आती तो है याद


आती तो है याद चहलकदमी करती इक गौरेय्या सी
किन्तु देख कर बाज व्यस्तताओं के चुपके छुप जाती है


धड़कन की तालें लगतीं हैं दस्तक मन के दरवाजे पर
सांसों में घुल कर आती है गंध किसी भीने से पल की
बरगद की छाया मे लिपटी चन्द सुहानी मधुमय घड़ियां
खींचा करती है नयनों में छवि इक लहराते आँचल की


तोड़ दिया करता है लेकिन तन्द्रा को आ कोई तकाजा
और स्वप्न की डोली उस पल आते आते रुक जाती है


यों लगता है मंत्र पढ़े थे एक दिवस जो सम्मोहन ने
घुलकर कंठ स्वरों से लिपटी हुई एक सारंगी पर आ
उनके शब्द ,तान लय सब कुछ जुड़ जाते दिन के चिह्नों से
बतियाने लगते हैं मेरे बँटे हुए निमिषों में आ गा


असमंजस की भूलभुलैय्या सी खिंच जाती है पल छिन में
और अचानक स्म्ध्या आकर धुंधुआसी हो झुक जाती है


अर्थ बदल कर खो जाते हैं संचित सारे सन्देशों के
चाहत होती और दूसरे सन्देशे ले आयें कबूतर
बहती हुई हवा की पायल में जो खनक रहीं झंकारे
उनको बादल का टुकड़ा अम्बर से आ लिख जाये भू पर


उगती है हर बार अपेक्षा सावन में खरपतवारों सी
आशाओं की रीती गागर बार बार फिर चुक जाती है

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

मिलते मिलते क्यों रह जाता, जीवन में जो मिल जाना था।

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...