भूमिका लिख दी नये इक गीत की


भोर के सन्देश ने आ
प्रष्ट पर पहले, दिवस के
भूमिका लिख दी नये इक गीत की

कुछ नई सरगम सृजित करके सुरों में
अर्थ दे झंकार को नव, नूपुरों में
गंध के उन्माद में फीकी हुईं थीं
वर्ण रक्तिम को पिरो कर पान्खुरों में
तोड़ दीवारें पुरातन रीत की
भूमिका लिख दी नई इक गीत की

मंदिरों की आरती का सुर बदल कर
शंख की ध्वनि में नया उद्घोष भर कर
कंपकंपाती दीप की इक वर्त्तिका में
प्राण संचारित किये आहुति संजोकर
व्याख्या की आस्था की नीत की
भूमिका लिख दी नये इक गीत की

धूप चैती मखमली को जेठ की कर
मानकों को दृष्टि के थोड़ा बदल कर
हो चुकीं निस्पन्द तम में चेतनाओं
में नई इक ज्योति का अव्हान भर कर
सौम्यता लेकर गगन इक पीत की
भूमिका लिख दी नये इक गीत की
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2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

नवगीतों से धरा भरी हो,
आज हरीतिमा और हरी है।

Mukesh Kumar Sinha said...

wah. bahut khub!

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...