भावना के पखेरू बिना पंख के एक परवाज़ को फ़ड़फ़ड़ाते रहे
बाढ़ की ढेर संभावनायें लिये आये घन, श्याम नभ को बनाते रहे
अक्षरों से बढ़ीं शब्द की दूरियाँ, स्वर अधर की गली से परे रह गया
गीत जो कल हमारे लगे थे गले, आज नजरों को वो ही चुराते रहे
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नव वर्ष २०२४
नववर्ष 2024 दो हज़ार चौबीस वर्ष की नई भोर का स्वागत करने खोल रही है निशा खिड़कियाँ प्राची की अब धीरे धीरे अगवानी का थाल सजाकर चंदन डीप जला...
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प्यार के गीतों को सोच रहा हूँ आख़िर कब तक लिखूँ प्यार के इन गीतों को ये गुलाब चंपा और जूही, बेला गेंदा सब मुरझाये कचनारों के फूलों पर भी च...
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परिभाषा उस एक निमिष की खोज रहा हूँ जिस पल तुमने होठों से न कहते कहते आँखों से मुझको हाँ की थी वह पल जब शाकुन्तल सपने, सँवरे थे दुष्यन्त नयन ...
6 comments:
भावनाओं का ज्वर जब दिल पर हावी होता है तब यहीदिल की हालत हो जाती है यह चंद शब्द बहुत कुछ कह गए !!
बहुत गहरे भाव!!!
अक्षरों से बढ़ीं शब्द की दूरियाँ, स्वर अधर की गली से परे रह गया
गीत जो कल हमारे लगे थे गले, आज नजरों को वो ही चुराते रहे
गहरे कथ्य कहने में आपकी पंक्तियों का कोई सानी नहीं...
***राजीव रंजन प्रसाद
सुन्दर.
मधूलिका
गीत जो कल हमारे लगे थे गले, आज नजरों को वो ही चुराते रहे
bahut sundar
ओह !!!
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