बसंत ऋतु

जो बसन्ती चादरों का स्वप्न था
बर्फ़ की इस शुभ्रता में खो गया
आपने दे दी शिशिर को जो विदा
आ यहाँ उसका बसेरा हो गया
राह पर, पगडंडिय्पं-दालान में
है असंभव पां टिक पायें कहीं
शून्य से जब अंश नीचे दस गिरा
तापमापी यंत्र हो चुप रह गया. 

और हम पंचांग में अंकित रहे 
पंचमी के ज़िक्र को पढ़ते रहे 

शारदे के हाथ से वीणा मिली 
उंगलियां झंकार लें, असफल रही  
हाथ को जकड़े शिथिलतायेँ रहीं 
कोई अक्षर लिख नहीं पाए कहीं 
देह पर  तह बन रहे अटके कई 
कोट,स्वेटर और मफलर टोपियां 
ओढ़ कर हस्त्राण भी, ठिठुरा करी 
कंपकंपाती हाथ की सब उंगलियां 

है बसन्ती ऋतु कलेण्डर कह रहा 
दिन मगर सब शीत में जकड़े रहे 

नील अम्बर बादलों में खो गया
बूँद गिरते भूमि पर जमती रही
पीत आभा फूल कलियों की गुमी
बर्फ़ की तह के  तले जमती रही 
सूर्य रथ की है तितर वल्गाएँ सब
 भूल प्राची की प्रतीची की दिशा 
देख नभ को जानना सम्भव नहीं 
नाम मौसम का ,समझ पाना पता

और मौसम की ठिठोली देखते 
दाँत में बस उँगलियंधरते rahe

सूरज की छवियाँ दिखलाने


जो कल तक छलते थे हमको सपनो के आश्वासं देकर
आए है इस बार हमें वे सूरज की छवियाँ दिखलाने

वायदों की कजराई  ने थे रोज  साँझ नयनों में आँजे
देते हुए  दिलासा उगती हुई भोर में सच हो लेंगे
किन्तु भोर की प्रथम रश्मि के आते आते हुए तिरोहित
संभव रहा नहीं फिर वे इक अंश मात्र भी शिल्पित फोगे

कितने बरस बीतते आये, एक इसी धुन को दोहराते
वे आये हैं उन्ही धुनों को नए राग में फिर सिखलाने

ढलते हुए और नव उदिता सूरज की छवियों का अंतर
कब कर पाई है अभाव की ऎनक के पीछे से नज़रें
इश्क़ मोहब्बत की ग़ज़लों की हों या बासी अख़बारों की
तरसी हुई आस को लगती एक सरीखी सारी सतरें

महीने भर के रोजे रख कर जो आतुर है इफ़्तारी को
वे लाए है उसको मीनू अगले महीने  का समझाने

सूरज की छवियाँ बदली कब, बदले मौसम की करवट से
नयनी की मरीचिकाओं ने ही हर बार रखा भरमाकर
रंग रश्मियों ने तो बदला नहीं कभी भी ऋतु हो कोई
कुछ रंगीन काँच के टुकड़े भ्रमित करें उनको छितराकर

उतर चुकी है चढ़ी कलाई की एक एक कर सारी परतें
वे लाये हैं  खोटे सिक्के एक बार फिर  यहाँ भुनाने

उसमें कोई छंद नहीं था

गीतों से अनबन थी मेरी 
कविता से अनुबंध अँहीं था 
इसीलिये जो लिख पाया मैं 
उसमें कोई छंद नहीं था 

​लय ​ की गति से अनजाना मैं 
कैसे लिखता कोई कहानी 
क्रमश​:ता ​ की बहती धारा
लेशमात्र सुधि ने न जानी 
रहे कथानक सभी अधूरे 
शब्द नहीं क्रम से लग पाये 
सरगम से थे रहे अपरिचित 
अधरों ने जो स्वर दुहराये 

मन में उठे विचारों में से 
कोई भी स्वच्छंद नहीं था 
इसीलिये जो लिख पाया मैं 
उसमें कोई छंद नहीं था 

ग़ज़लों में ​बहरों की ​बंदीश 
औ' रदीफ़ से जुड़े काफिये 
नहीं समझ ये तनिक आ सका 
रुक कर कब मु​ड़ गए काफिये 
नहीं संतुलन होने पाया 
मिसरा उला और सानी ​ में 
तितर बितर अहसास समूचे 
उलझ रह गए मनमानी में 

बन न  सका मधुपर्क बूँद भर 
क्योंकि पास मकरंद नहीं था 
लिख पाई जो कलम आज तक 
उसमें कोई छंद नहीं था 

नवगीतों ने किया न आकर
कभी लेखनी का आलिंगन
दोहों और सवैय्यों से भी
रहा अनछुआ मेरा आँगन
 कविता को समझूँ इस में ही
दिवस निशा हो जाते हैं गुम
झरते जाते कैलेन्डर से
यूँ ही दिनमानों के विद्रुम

