आहना राधा गाला
मौन हुए स्वर
नदी किनारे घूमे
आज सांझ फिर आ लहराए सुधि के आँगन में वे पल जब
नदी किनारे घूमे थे हम इक दूजे का हाथ थाम कर
आज यहां इस नदिया के तट बिखरे हैं कुछ अनचाहे पल
जो निष्कासित हुए ज़िंदगी के रोजाना के गतिक्रम से
एक बार उपयोग किए जाने के बाद फेंक दी जाती
वही वस्तुएँ घोल रही थी विष तट पर आबे-जमजम के
दूभर हुआ पाँव भी रखना अब
नदिया के तीर एक भी
सुबह दुपहरी का सूनापन, अब है छाने लगा शाम पर
नदिया का तट जिस पर कल तक थी
कदम्ब की शीतल छाया
जिसके साये म मुरली की धुन पर
पग की थिरकी पायल
जहां गगन से झरी ओस में डूबी
हुई चाँदनी किरणे
मन को कर ज़ाया करती थी बींध
पुष्प के शर से घायल
आज वहाँ पर उगे हुये हैं कीकर
औ बबूल के झुरमुट
नष्ट हुई नैसर्गिक सुषमा, नयी सभ्यता के मुकाम पर
जितना दोषी मैं हूँ उतने तुम
भी तो हो प्रियवर मेरे
हमने खुद ही तो बोयी है नागफनी
आँगन में लाकर
पीपल, नीम, बरगंदी छाया को हमने तलाक़ देकर के
कृत्रिम फूल सजाये घर में
तुलसी के विरवे उखाड़ कर
साँसें बंद सिलिंडर में है, पानी भरा रखा बोतल में
बंद हुए जीते कमरों में, खुली हवाओं को तमाम कर
कृष्ण नमन
वे सुनहरे पल
जानते हो मीत ! सुधियों की घनी अमराईयों में
याद के पाखी निरन्तर डाल पर आ बोलते हैं
अबअसह बन गया यह जीवन
पीपल की छाहों वाले दिन
पीपल की छाहों वाले दिन
साँझ ढले से चौपालों की
वे अद्भुत दरवेश कथाएँ
चंग झूमते ढपली के संग
बमलहरी के सुर खनकाएँ
अलगोजे पर तान लगाता
मन मन मुदित हुआ इक भोपा
आल्हा उदल , गोरा बादल
शौर्य भरे गीतों को गाएँ
गुड़ की डली, बेझरी रोटी
मिर्ची और प्यार वाले दिन
बनती हुई चाक पर गगरी
तप अलाव में रूप सजाना
रंग कर गेरू से खाड़ियाँ से
इंडुर चढ़ पनघट तक जाना
कंगन और मुंदरी में होती
कानाफूसी को सुन सुन कर
जेहर पर जा पाँव पसारे
गुप चुप पायल को बतलाना
गन्ने का रस और शिकंजी
आम और लस्सी वाले दिन
ठंडा ख़रबूज़ा, तरबूज़ा
क़ुल्फ़ी एक मलाई वाली
रह रह कर वह पास बुलाती
पके फालसों वाली डाली
कुछ अमरूद इलाहाबादी
खिन्नी और रसभरी मीठी
मन फिर। अहीन लौटना बागे
पर सीमाएँ हुई सवाली
रबड़ी और फ़लूदे के संग
मौसम्मी के रस वाले दिन
अजब वक्त यह आया
पता नहीं किस और छोर से अजब वक़्त यह आया
खेल खिलाता है
खेल खिलाता है जीवन में निशा दिवस वह एक प्रशिक्षक
क़ैद रहा जिसकी मुट्ठी में हर परिणाम पूर्व स्पर्धा के
चाहे सौ मीटर की दूरी या फिर चाहे मैराथन हो
तैरें कोई पीठ पर लेटा या फिर तितली बना हुआ हो
एक रिले की हिस्सेदारी या फिर हो अपना बलबूता
या फिर एक टीम का ज़िम्मा उसके काँधे टिका हुआ हो
प्रतियोगी को मिला हुआ अपना दायित्व निभाना ही है
क्षमता के अनुरूप, भूल कर क़िस्से अपनी व्यथा कथा के
धनुष हाथ हो तो प्रत्यंचा का तनना भी आवश्यक ही
लक्ष्य वेध के लिए ज़रूरी तन का, मन का संकेंद्रण ही
ध्येय प्राप्ति के लिए सुलभ वह कर देता है उपकरणों को
मौक़ा देकर करवाता है नए पंथ का अन्वेषण भी
कुछ प्रयास तो सुलभ किए हैं निर्णय को हासिल करने को
पा जाता है उन्हें वही जो संकल्पित है बिन दुविधा के
जीवन की चौसर पर खेला जाता खेल अनवरत पल छिन
कोई खेले साँसे गिनते, कोई दिल की धड़कन गिन-गिन
लेकिन जीत उसी की होती जो कर्मांयवाधिकारस्ते
हो कर खेला करता है परिणामों की चिंताओं के बिन
ओ अनुरागी आज खेल में उतरो खेलो, तब ही सम्भव
आँगन के तुलसी चौरे पर
नव वर्ष २०२४
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