चित्र वह एक तेरा रहा प्रियतमे

भोर से सांझ नभ में विचरते हुए
कल्पना के निमिष थक गये जिस घड़ी
फूल से उठ रही गंध को पी गई
खिलकिहिलाती हुई धूप सर पर खड़ी
मन का विस्तार जब सिन्धु में चल रहे
पोत के इक परिन्दे सरीखा हुआ
और सुधियां लगीं छटपटा पूछने
आज अभिव्यक्तियों को कहो क्या हुआ


उस समय तूलिका ने बनाया जिसे
शब्द के आभरण से सजाया जिसे
सरगमों के सुरों से संवारा जिसे
चाँदनी ने तुहिन बन निखारा जिसे



चित्र वह एक तेरा रहा प्रियतमे
नाम बस एक तेरा रहा प्रियतमे



पंथ के इक अजाने किसी मोड़ पर
चल दिये साये भी साथ जब छोड़ कर
झांकते कक्ष के दर्पणों में मिला
अक्से भी जब खड़ा पीठ को मोड़कर
मार्ग नक्षत्र अपना बदल कर चले
सांझ आते, बुझाने लगी जब दिये
रात की ओढ़नी के सिरों पर बँधे
रश्मियों के कलश थे अंधेरा किये


उस समय व्योम में जो स्वयं रच गया
किंकिणी बन हवाओं के पग जो बँधा
गंध की वेणियों में अनुस्युत हुआ
भर गई जिसकी द्युतियों से हर इक दिशा


चित्र वह एक तेरा रहा प्रियतमे
नाम बस एक तेरा रहा प्रियतमे

2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

हर एकल अभिव्यक्ति तुम्हारा नाम लिये जीती है..

दीपिका रानी said...

सुंदर गीत..

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में...