जोड़ तोड़ में, तुकबन्दी में
किंचित भी आनन्द नहीं था
इसीलिये मेरे लिखने में
जो कुछ था वह छन्द नहीं था

पृष्ठ बिखरे संहिताओं के

आप जो बदले शिकायत है नहीं कुछ भी
आजकल बदले नज़रिए देवताओं के

इंद्र को गिरिधारियों का
अब नहीं है भय
बाँटता ही है नहीं
वो काश का संचय
हो गए दिन ज्येष्ठ वाली प्रतिपदाओं से

अब नहीं धन्वन्तरि की
आज कल गिनती
द्रोण गिरि पर अब
नहीं संजीवनी उगती
पृष्ठ बिखरे चरम-सुश्रुत संहिताओं के

है नहीं सम्भावना कुछ,
आस हो पूरी
याकि मिट पाए तनिक
भी, मध्य की दूरी
पाँव डिगते कब जुड़ी कुछ आस्थाओं के

नए वर्ष के नये सूर्य

हे नए वर्ष के नये सूर्य 
इस बार उगो ले परिवर्तन

कुछ प्रखर करो धुँधली  किरने
हो नवल ऊर्जा कुछ भरने
ये बरस बरस का गहराता 
तम लगे इस बरस कुछ छँटने
मन के अँधियारे कोनो में
इक नई ज्योति फिर से जागे
सूखी नयनों की झीलों में
नव  स्वप्न लगे फिर से तिरने

यूँ करो कि कैलेंडर कर ले 
हर रोक तुम्हारा अभिनंदन 

इस बार बदल कर पंथ चलो 
उन रहीं उपेक्षित राहों पर 
जिन पर विश्रांति चिह्न अंकित 
बस सिसकी,क्रंदन , आहों पर   
उनकी तिमिराई अंगनाइ
फिर नहाए पा उज्ज्वल प्रकाश
कुछ नई अंकुरित हों कलियाँ
उनकी मुरझाई चाहों पर

बरसों से सूने मस्तक पर
खिलता हो अक्षत अरु चंदन 

बदलो इस वर्ष दिशा अपनी
चल दो दक्षिण या उत्तर को 
महलों के साये में खोते
देखो उस टूटे छप्पर को 
समदशा हो दो संप्रकाश 
फुनगी  से लेकर के जड़ तक
उतरो नीचे कंगूरों से 
करने रोशन अब घर घर को 

तब बिखरे अधरों पर सबके 
उषा से संध्या सूर्या नमन 

ओ  चित्रकार खींचो नूतन 
कुछ इंद्रधनुष वातायन में 
कुछ शान्ति चैन की बेलों को 
बो दो सन्मुख नीराजन में 
मन से मन तक की दूरी को 
नापो किरणों की डोरी से 
बाँधो अपने संचय के पल
नव  हर्षों के प्रतिपादन में 

इस बार मिटा दो हर मन में 
पलते संत्रास और कुंठन 
 

नयी सुबह के लिए

नयी सुबह के लिए निरंतर अकुलाती है निशिभर पलकें 
नयी सुबह के लिए किन्तु है संभव ना परिवर्तन कोई 

पीढ़ी दर पीढ़ी आशा के अंकुर बोये हैं क्यारी में 
नयी सुबह जब आएगी तो धूप अधिक चमकीली होगी 
तरल उष्णता की पुरबाई भर लेगी निज आलिंगन में
और पौंछ  देगी वह मोती  जिनसे आँखें गीली होंगी 

लेकिन प्राची ने जब जब भी खोला अपना द्वार हुलस कर 
आई भोर लड़खड़ाती सी,  हो न बरसों से ज्यों सोई  

कल के दिन जैसे ही लिख कर लाई इबारत। सुबह आज की 
कल आई  थी परसों वाला बिम्ब लिए,  तारीख़ बदल कर 
मौसम बदले, ऋतुए बदली , रहा सुबह का यही रवैया 
वासी थकन रही थी ओढ़े बस आ जाती थी मुँह धो कर 

बरसों से आश्वासन की परछाइयों की उंगली थामे 
रही हृदय की सभी  उमंगें  झूठे दिवास्वप्न में खोई 

नए वर्ष में नई सुबह के लिए  हाथ में लिए कटोरा 
अभिलाषाएँ मन्नत माँगा करीं देव के द्वारा जाकर 
बरसों से ख़ाली झोली को देख रहे मन को समझाती
पूर्व जन्म का संचय कुछ भी शेष न था , जो मिलता आकर 

नई सुबह के लिए  प्रतीक्षित कितने युग इतिहास बन गए 
हुई नहीं पर कभी अंकुरित, कितनी बार अपेक्षा बोई 

 

नव वर्ष २०२४

नववर्ष 2024  दो हज़ार चौबीस वर्ष की नई भोर का स्वागत करने खोल रही है निशा खिड़कियाँ प्राची की अब धीरे धीरे  अगवानी का थाल सजाकर चंदन डीप जला...