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वक्त की रेत पर जो इबारत लिखी

ज़िन्दगी के बिछे इस बियावान में
फूल इक आस का खिल सकेगा नहीं
वक्त की रेत पर जो इबारत लिखी
नाम उसमें मेरा मिल सकेगा नहीं
उम्र की राह को आके झुलसा गई
कंपकंपाती किरण आस्था दीप की
याद की पोटली साथ में थी रही
एक मोती लुटा रह गये सीप सी
जैसे पतझर हुआ  रात दिन का सफ़र
फूल अरमान के सारे मुरझा गए
और विश्रांति के नीड सब सामने
बन करीलों की परछाइयाँ आ गये
जो भी मैंने चुने पत्र या पुष्प थे
उनमें अंतर कोई मिल सकेगा नहीं
मन की अँगनाई में गहरे पसरा हुआ
शून्य था जोकि अंतर में पलता रहा
दम्भ के झूठ,छलनाओं के व्यूह में
फंस गया कारवाँ, किन्तु चलता रहा
मूल्य जर्जर हुए जो थे नैतिक कभी
पंथ में सिर्फ विध्वंस होते रहे
गम पिए मैंने भर आंजुरि में, किया
उनका आभार, जो दंश देते रहे
मुस्कुराहट की नौकाएं  डूबी कहाँ
दर्द फेनिल। पता दे सकेगा नहीं
हो तरल बह गई सब पिघलते हुये
पास की रात जो थी सितारों भरी
सोख कर ले गई नींद जलती हुई
नैन के गेह से स्वप्न की कांवरी
घूँट दो चांदनी के मिले व्योम से
उनको पीते हुए धैर्य रखता रहा
टूटे मस्तूल गलते हुए काठ की
नाव लहरों के विपरीत खेता  रहा
चक्रवाती हुई घिरती झंझाये अब
देर ज्यादा दिया जल सकेगा नहीं

वीथियों में उम्र की हूँ

मैं गिरा जब जब गिरा हूँ एक निर्झर की तरह
​मैं   बिखर कर हो गया हूँ एक सागर की व्ज़ह है मेरा विस्तार नभ की नीलिमा के पार भी  मैं किनारा हूँ समय का और हूँ मंझधार भी
मैं प्रणय की भावना के आदि का उद्गम रहा हूँ और मै ही वीथियों में उम्र की हूँ एक सहचर
मैं ही हूँ असमंजसों के चक्र काजो तोड़, निर्णय हर घिरे तम  ​को   रहा हूँ सूर्य का मै एक परिचय मैं अनुष्ठुत हो रहे संकल्प की आंजुर रहा हूँ और मै नि ​श्चय   सदा भागीरथी बन कर बहा हूँ
मै कलम जो उद्यमों की स्याहियों मे डूब कर के भाग्य की रेखाओं को लिखता रहा फिर से  ​बदल   कर 
भावनाओ को सहज अभिव्यक्तियाँ दे शब्द हूँ मैं और शब्दों के परे जो है निहित वह अर्थ हूँ मैं जो निरंतरता बनाये रख रहा सिद्धांत मैं ही मैं ही अनुशासित नियोजन और हूँ उद्भ्रांत मैं ही
मैं भ्रमित अवधारणाओं में दिशाओं  का समन्वय चीर कर सारे कुहासे लक्ष्य बन आता निखर कर
​जो कि गीतायन रहा है गीत में, बस मैं वही हूँ  पृष्ठ पर बीते संजय के जो हुई अंकित, सही हूँ  आदि से पहले,क्षितिज  के बाद तक बस एक मैं हूँ जो रहा निश्शेष फिरभी  रह गया जो शेष मैं हूँ  ​
मैं तुम्हारे और अपने वास्ते बस आइना हूँ  पारदर्शी, जो उजागर …

गीत को जीवन ​दिया  मैंने

जड़ दिया अतुकांत को  
जब ​ ​ ​  छंद में  मैंने
तब मधूर ​इ​ क गीत ​ को  जीवन ​दिया   मैंने
मैं प्रणय की वीथियों में भावना बन कर बहा हर ​सुलगते   ज्वार को अनुभूत मैं करत रहा रूप तब इक अन्तरे ​को दे दिया ​ मैंने 
कर ​दिए   पर्याय ​ ​ के ​ ​ पर्याय ​ अन्वेषित  शांत मन के भाव को कर खूब उद्देलित ​शब्द को  सरगम पिरोकर रख ​  दिया मैंने
था तरंगित अश्रुओं की धार में खोकर पीर के सज्जल क्षणों में अर्थ कुछ बोकर दर्द का ​श्रृंगार   नूतन कर दिया.मैने

टूटते हर पल बिखरते

टूटते हर पल बिखरते स्वप्न  संवरे नयन मे जो
ये नियति ने तय किया है जिंदगी की इस डगर पर
हर संवरती भोर में अंगड़ाइयां ली चाहतो ने सांझ तक चलते हुए दिन ने उन्हें पल पल निखारा आस की महकी हहु पुरबाई की उंगली पकड़ कर रात ने काजल बना कर आँख में उनको संवारा  ईजिलों की पकड़ ढीली पर नजर के कैनवस पर चित्र जितने भी उकेरे रंग रह जाते बिखर कर
 टूटते हर पल बिखरते जो जुड़े सम्बन्ध अपने कर्जदारों के किये हर वायदे की उम्र जैसे याकि पतझड़ के कथानाक पर लिखी लंबी कहानी में किसी खिलती कली की पाँखुरी का ज़िक्र जैसे
मौसमों की संधिरेखा पर मिले जो मोड़ आकर वे खिंची परछाइयों को देखते लौटे पलट कर
टूटते हर पल बिखरते शाख से कैलेंडरों की पत्र जर्जर हो दिवस के रात की पगडंडियों पर   और पग ध्वनियाँ कहारों की उषा की पालकी के पात्र कर रखती रही विध्वंस की नौचंदियों पर
सीखदी ​ इतिहास ​  ​  ने फिर से संभल के ​ ​ अग्रसर हो हर कदम पर पाँव लेकिन रह गया पथ में ​ फ़िसल कर​

