पर घटा कोई भी द्वार आई नहीं

आके सावन गली से गुजरता रहा
पर घटा कोई भी द्वार आई नहीं
 
धूप ने जिन पथों को प्रकाशित किया
वे सदा दूर मेरे पगों से रहे
कोई ऐसी किरण ना मिली आज तक
एक पल के लिये बाँह आकर गहे
एक टूटे सितारे की किस्मत लिये
व्योम की शून्यता में विचरता रहा
और मौसम की सूखी हुई डाल से
नित्य दिनमान पत्ते सा झरता रहा
 
एक मुट्ठी खुली,आँजुरी ना बनी
नीर की बूँद हाथों में आई नहीं
 
इक मयुरी करुण टेर उठती हुई
तीर नदिया के आ लड़खड़ाती रही
प्यास चातक की उलझी हुई कंठ से
आई बाहर नहीं, छटपटाती रही
पी कहां स्वर भटकता हुआ खो गया
फ़िर ना लौटाई कोई क्षितिज ने नजर
ठोकरें खाते,गिरते संभलते हुये
क्रम में बँध रह गया ज़िन्दगी का सफ़र.
 
तार झंकारते थक गईं उंगलियां
एक पाजेब पर झनझनाई नहीं
 
आईना बिम्ब कोई ना दिखला सका
दूर परछाईयाँ देह से हो गईं
अजनबी गंध की झालरें टाँक कर
रिक्त इक पालकी ही हवा ढो गई
एक रेखा दिशाओं में ढलती रही
एक ही वृत्त के व्यास को बांध कर
रात ठगिनी हुई साथ में ले गईं
नींद की गठरियाँ पीठ पर लाद कर
 
दूर जाते हुये रोशनी कह गई
सांझ तक की शपथ थी उठाई नहीं

शा्यद हल हो अब मुश्किल कुछ

जीवन के इस समीकरण की गुत्थी को प्रतिदिन सुलझाते
लेकिन हर इक बार लगा यह हो जाती है और जटिल कुछ
 
उत्तरदायित्वों के लम्बे चौड़े श्यामपट्ट पर रह रह
साँसों की खड़िया लिख लिख कर कोशिश करती सुलझाने की
किन्तु सन्तुलित कर उत्तर तक पहुँच सकें इससे पहले ही
साँझ घोषणा कर देती है मिले समय के चुक जाने की
 
खिन्न ह्रदय असफ़ल हाथों से आशा की किरचें बटोरता
जिन पर अंकित रहता, संभव अब के उत्तर जाये मिल कुछ
 
हो कर आती नई सदा ही सम्बन्धों की परिभाषायें
परिशिष्टों में जुड़ जाते हैं नियम नये कुछ अनुबन्धों के
लिखे हुए शब्दों से कोई तारतम्य जुड़ पाये इससे
पहले ही लग जाते बन्धन और नये कुछ प्रतिबन्धों के
 
ढूँढ़ा करती है नयनों की बीनाई उस पगडंडी को
जिसके अंत सिरे की देहरी से होता अक्सर हासिल कुछ
 
फ़ैले हुए निशा के वन में कहीं झाड़ियों में वृक्षों पर
चिह्न नहीं मिलता परिचय का,दिखते हैं आकार भयावह
कन्दीलें बन लटके तारे लगता कुछ इंगित करते हैं
कोशिश करता बंजारा मन समझ सके कुछ उनका आशय
 
प्राची के महलों में जलते हुए दिये की चन्द लकीरें
आसगन्ध बिखरा जाती हैं,शा्यद हल हो अब मुश्किल कुछ

कोई जिज्ञासा नहीं है

भाव ले ढलते नहीं हैं शब्द अब मेरे अधर के
सूत्र में बँध पायें इससे पूर्व रह जाते बिखर के
टिक नहीं पाती किसी भी बिन्दु पर भटकी निगाहें
सिन्धु से आता नहीं मैनाक अब कोई उभर के
 
डोरियों से बँध धुरी की चल रहे हैं वृत्त में बस
शेष क्या है जानने की कोई जिज्ञासा नहीं है
 
दिन निहारे भोर उगते ही निरन्तर दर्पणों को
एक बासी अक्स फ़िर फ़िर सामने आता सँवर कर
तह रखी रेखाओं की अनगिन परत के बीच खोया
एक अनुभव,बात कहने को नहीं आता निखर कर
 
