पट से छनती पुखराज किरण सी

 



एक ज्योति अंगड़ाई ले
पट से छनती पुखराज किरण सी
नीचे उतरी कदम बढ़ाते
तिमिरांचल सब, हवा हो गया

घिरा धुँध का सघन क़ुहासा
एक निमिष में काट दिया अपनी किरणों से
जले सहज दीपक हज़ार फिर
भूतल पर पग पग पड़ते उसके चरणों  से
हल्का हल्का सुरमायापन
शेष रहा जो दिशा पश्चिमी
क्षण भर में ही  पीत और कुछ जवा हो गया

खुले दिशाओं के वातायन
धीरे धीरे अगवानी करते प्रकाश की
बही हवाओं की झालर ने
झोली भर भर के उँडेल दी फिर उजास की
ठहरी हुई झील के जल में
मुँह को धोकर, अलसाया सा
नीला अम्बर, एक बार फिर नवा हो गया

जाग गई आशा अभिलाषा
इक दूजे का हाथ थाम कार साथ साथ ही
दीपक  राग छिड़ा  आँगन में
दीवारों पर अलगनियों पर बिना साज ही
कल तक था छाया सन्नाटा
बूँद बूँद कर जमा हुआ जो
प्रतिध्वनियाँ के स्वर से गूँजित रवा हो गया

मैंने वे संदेश पढ़ लिए


​वे सब पत्र जिन्हें तुम अब तक
लिख न सके व्यस्तताओं में 
मैंने वे संदेश पढ़ लिए
अब कुछ भी अव्यक्त नहीं है 

अरे सुमिखि तुमने क्या सोचा
मैं न समझता मन की भाषा
कालिन्दी के तट आ रहता
क्या बाँसुरिया का स्वर प्यासा 
बिन पैंजनिया के खनके ही
देख समझ ली पग की थिरकन
ज्ञात मुझे है आदि अंत सब
पलती जो मन में अभिलाषा

कहाँ रहे आवश्यक मेरे
और तुम्हारे मध्य शब्द कुछ 
मन से मन का सम्प्रेषण तो 
पत्रों का अभ्यस्त नहीं है 

तुमने उस दिन मणकामेश्वर
के आँगन से पुष्प उठा कर
अपन जूड़े में टंकवाया
मेरे हाथों से सकुचाकर
उस पल में कुंतल की सिहरन
से उँगलियाँ तरंगित होकर
समझ गई वो भाव, तुम्हारे 
मन में जो उस पल था आया

सौगंधों की देख रेख में
जो सम्बंध जुड़े थे अपने
अब उनकी अटूटताओं पर 
क्योंकर मन आश्वस्त नहीं है

शतरूपे ! हमने रोपे हैं
तुलसी के विरवे आँगन में
उनको बढ़ना है अम्बर तक
जन्म जन्म के अनुशासन में
क्षणिक किसी झंझा के पल की 
क्या बिसात विचलित कर पाए
एक दूसरे के साधक हम
लीन हुये हैं आराधन में

अनुबंधों के राजमार्ग पर
संदेशों की चाहत कैसे
शाश्वतता की अंगनाइ में
कुछ भी तो संशप्त नहीं है 

विजय पर्व २०२१


ये विजय पर्व अबके बरस जब मने
चिह्न पैंडेमिकी न कोई शेष हो
धुँध छट जाए हर, संशयों से घिरी
धूप की खिलखिलाहड सुनहरी रहे

वर्ष बीत, पलट लौट आइ ऋतु
वो ही साड़ी विदाई की पहने हुए
कुंद होती हुई चेहरे की दमक
पीत से कृष्णा गहने बदन के हए
एक आशा का बस लड़खड़ाता हुआ
स्वप्न नयनों की कोरों पे अटका हुआ
टोकरी एक एकाकियत की भरी
है शिथिल,अपने काँधे पे ढोते हुए 

