और उत्तर हैं उलझते प्रश्न अपने आप से कर

एक गतिक्रम में बँधे पग चल रहे हैं निर्णयों बिन
भोर ढलती,सांझ-होती रात फ़िर आता निकल दिन
ढल गया जीवन स्वयं ही एक गति में अनवरत हो
उंगलियाँ संभव नहीं विश्रान्ति के पल को सकें गिन
 
अर्थ पाने के लिये उत्सुक निगाहें ताकती हैं
व्योम के उस पार, लेकिन लौटतीं हैं शून्य लेकर
 
टूट कर जाते बिखर सब पाल कर रक्खे हुए भ्रम
पत्थरों से जुड़ रहे आशीष को ले क्या करें हम
केन्द्र कर के सत्य को जितने कथानक बुन गये थे
आज उनका आकलन है गल्प की गाथाओं के सम
 
पूछती है एक जर्जर आस अपने आप से यह
क्या मिला यज्ञाग्नि को भूखे उदर का कौर लेकर
 
कौन रचनाकार?देखे नित्य निज रचना बिगड़ते
बन रहे आकार की रेखाओं को निज से झगड़ते
हो विमुख क्यों कैनवस से कूचियाँ रख दे उठाकर
देखता है किसलिये दिनमान के यूँ पत्र झड़ते
 
प्रश्न ही करने लगे हैं प्रश्न से भी प्रश्न पल पल
और उत्तर हैं उलझते प्रश्न अपने आप से कर

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

गहन तक्र है, प्रश्न और उत्तरों का।

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...