जानते बीता हुआ कल, आयेगा कल रूप बदले
और जो है आज उसकी कोई परिभाषा नहीं है
 
यूँ ह्रदय तो नित्य भिंचता है समय की मुट्ठियों में
और बींधे रश्मियों से धूप की दिन का धनुर्धर
शूल के आघात पाना है नियति का पृष्ठ अंतिम
है नहीं संभावना यह दृश्य अब आये बदल कर
 
पीर की बजती हुई शहनाई के मद्दम सुरों में
व्यक्त मन का हाल कर पाये,कोई भाषा नहीं है
 
बुझ चुके जयदीप जिनको आस ने रह रह जलाया
आंधियों में ढल गईं हर रोज ही बहती हवायें
पल दिवस के,पल निशा के चौघड़ी की चौसरों पर
कर रहें हैं मात देने को निरन्तर मंत्रणायें
 
पूर्व बिछने के, बिसातों पर हुई है हार ही तय
कोई भी अनुकूल होकर पड़ सके, पासा नहीं है

और उत्तर हैं उलझते प्रश्न अपने आप से कर

एक गतिक्रम में बँधे पग चल रहे हैं निर्णयों बिन
भोर ढलती,सांझ-होती रात फ़िर आता निकल दिन
ढल गया जीवन स्वयं ही एक गति में अनवरत हो
उंगलियाँ संभव नहीं विश्रान्ति के पल को सकें गिन
 
अर्थ पाने के लिये उत्सुक निगाहें ताकती हैं
व्योम के उस पार, लेकिन लौटतीं हैं शून्य लेकर
 
टूट कर जाते बिखर सब पाल कर रक्खे हुए भ्रम
पत्थरों से जुड़ रहे आशीष को ले क्या करें हम
केन्द्र कर के सत्य को जितने कथानक बुन गये थे
आज उनका आकलन है गल्प की गाथाओं के सम
 
पूछती है एक जर्जर आस अपने आप से यह
क्या मिला यज्ञाग्नि को भूखे उदर का कौर लेकर
 
कौन रचनाकार?देखे नित्य निज रचना बिगड़ते
बन रहे आकार की रेखाओं को निज से झगड़ते
हो विमुख क्यों कैनवस से कूचियाँ रख दे उठाकर
देखता है किसलिये दिनमान के यूँ पत्र झड़ते
 
प्रश्न ही करने लगे हैं प्रश्न से भी प्रश्न पल पल
और उत्तर हैं उलझते प्रश्न अपने आप से कर

भूमिका लिख दी नये इक गीत की


भोर के सन्देश ने आ
प्रष्ट पर पहले, दिवस के
भूमिका लिख दी नये इक गीत की

कुछ नई सरगम सृजित करके सुरों में
अर्थ दे झंकार को नव, नूपुरों में
गंध के उन्माद में फीकी हुईं थीं
वर्ण रक्तिम को पिरो कर पान्खुरों में
तोड़ दीवारें पुरातन रीत की
भूमिका लिख दी नई इक गीत की

मंदिरों की आरती का सुर बदल कर
शंख की ध्वनि में नया उद्घोष भर कर
कंपकंपाती दीप की इक वर्त्तिका में
प्राण संचारित किये आहुति संजोकर
व्याख्या की आस्था की नीत की
भूमिका लिख दी नये इक गीत की

धूप चैती मखमली को जेठ की कर
मानकों को दृष्टि के थोड़ा बदल कर
हो चुकीं निस्पन्द तम में चेतनाओं
में नई इक ज्योति का अव्हान भर कर
सौम्यता लेकर गगन इक पीत की
भूमिका लिख दी नये इक गीत की
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चित्र वह एक तेरा रहा प्रियतमे

भोर से सांझ नभ में विचरते हुए
कल्पना के निमिष थक गये जिस घड़ी
फूल से उठ रही गंध को पी गई
खिलकिहिलाती हुई धूप सर पर खड़ी
मन का विस्तार जब सिन्धु में चल रहे
पोत के इक परिन्दे सरीखा हुआ
और सुधियां लगीं छटपटा पूछने
आज अभिव्यक्तियों को कहो क्या हुआ


उस समय तूलिका ने बनाया जिसे
शब्द के आभरण से सजाया जिसे
सरगमों के सुरों से संवारा जिसे
चाँदनी ने तुहिन बन निखारा जिसे



चित्र वह एक तेरा रहा प्रियतमे
नाम बस एक तेरा रहा प्रियतमे



पंथ के इक अजाने किसी मोड़ पर
चल दिये साये भी साथ जब छोड़ कर
झांकते कक्ष के दर्पणों में मिला
अक्से भी जब खड़ा पीठ को मोड़कर
मार्ग नक्षत्र अपना बदल कर चले
सांझ आते, बुझाने लगी जब दिये
रात की ओढ़नी के सिरों पर बँधे
रश्मियों के कलश थे अंधेरा किये