चुप्पियों के पहाड़ों से अब फूट कर
सरगमी राग का कोई झरना बहे 

एक आभास के पाटलों पे घिरी
रह गई ज़िंदगी की सभी हलचलें
चेहरों पे मुखौटे है चिपके हुए
असली सूरत को लगती हुई अटकलें
फ़ेसबुक लाइव है ज़ूम की धूम है
किंतु अपनत्व का है सिरा ही नहीं 
एक ही आस है शीघ्र ही खुल सकें
घर के द्वारों पे जकड़ी हुई आगलें

लौट कर चल पड़ें अपनी चौपाल पर 
इस विजय पर्व पर यत्न ये ही रहे 

याद की पुस्तकों में हुए क़ैद जो
मानचित्रों के धूमिल हुए रास्ते
एक कच्ची डगर भी नहीं शेष है
देहरी पर रुके, पाँव के वास्ते 
एक आशा की किरचों में टूटी किरण
ढूँढती उँगलियाँ, जो उन्हें चुन सकें 
और विक्षिप्त मन खोजता माप वे
जो की बढ़ती हुई दूरियाँ नापते

इस विजय पर्व पर कामना है यही
जो हुआ, सिर्फ़ इतिहास होकर रहे 

राकेश खंडेलवाल
विजय पर्व २०२१ 

मौसम धुआँसा हो गया है

 

अब नहीं खिलती यहाँ पर
चाँदनी रातें
बदल मौसम धुआँसा हो गया है 

झील सूखी है , महानद
के किनारे गले मिलकर
रो रहे हैं युग बिताया
एक दूजे से बिछड़ कर 
देख कर के यह मिलन, इक 
धूप का टुकड़ा रुआँसा हो गया है 

है बिलखती आग भी
यह आग जलती देख कर के 
मेघ मुख को मोड़ अब
आते नहीं है इस डगर पे
लग रहा कल का समंदर, 
सूख कर निर्जल कुआँ सा हो गया है 

क्रुद्ध झँझाये चढ़ाती
त्योरियाँ हर घड़ी ज़्यादा 
आदमी ने खो दिया है
आप ही अस्तित्व आधा 
खेत का उगता हुआ पौधा 
गिरा  झर कर दुआं सा हो गया है 

कृष्ण जरा मुझको बतलाना

 कृष्ण ज़रा मुझको बतलाना

 


जब जब नाम तुम्हारा आता
प्रश्न पूछने लगते पल छिन
कृष्ण ज़रा मुझको बतलाना
क्या तुम दोगे उनका उत्तर

कालिन्दी के तट की सिकता
जिसने ​पगतलियाँ​ चूमी थी
वृंद कुंज वे जहां बांसुरी की
धुन, प्रतिध्वनि बन गूंजी थी
वे कदम्ब के वृक्ष बने थे
अलगनियाँ वस्त्राभूषण की
और जहां पर चाँद निशा में
खनक पा​यलों की ठुनकी थी

गए ​द्वारका ​ जब से, तब से
एक बार न वापिस आए
कृष्ण ज़रा मुझको बतलाना
क्यों न देखा कभी पलट कर

जिसके अधरों के चुम्बन से
मुरली और सुरीली होती
पल में रूठी, पल में मनती
पल में और हठीली होती
नंद गाँव से बरसाने के
पथ की दूरी शून्य हुई थी
उस राधा की याद तुम्हारे
मन को आ क्या नहीं भिगोती

पटारानी रुक्मिणी और भामा
के संग बातों बातों में
कृष्ण ज़रा मुझको बतलाना
ज़िक्र किया क्या। कभी झिझक कर

फिर जब प्रीत संगिनी मन की
आ महलों में बनी देविका
मुरली में ​सरगम ​ के नूपुर
कैसे बोती कहो सेविका
भावों की अंतर्ज्वाला में
जलते हुए ह्रदय का आँगन
बना हुआ था आहुतियों को
बूँद बूँद पी रही वेदिका

जब वंशी ने आरोहण से
अवरोहण का मौन ले लिया
कृष्ण ज़रा मुझको बतलाना
क्या सुर गूंजा कहीं उभर कर


​राकेश खंडेलवाल 

सिल्वर स्प्रिंग, मैरीलेंड 

 

अब उस अतीत के खँडहर में

 


