसार से अब जोगिया तुम
छांव वाले वृक्ष के अब पात झरने लग गये हैं

ये समर्पण के लिये फ़ैली हुई दोनों भुजायें
उर्वशी की, मेनका-रतुइ से मिली प्रतिरूप काया 
दूर हैं अब यष्टि की उत्तुंग त्रिवली श्रुंखलायें
ज़िन्दगी के पंथ से है दूर इनकी शांति छाया

भीरुता पूरित  पलायन, दृष्टि में सन्यास मेरी
आज क्या है सत्य ? इस पर चिह्न लगने लग गये हैं

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एक और पक्ष 


है असंभव मान लूँ मैं मीत  यह बातें तुम्हारी
कह रहे तुम लौट जाओ प्यार के संसार से 

मैं नयन में जो लिखी भाषा वही बस जानता हूँ 
अर्थ जो होता अबोले शब्द का पहचानता हूँ 
जो मधुप के औ अली के मध्य में खिचती रही है 
उस अदेखे बन्ध  की सामर्थ्य को मैं मानता हूँ 

जानता हूँ इस डगर पर जीत होती हार से
 किसलिए फिर लौट जाऊं प्यार के संसार से 

यह नगर जिसमें सदा ही भाव के अंकुर पनपते 
बस इसी की वादियों में देवता भू पर उतरते 
इस नगर में घोर तप को भी तपस्वी त्यागते हैं 
नर्तकी के सामने सम्राट भी हैं आन झुकते 

यह नगर निर्मित नहीं है  नियम के आधार पे
है असंभव लौट पाउन प्यार के संसार से 

लौट  भी जाऊं अगर , वापिस कहाँ पर जाऊंगा मैं 
शांतिमय अनुभूतियाँ ये, किस जगह पर पाउँगा मैं 
है तुम्हारे क्षेत्र में क्रंदन,रुदन औ पीर केवल 
घिर उन्हीं के व्यूह में बस रह नहीं क्या जाऊंगा मैं 

मधु=सदन को छोड़ कर लूँ क्या शयन अंगार पे 
किसलिए फिर लौट जाऊं प्यार के संसार से 


राकेश खंडेलवाल

लौट जाओ प्यार के संसार से


लौट जाओ प्यार के संसार से   ओ वावरे मन 
इस नगर में प्रीत के मानी बदलने लग गए हैं 

टूट कर बिखरी हुई जन्मांतरी सम्बन्ध डोरी 
हो चुकीं अनुबंध की कीमत लिखे कुछ कागज़ों सी 
साक्ष्य में जो पीपलों कीथीं कभी सौगन्ध सँवरी
हो गई हैं पाखियों के टूट कर बिखरे परों सी

इस नगर  की वीथियों में भीड़ बस क्रेताओं की है से 
अर्थ वाले शब्द के अब भाव लगने लग गए हैं. 

जो विरासत थी हमारी प्रीत बाजीराव वाली
जो लवंगी ने लिखी थी स्वर्ण वाले अक्षरों से
प्रीत जिसने थे रचे इतिहास के पन्ने हजारों
बीन्धते मीनाक्षी को बिम्ब के इंगित शरों

इस नगर में गल्प वाले बन गये हैं वे कथानक
चिन्दियाँ होकर हवा के साथ उड़ने लग गये है

लौट जाओ प्यार के संसार से  कवि तुम धरा पर 
अब न विद्यापति न कोई जायसी को पूछता है 
गीत गोविन्दम हुये  निष्कासिता इसकी गली से
कोई  राधा कृष्ण की गाथाएं सुन  ना झूमता है 

इस नगर में लेखनी लिख पाएगी ना उर्वशी को 
कैनवास पर चित्र खजुराही उभरने लग गए हैं 

नव वर्ष २०२४

नववर्ष 2024  दो हज़ार चौबीस वर्ष की नई भोर का स्वागत करने खोल रही है निशा खिड़कियाँ प्राची की अब धीरे धीरे  अगवानी का थाल सजाकर चंदन डीप जला...