उस समय व्योम में जो स्वयं रच गया
किंकिणी बन हवाओं के पग जो बँधा
गंध की वेणियों में अनुस्युत हुआ
भर गई जिसकी द्युतियों से हर इक दिशा


चित्र वह एक तेरा रहा प्रियतमे
नाम बस एक तेरा रहा प्रियतमे

फ़िर से दीप जला आना है

गये हुए कल की परछाई आज आज फिर बन आई है
और सान्झ के ढलते ढलते इसको फिल कल बन जाना है
 
बदले तो परिधान, मूर्ति की रंगत नहीं बदलती लेकिन
नये मुखौटों के पीछे छुप रहते वही पुराने पल छिन
रँगे सियारों की रंगत की लम्बी उम्र नहीं है होती
कच्चे धब्बों को बारिश की पहली बून्द बरस कर धोती
 
 
कभी नयापन कुछ कुछ, उगती नई भोर के सँग आयेगा
यद्यपि है आधारहीन आशा, पर मन को बहलाना है
 
दृष्टि छली जाती है हर दिन नये नये शीशे दिखलाकर
फ़िर फ़िर बर्फ़ जामाई जाती, है जम चुकी बर्फ़ पिघलाकर
कोल्हू के पथ से जुड़ लर ही रहीं यात्रायें सारी अब
बीती उम्र प्रतीक्षाओं की फिर फिर कर दोहराते ये सब
 
कुछ भी नहीं छुपा परदे में सारा सत्य नजर के आगे
लेकिन फिर भी छुपा कहीं कुछ कह कर मन को समझाना है
 
नित प्रपंच विश्वासघात में र्स्क्र उल्स्झ क्स्र कोमल मन को
फिर फिर आशावसन मिलतेन है नया मुलम्मा ओढ ओढ कर
मंडी में जाने पर सारी आशायें बिखरा जाती हैं
जब होता है ज~झात सभी हैं खोटे सिक्के, रखे जोड़ कर
 
पीपल का पत्ता पल भर को पूजा मेम सज तो जात अहै
लेकिन उसको कल आते ही मिट्ती में ही मिल जान अहै
 
टीके के सँग अक्षत का दाना सज कर होता है गर्वित
बाद निमिष के हो जाता है नीचे गिर कर धूल धूसरित
भ्रमित कसौटी रह जाती अनभिज्ञ खरे खोटे सोने से
परिणामित उपलब्धि कहाँ उताम होती कुछ न होने से
 
यद्यपि ज्ञात नहीं है बाकी पूजाघर में कोई प्रतिमा
लेकिन आदत की कमजोरी, फ़िर से दीप जला आना है

आती तो है याद


आती तो है याद चहलकदमी करती इक गौरेय्या सी
किन्तु देख कर बाज व्यस्तताओं के चुपके छुप जाती है


धड़कन की तालें लगतीं हैं दस्तक मन के दरवाजे पर
सांसों में घुल कर आती है गंध किसी भीने से पल की
बरगद की छाया मे लिपटी चन्द सुहानी मधुमय घड़ियां
खींचा करती है नयनों में छवि इक लहराते आँचल की


तोड़ दिया करता है लेकिन तन्द्रा को आ कोई तकाजा
और स्वप्न की डोली उस पल आते आते रुक जाती है


यों लगता है मंत्र पढ़े थे एक दिवस जो सम्मोहन ने
घुलकर कंठ स्वरों से लिपटी हुई एक सारंगी पर आ
उनके शब्द ,तान लय सब कुछ जुड़ जाते दिन के चिह्नों से
बतियाने लगते हैं मेरे बँटे हुए निमिषों में आ गा


असमंजस की भूलभुलैय्या सी खिंच जाती है पल छिन में
और अचानक स्म्ध्या आकर धुंधुआसी हो झुक जाती है


अर्थ बदल कर खो जाते हैं संचित सारे सन्देशों के
चाहत होती और दूसरे सन्देशे ले आयें कबूतर
बहती हुई हवा की पायल में जो खनक रहीं झंकारे
उनको बादल का टुकड़ा अम्बर से आ लिख जाये भू पर


उगती है हर बार अपेक्षा सावन में खरपतवारों सी
आशाओं की रीती गागर बार बार फिर चुक जाती है