नित साँझ ढले लौटा करता, मन उस अतीत के खंडहर में
जिसमें धुँधुआसे चित्रों का कोई अवशेष नहीं बाक़ी 

उन उजाड़ चुके गलियारों में अब कोई पाँव नहीं धर्ता
जिनकी रज बनी अलकनंदा थी पग का शृंगार सजाने को 
जिनकी नक़्क़ाशी उतरी थी मेंहदी के बूटी में आकर
पाँखुर सी छंद उँगलियो को दुल्हन की तरह सजाने को 

 अब वहाँ हवाओं का कोई झोंका भी नहीं झांकता है 
बिखरी है दृष्टि पटल पर बस मरु के रंगो वाली माटी

वे बरादरियाँ जिनमें थी दोपहरी रहती आधलेटी
वो बिछी धूप का आँगन जो हर रोज़ सुखाता था बाडियाँ
कुछ दलती हुई डरेंगे पर डालो की सरग़म के सुर में
थी। ताल मिलाते चर मर चर पेंगे ले झूलो की कड़ियाँ 

क्यों लौट रहा मन आवारा फिर फिर वापिस उन गलियों में
जिन मधुशालाओं के दवारे अब छोड़ गई सुधि की साक़ी

जिसके पीछे बूढ़े बरगद की छाया में संध्या ढलती
दरवेश कथाएँ चंगो पर दे थाप झूमती रहती थी 
सारंगी अलगोजे से मिल बमलहरि को छेड़ा करती 
हो मगन गीत के बोलों पर पैंजनिया खनक करती थी

क्या पता तुझे ? कुछ प्राप्त नहीं हो पाएगा उस स्थल पर से
सब लील चुकी है तथाकथित उन्नति बन करके सुरसा सी 

चुनौती कर सकूँ स्वीकार तेरी


ए नए दिन आज फिर संकल्प नव ले आ गया तू 
दे मुझे साहस चुनौती कर सकूँ स्वीकार तेरी 

भोर जब अगवानियों का दीप तेरे पथ जलाकर
हैं रखे, हंसते अंधेरे तलघरों में मुस्कुरा कर
सावनी श्यामल घटाओं से किए गठजोड रहते
लीलने सारे उजाले, सूर्य से नज़रें। चुरा कर 

पास में रख लूँ उजासें तीलियों में साथ अपने
और लड़ लूँ मैं तिमिर से जब घिरें बदली अंधेरी 

दे मुझे निर्णय, थमाता है नया पाथेय कर में
जानता मैं पथ अजाने, किंतु गति रखनी निरंतर
साँझ के हर नीड़ का आश्रय सदा होता क्षणिक है
पाँव को रफ़्तार देनी मंज़िलों को लक्ष्य रख कर 

मैं समझ सारे रहा इंगित, मुझे तू दे रहा है 
देखता हूँ वे छवि जो ला क्षितिज पर हैं चितेरी

हैं विदित तुझको मेरी सीमाएँ औ’ अज्ञानताएँ
दे मुझे शिक्षा करूँ मैं साध्य को अपने सुनिश्चहित 
और दे आलोक इतना अनुसरण पगचिह्न का जो 
भी करें, हो जाएँ उनकी राह का हर मोड़ दीपित 

मैं नज़र के क्षेत्र की सीमा मिटा कर बढ सकूँ अब
चीन्ह  सम्भावनाएँ, साँझ  के  पट जो उकेरी 



ताना बाना बुने कबीरा


एक लुकाटी एक कठौती एक चदरिया चाहे जीवन
निशा दिवस फिर भी करघा ले ताना बाना बुने कबीरा

कते सू​त ​ को बुनते बुनते खो देता संतोष हृदय का
धुनिया से माँगे धुन कर दे उसको वह रेशम के धागे
बढ़ती आकांक्षाओं की सीमाए विस्तृत होती जाती
​मुंड़ी हुई भेड़ों के दवारे जाकर ऊन भीख में माँगे

भूला है मंज़िल के पथ पर संचय साथ नहीं चलता है
यायावर सब एक सरीखे, रहे धनिक या रहे फ़क़ीरा