और समय संजीवित होकर

आज हवा की पाती पढ़ कर लगी सुनाने है वे ही पल जिनमें सम्बोधन करने में होंठ लगे अपने कँपने थे शब्द उमड़ कर चले ह्रदय से किन्तु कंठ तक पहुँच न पाये और नयन की झीलों में तिरते रह गये सभी सपने थे अनायास ही वर्तमान पर गिरीं अवनिकायें अतीत की और समय संजीवित होकर फ़िर आया आँखों के आगे बिछे क्षितिज तक अँगनाई की राँगोली के रँग में डूबे अलगनियों पर लटकी चूनर में से जैसे चित्र बिखर कर छाप तर्जनी की जो उनमें कितनी बार हुई थी अंकित उठ कर गिरती हुई दृष्टि की डोरी का इक सिरा पकड़ कर खींच गये सतरंगी चादर निकल तूलिका के कोने से जोड़े थे सायास साथ ने सम्बन्धों के कच्चे धागे पाखुर का पीलापन पूछा करता पुस्तक के पन्नों से बासन्ती स्पर्शों की सीमा कितनी दूर अभी ​ है ​  बाकी    कितनी देर तृषा की बाकी, और माँग में पुरबाई के कब तक टीस भरेगी रह रह बेचारी सुधियों की साकी
दुहराने ​ लग गये स्वयं को शब्द उन्हीं कोरी कसमों के​ करने जिन्हें प्रस्फ़ुटित रह रह स्वर अपने अधरों ने मांगे ‘संगे मरमर की जाली पर बँध कर रंगबिरंगे डोरे सपने कोरे रखे हुये हैं कितने ही गुत्थी में बाँधे चुनते चुनते थकी उंगलियों के पोरों पर टिकी हिनायें आधी तो हो गई अपरिचित,…

ये मेरी आकांक्षायें तय करेंगी

केंद्र पर मैं टिक रहूँ या वृत्त का विस्तार पाऊं
जानता हूँ ये मेरी आकांक्षायें तय करेंगी
ऐतिहासिक परिधियों में सोच की सीमाये बंदी और सपने जो विरासत आँख में आंजे हुये है  दृष्टि केवल संकुचित है देहरी की अल्पना तक साथ है प्रतिमान जो बस एक सुर  साजे हुये है
मैं इसी  ​इ​ क दायरे मेँ बंध रहूँ या तोड़ डालूं ​जा​ नता हूँ कल्पना की स ​म्प​ दाये तय करें ​गी ​ ​आदिवासी रीतियों का अनुसरण करता हुआ मन कूप के मंडूक सी समवेत दुनिया को किये है सांस के धागे पिरोकर एक मुट्ठी धड़कनों को रोज सूरज के सफर के साथ चलता बस जिए है
आसमानों से पर हैं और कितने वृहद अम्बर ये मेरी ही सोच की परिमार्जनाएं तय करेंगी ​
तलघरों में छुप गया झंझाओं से भयभीत हो जो क्या करेगा सामना जब द्वार पर आये प्रभंजन चल नहीं पाये समय के चक्र की गति से कदम तो एक परिणति सामने रहती सदा होता विखंडन
मै समर्पण ओढ़  लूँ, स्वीकार कर लूँ या चुनौती ये मेरी मानी हुई संभावनाये तय करेंगी

इश्क़ के रंग में

मौसमों ने तकाजा किया द्वार आ उठ ये मनहूसियत को रखो ताक पर घुल रही है हवा में अजब सी खुनक तुम भी चढ़ लो चने के जरा झाड़ पर गाओ पंचम में चौताल को घोलकर थाप मारो  जरा जोर से  चंग  में लाल नीला गुलाबी हरा क्या करे आओ रंग दें तुम्हें इश्क  के रंग में
आओ पिचकारियों में उमंगें भरे मस्तियाँ घोल ले हम भरी नांद में द्वेष की होलिका को रखे फूंक कर ताकि अपनत्व आकार छने भांग में वैर की झाड़ियां रख दे चौरास्ते एक डुबकी लगा प्रेम की गैंग में  कत्थई बैंगनी को भुला कर तनिक आओ रंग दें तुम्हे इश्क़ के रंग में
बड़कुले कुछ बनायें नये आज फ़िर, जिनमें सीमायें सारी समाहित रहें धर्म की,जाति की या कि श्रेणी की हों  वे सभी अग्नि की ज्वाल में जा दहें कोई छोटा रहे ना बड़ा हो कोई आज मिल कर चलें साथ सब संग में छोड़ ं पीत, फ़ीरोजिया, सुरमई आओ रंग दें तुम्हें इश्क  के रंग में 
आओ सौहार्द्र के हम बनायें पुये और गुझियों में ला भाईचारा भरें कृत्रिमी  सब कलेवर उठा फ़ेंक दें अपने वातावरण से समन्वय करें जितना उल्लास हो जागे मन से सदा हों मुखौटे घिरे हैरतो दंग में रंग के इन्द्रधनु भी अचंभा करें आओ रंग दें तुम्हें इश्क के रंग में