Thursday, December 08, 2016

जीवन की विपदाएं ढूंढें

अच्छे है नवगीत गीत सब्
किन्तु आज मन कहता है सुन
नव विषयो को नए शब्द दे
और नई उपमाएं ढूंढें

दिशा पीर घन क्षितिज वेदना
पत्र लिए बिन चला डाकिया
खाली लिए पृष्ठ जीवन के
अवलंबों से परे हाशिया
कजरे सुरमे से आगे जाकर
दीपित संध्याये ढूंढें

विरह मिलन हो राजनीति
या भूख गगरीबी खोटे सिक
भ्रष्टाचार अभावो के पल
अफसरशाही चोर उचक्के
इनसे परे उपेक्षित हैं जो
जीवन की विपदाएं ढूंढें

मावस पूनम के आगे भी
जलती हैं लिख दे वे राते
और  धरा के मौसम वाले
विद्रोहों की भी बातें
सीमा की परिधि के बाहर
है कितनी सीमाएं ढूंढें

Monday, December 05, 2016

परछाईयाँ कब तक निहारें

फूल चरणों में चढ़ाते पूछता मन प्रश्न खुद से
ढह चुकी  इन मूर्तियों की आरती कब तक उतारें
 
याद, हमको था शिरा में घोल कर सौंपा गया था
ज़िन्दगी का ध्येय इक कर्तव्य है और दूसरा यह
जोड़ कर इनसे चलें हम साँस का हर सूत्र अपना
फिर असम्भव ज़िन्दगी में कुछ अपेक्षित जायेगा रह
 
आज यह इतिहास के भूले हुये इक पृष्ठ से हैं
कब तलक परतें जमीं हम 
​धूल ​
की इनसे बुहारें

 
​हैं बिछाते 
चादरें नित ज्ञान दर्शन प्रवचनों की
रोज नव गाथायें रचते जा रहे दुखभंजनों की
हो नहीं पाते तनिक परवर्तनों पर अवनिका रख
कह दिया जाता विधी है यह निखरते कुन्दनों की
 
उम्र बीती एक पूरी, आस में तपते निशा दिन
और पिघली धार में परछाईयाँ कब तक निहारें
 
रच दिये षड़यंत्र जीवन में नये 
​हर 
व्रत कथा ने
आस्था से हो परे
​,​
 प्रतिकूल हो 
​घिरती घटा 
ने
खींच कर रक्खे छलावे दूर तक बिखरे क्षि
​तिज 
पर
घोल कर के घंटियों के शोर को, आती हवा ने

लौटती
​ हैं अनसुनी, हर बार प्रतिध्वनियाँ गगन से
व्यर्थ फिर आवाज़ खोने के लिये कब तक पुकारें  ? ​

Monday, November 28, 2016

अब नहीं स्वीकार यह

अब नहीं स्वीकार यह संवेदनाएं यह दिलासे
मैं गया हूँ सीखः अपनी पीर पी कर मुस्कुराना

आंजुरि फैलाये याचक कल तलक तो था अपेक्षित
और हर इक द्वार से पाई उपेक्षाएं निरंतर
राह ने करते तिरस्कृत मार्ग में बाधाएं बोई
थे रहे आभास मंज़िल के कही पर दूर छिप कर

अब नहीं स्वीकार यह निष्ठाएं मुझको एकलवयी
मैं गया हूँ सीख धनु पर आप ही अब शर चढ़ाना

प्राप्ति के फल फुनगियों के छोर पर टिककर रहे थे
और बंध कर मुट्ठियों में रह गई थी उँगलियाँ भी
दोपहर का सूर्य तपता लक्ष्य को धुंधला किये था
हो न पाई थी सहायक। एक पल को बदलियां भी

अब नहीं स्वीकार यह अनुदान फल का शाख पर से
आ गया मुझको निशाना अब गुलेलों से लगाना

ज़िन्दगी देती नहीं अनुनय विनय से कुछ अपेक्षित
बात यह इतिहास ने हर बार दुहरा कर बताई
सिंधु से पथ का निवेदन, पंचग्रामी भाग केवल
प्रीत न होती बिना भय, कह गए तुलसी गुंसाई

​अब नहीं स्वीकार यह इतिहास का पुनरावलोकन

आ गया है चिह्न मुझको अब समय सिल पर लगाना

Monday, November 21, 2016

पैंतीसवां पड़ाव एक पथ पर

आज उगती हुई भोर ने देखकर
ओस में भीग दर्पण बनी पाँखुरी
मुस्कुराती हुई कल्पनाएं लिए
कामनाये सजा कर भरी आंजुरी 

फिर खुले पृष्ठ पैंतीस इतिहास के
फिर से जीवंत होनेे लगी वह घडो
गुनगुनाते हुए सांझ ने  जब दिशा
अपने सिन्दूर के रंग से थी भरी
देहरी छाँव ओढ़े हुए तरुवरी
आप ही आप रंगोलियों में सजी
और पुरबाइयाँ थी बनी बांसुरी
प्रीत की मदभरी रागिनी में बजी

आज फिर से जगीं वे ही अनुभूतियाँ
राह दो, ज़िन्दगी की परस्पर जुडी

नैन के व्योम में चित्र उभरे पुनः
यज्ञ में आहुति ले जगी थी अगन
मंत्र के साक्ष्य में स्वर संवरते हुए
गुनगुनाते हुए वेदवर्णित वचन
बात करती अबोले हुए मौन से
कंगनों से, रची हाथ की मेंहदियां
आतुरा सा अलक्तक रंगा पाँव में
आगतों की नयन में घिरी बदलियां