धूप छाँह की आँखमिचौली का पीछा करते करते ही
एक वृत्त में चक्करघिन्नी बना हुआ ही घूमा करता
कैलेंडर की शाखाओं से झरते है दिनमान निरंतर
बिना ध्यान के बस अपनी परछाईं में ही खोया रहता

आपाधापी धमाचौकड़ी की बिसात फैला कर अपनी
सपना देखे एक चाल में ही प्यादे से बने वजीरा

केवल अपना बिम्ब निहारे उगी भोर से ढली साँझ तक
प्रतिबिंबों की इक मरीचिका का प्रतिपल ही पीछा करता
कर काँधे की छागल ख़ाली तपते मरु की पगडंडी पर 
स्वाति मेघ के घिर आने की असफल एक प्रतीक्षा करता

ज्ञात उसे है अंतर्मन की शांति , तोष का पथ देती है
फिर भी खोजा करता उस​को ​ पीट पीट कर ढोल मंजीरा 

आहना राधा गाला

 


एक झंकार उठ बीन के तार से
स्वर्ण नूपुर की ख़नकों से मिल कर गले
चाँदनी की किरण से फिसलते हुए
आज आइ उतर कर मेरी गोद में 

एक नन्ही कली  की मृदुल पाँखुरी
थरथराते हुए नव पुलक भर गई
रश्मियाँ हाथ में ले उगी भोर की 
अपने अस्तित्व का नाम नव लिख गई

मलयजी स्पर्श पाकर के सिहरी हुई 
झील के नीर में जो मची हलचलें 
उनमे पड़ते हुए बिम्ब से सज रही
रात के अंत पल में उगे स्वप्न सी 

मन में आह्लाद की गूंजने लग गई
अनगिनत आज सहसा ही शहनाइयाँ
अपने आराध्य का अंश पा सामने
शब्द करने लगे पृष्ठ पर नृत्य आ

आओ स्वागत तुम्हारा है  ओ आहना
ज़िंदगी में नई वाटिकाएँ खिलें
और अनुभूतियों से सुधा सिक्त हों
आगतो के निमिष तुमसे मिल कर गले

मौन हुए स्वर

 

न तो कुछ लिखने का ही है और न कुछ पढ़ने का मन है
नयनों की ड्यौढ़ी पर आकर अटका हुआ एक सावन है

कल तक जितना था कविता से उतना ही हूँ आज अजाना
शब्दों के गहरेपन की सीमाओं को मैं न पहचाना
भावों से लेकर वाणी में ढलने तक अक्षर की काया
कितने रंग बदल लेती है, नहीं समझ 
​में 
 संभव आना

यह मेरी ही अक्षमता है, रही सोच की सीमित सीमा
तब ही तो भाषा ने मुझसे ठानी हुई तनिक अनबन है

मौन हुए स्वर जब भी चाहा बातें व्यक्त करूँ मैं मन की
बिना दीप के रही सर्वदा तुलसी उगी मेरे आंगन की
नैवेद्यों की उंगली पकड़े संझवाती के सूने पथ पर
चलती रही आस की धुन पर बजती हुई ताल धड़कन की

रूठ चुके आराधित से कब शेष रहा है कोई अपेक्षित
सिमट गया पूजा की थाली में हर संवरा आराधन है

हुआ समर्पित चार कदम चल कर पथ में ही जो यायावर
नीड़ नहीं पाथेय नहीं न मिला उसे निशि या फिर वासर
अपनी सजी हुई दूकानों को समेट अपने कांधे पर
खुद खरीदता,खुद ही बेचा करता, है कैसा सौदागर

चुप होकर बहार के झोंके बैठे हाथ हाथ पर धर कर
बजता है हर एक दिशा में बस पतझर का विज्ञापन है

राकेश खंडेलवाल 


नव वर्ष २०२४

नववर्ष 2024  दो हज़ार चौबीस वर्ष की नई भोर का स्वागत करने खोल रही है निशा खिड़कियाँ प्राची की अब धीरे धीरे  अगवानी का थाल सजाकर चंदन डीप जला...