बना अंतरा एक गीत का

मन के कोरे पृष्ठों को जब हस्ताक्षर मिल गया तुम्हारा
बिखरी हुई कहानी बँध कर ग्रन्थ बन गई एक प्रीत का
 
टुकड़े टुकड़े अंश अंश में वाक्य अधूरे आधे ही थे
कोई बिन्दु नहीं था ना ही चिह्न कोई भी था विराम का
कल के वासी अखबारों में छपे हुए मौसम का विवरण
जैसा था अधलिखा कथानक, नहीं किसी के किसी काम का
 
जब से छूकर गई तुम्हारी दृष्टि अधूरी पड़ी इबारत
अनायास ही लय में बँध कर बना अंतरा एक गीत का
 
मुद्राओं के बिन वटवे सा था छाया मन में खालीपन
सन्नाटे घेरे रहते थे परिचय के सारे तारों को
भटक भटक कर अभिलाषायें लौटीं थकी शून्य सँग लेकर
जिसके बस में नहीं जगाये सुप्त नींद में, झंकारों को
 
पर जब मेरा नाम तुम्हारे स्वर में रँग अधरों से फ़िसला
वह कारण बन गया सहज ही, खामोशी की बातचीत का
 
जिनसे रही अपरिचित अनुभव की अब तक की अर्जित पूँजी
वह अनुभूति तरंगें बन कर लगी दौड़ने आ नस नस में
सँवरी पुष्पवाटिकायें अनगिनती इक सूनी क्यारी में
मधुरस पूरित गंध घुल गई जीवन के हर पल नीरस में
 
मौसम की मुस्कान सजीली अँजी दिवस के नयनों में आ
निशिगंधा ने दिन में खिल कर किया चलन इक नई रीत का-

छंद गीतों के संवरते हैं नहीं अब सुर में

छंद गीतों के संवरते हैं नहीं अब सुर में
कोई मिसरा-ए-ग़ज़ल होंठ पे नहीं आता
आपका मुझसे तकाजा कि नया गीत रचूं
शब्द गूंगे हैं हुए गाता अगर क्या गाता
 
खँडहर होती मुंडेरों पे चढ़े बैठे जो
देखते जो हैं नहीं किरणें उभरते दिन की
अपनी मुरझाई हुई सोच में उलझे उलझे
सोचते ज़िन्दगी मोहताज है उनके ऋण की
उनके कहने पे दिवस उगता है रातें ढलती
कौम के होके खुदा गफलतों में रहते हैं
अपने कमरे से परे झाँक नहीं देखा कभी
कान को अच्छी लगे बात वही सुनते हैं
 
कब्र में पांव मगर छोड़ते नहीं कुर्सी
कितना लालच है समझ में ये नहीं आ पाता
आपका मुझसे तकाजा कि नया गीत रचूं
शब्द गूंगे हैं हुए कुछ भी कहा न जाता
 
वक्त बदला न बदल पाए नजर के भ्रम पर
अपने दर्पण में ही देखा हैं किये अपने को
मरुथली हिरना के सांचे में ढले बैठे हैं
मान कर एक हकीकत बिखरते सपने को
चीरते मानवियत आज भी शमशीरों से
रक्त की प्यास नहीं बुझती वरस बीत गये
उनके साये में धुली साँस आंसुओं में सदा
आंख के घट भी लगे अब तो सभी रीत गये
 
एक चादर को चढ़ाये हैं रखे करघे पर
सूत पर एक भी बालिश्त भर नहीं काता
आपका मुझसे तकाजा कि नया गीत रचूं
शब्द गूंगे हैं हुए कुछ भी कहा न जाता
 
अब न बादल में छुपा रहने सकेगा सूरज
एक ही रश्मि हटा देती अंधेरा गहरा
एक चिंगारी भड़कती है बने दावानल
बाढ़ का पानी कहां एक जगह पर ठहरा
कोई घर हो कि सल्तनत हो या कोई शासन
रेत की नींव पे टिक पाता नहीं देर तलक
बीज को रोक सका कौन कभी उगने से
स्वप्न से सत्य की दूरी है महज एक पलक
 
उग रही धूप ने झाड़ू से बुहारा उनको
जोड़ बैठे हुए थे जो कि तिमिर से नाता
अब तो गीतों को संवरना है स्वयं होठों पर
जिनका पा पा के पर्स सत्य हर उभर आता

नव वर्ष २०२४

नववर्ष 2024  दो हज़ार चौबीस वर्ष की नई भोर का स्वागत करने खोल रही है निशा खिड़कियाँ प्राची की अब धीरे धीरे  अगवानी का थाल सजाकर चंदन डीप जला...