दृष्टि नजरें चुरा एक पल को मिली
दुसरे पल घुमा दृष्टियों को मुड़ी

आज अनुभूतियों की घनी झील से
सीपियों से निकल चंद मोती मिले
मुद्रिका में दिवस की जड़े नग बन
जब समन्वय के जुड़ने लगे सिलसिले
सोच की भिन्न पगडंडियां आप ही
जाने कैसे मिली एक ही पंथ में
एक अदृश्य डोर्रे रही बांधती
जन्म शत की डगर नित्य अनुबंध में

खोलने वीथियां अब नई व्योम में
भावना आज परवाज़ लेकर उडी

Monday, November 14, 2016

बादलों की कूचियों पर

पाँखुरी पर ओस ने जब से लिखा है नाम तेरा
रंग आ खुद ही संवरते बादलों की कूचियों पर

धुप ने अंगड़ाई लेकर नींद से जब आँख खोली
और देखा झील वाले आईने में बिम्ब अपना
तब छिटकते पाँखुरों से रंग जो देखे धनक के
सोच में थी जाग है या भोर का है शेष सपना

नाम की परछाइयाँ जो गिर रही शाखाओं पर जा
में
ह​दि​यों के रंग उससे भर गए है बूटियों पर


बादलों की कूचियों पर से फिसल कर चंद बूँदें
चल पड़ी थी दूब के कालीन पर करने कशीदा
रास्ते में एक तितली के परो पर रुक बताती
वे उसे श्रृंगार कर सजने सजाने का सलीका

नाम ने तेरे रंगी है प्रकृति कुछ इस तरह से
सिर्फ तेरा नाम मिलता, मौसमों की सूचियों पर

व्योम को कर कैनवस, की रंगपट्टो सी दिशाएं
फ्रेम में जड़ कर क्षितिज के, चित्र कुछ नूतन उकेरे
बादलों की कूचियों पर लग रहा उन्माद छाया
एक तेरा नाम लेकर रंग दिए संध्या सवेरे

नाम तेरा बह रहा है सरगमों की धार होकर
एकतारा बांसुरी पर, बीन पर, सारंगियों पर

Monday, November 07, 2016

चांदनी में अमावस नहाने लगी

आज तेरे नयन में चमकती हुई
प्रीत कुछ इस कदर झिलमिलाने लगी
दीप दीपावली के हजारों जले
चांदनी में अमावस नहाने लगी

मन से उठती हुइ भावना की लहर
गन्ध लेकर अचानक उमड़ने लगी​
फ़ूटने लग पड़े सैंकड़ों कुमकुमे
फ़ुलझड़ी हर तरफ़ जगमगाने लगी
पग से बिखरा अलक्तक बनी अल्पना
मेंहदियों  ने सजाये नये सांतिये
रोशनी सूर्य की बन के जगने लगे
सांझ की झील में टिमटिमाते दिये

आरती की धुनें सरगमें ले नई
प्रीत की रागिनी गुनगुनाने लगी

​शब्द शहदीले होंठों से फ़िसले हुये
फूल पूजा के बनते हुये सज गये
चितवनों से चले पुष्प शर पंथ से
द्वार तक वंदनी हार में ढल गए
बन सितारे गगन ओढ़नी पर जड़ी
पैंजनी की खनक इक थिरकते हुए
मावसी रात में चन्द्रमा बन गई
नाक की लॉग जैसे दमकते हुए

कार्तिकी पूर्णिमा दूर से देखकर
दृश्य ये, मन ही मन मुस्कुराने लगी

​पग जहां पर पडें, धूल में उग गए
दर्ज़नों फूल खुशबू लुटाते हुए
और कटिबन्ध की लड़कनो से जगे
सरगमी राग कुछ मुस्कुराते हुए
घाघरे की किनारी के प्रतिबिम्ब से
इंद्रधनु आ संवरने लगे राह में
कंगनों की खनक घोलने लग गई
एक फगुनाई मल्हार ला बांह में

एक अनुभूति आ कल्पना से परे
अपनी अभिव्यक्ति को कसमसाने लगी

Monday, October 31, 2016

प्राण दीप मेरा जलता है

हन निशा में तम की चाहे जितनी घनी घटाएं उमड़े
पथ को आलोकित करने को  प्राण दीप मेरा जलता है
पावस के अंधियारों ने कब अपनी हार कहो तो मानी
हर युग ने दुहराई ये ही घिसी पिटी सी एक कहानी
क्षणिक विजय के उन्मादों ने भ्रमित कर दिया है मानस को
पलक झुकाकर तनिक उठाने पर दिखती फिर से वीरानी
लेकिन अब ज्योतिर्मय नूतन परिवर्तन की अगन जगाने
निष्ठा मे विश्वास लिए यह प्राण दीप मेरा जलता है
खो्टे सिक्के सा लौटा है जितनी बार गया दुत्कारा
ओढ़े हुए दुशाला मोटी बेशर्मी की ,यह अँधियारा
इसीलिए अब छोड़ बौद्धता अपनानी चाणक्य नीतियां
उपक्रम कर समूल ही अबके जाए तम का शिविर उखाड़ा
छुपी पंथ से दूरशरण कुछ देती हुई कंदराएँ जो
उनमें  ज्योतिकलश छलकाने  प्राण दीप मे​रा जलता है
दीप पर्व इस बार नया इक ​संदेसा लेकर है आया
सीखा नहीं तनिक भी तुमने तम को जितना पाठ पढ़ाया
अब इस विषधर की फ़ुंकारों का मर्दन अनिवार्य हो गया
दीपक ने अंगड़ाई लेकर उजियारे का बिगुल बजाया

फ़ैली हुई हथेली अपनी में  सूरज की किरणें भर कर
तिमिरांचल की आहुति देने प्राण दीप मेरा जलता है