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ये मेरी आकांक्षायें तय करेंगी

केंद्र पर मैं टिक रहूँ या वृत्त का विस्तार पाऊं
जानता हूँ ये मेरी आकांक्षायें तय करेंगी
ऐतिहासिक परिधियों में सोच की सीमाये बंदीऔर सपने जो विरासत आँख में आंजे हुये है दृष्टि केवल संकुचित है देहरी की अल्पना तकसाथ है प्रतिमान जो बस एक सुर  साजे हुये है
मैं इसी  ​इ​ क दायरे मेँ बंध रहूँ या तोड़ डालूं ​जा​ नता हूँ कल्पना की स ​म्प​ दाये तय करें ​गी​​आदिवासी रीतियों का अनुसरण करता हुआ मनकूप के मंडूक सी समवेत दुनिया को किये हैसांस के धागे पिरोकर एक मुट्ठी धड़कनों कोरोज सूरज के सफर के साथ चलता बस जिए है
आसमानों से पर हैं और कितने वृहद अम्बरये मेरी ही सोच की परिमार्जनाएं तय करेंगी ​
तलघरों में छुप गया झंझाओं से भयभीत हो जोक्या करेगा सामना जब द्वार पर आये प्रभंजनचल नहीं पाये समय के चक्र की गति से कदम तोएक परिणति सामने रहती सदा होता विखंडन
मै समर्पण ओढ़  लूँ, स्वीकार कर लूँ या चुनौतीये मेरी मानी हुई संभावनाये तय करेंगी

इश्क़ के रंग में

मौसमों ने तकाजा किया द्वार आउठ ये मनहूसियत को रखो ताक परघुल रही है हवा में अजब सी खुनकतुम भी चढ़ लो चने के जरा झाड़ परगाओ पंचम में चौताल को घोलकरथाप मारो  जरा जोर से  चंग  मेंलाल नीला गुलाबी हरा क्या करेआओ रंग दें तुम्हें इश्क  के रंग में
आओ पिचकारियों में उमंगें भरेमस्तियाँ घोल ले हम भरी नांद मेंद्वेष की होलिका को रखे फूंक करताकि अपनत्व आकार छने भांग मेंवैर की झाड़ियां रख दे चौरास्तेएक डुबकी लगा प्रेम की गैंग में कत्थई बैंगनी को भुला कर तनिकआओ रंग दें तुम्हे इश्क़ के रंग में
बड़कुले कुछ बनायें नये आज फ़िर,जिनमें सीमायें सारी समाहित रहेंधर्म की,जाति की या कि श्रेणी की हों वे सभी अग्नि की ज्वाल में जा दहेंकोई छोटा रहे ना बड़ा हो कोईआज मिल कर चलें साथ सब संग मेंछोड़ ं पीत, फ़ीरोजिया, सुरमईआओ रंग दें तुम्हें इश्क  के रंग में 
आओ सौहार्द्र के हम बनायें पुयेऔर गुझियों में ला भाईचारा भरेंकृत्रिमी  सब कलेवर उठा फ़ेंक देंअपने वातावरण से समन्वय करेंजितना उल्लास हो जागे मन से सदाहों मुखौटे घिरे हैरतो दंग मेंरंग के इन्द्रधनु भी अचंभा करेंआओ रंग दें तुम्हें इश्क के रंग में

आओ रंग दें तुम्हरे प्रीत के रंग में

सोच की खिड़कियां हो गई फ़ाल्गुनीसिर्फ़ दिखते गुलालों के बादल उड़ेफूल टेसू के कुछ मुस्कुराते हुयेपीली सरसों के आकर चिकुर में जड़ेगैल बरसाने से नंद के गांव कीगा रही है उमंगें पिरो छन्द मेंपूर्णिमा की किरन प्रिज़्म से छन कहेआओ रँग दें तुम्हें इश्क के रंग में
स्वर्णमय यौवनी ओढ़नी ओढ़ करधान की ये छरहरी खड़ी बालियाँपा निमंत्रण नए चेतिया प्रीत केस्नेह बोकर सजाती हुई क्यारियांसाग पर जो चने के है बूटे लगेगुनगुनाते  मचलते से सारंग हैऔर सम्बोधनो की डगर से कहेआओ रंग दें तुम्हरे प्रीत के रंग में
 चौक में सिल से बतियाते लोढ़े खनकपिस  रही पोस्त गिरियों की ठंडाइयाँआंगनों में घिरे स्वर चुहल से भरेदेवरों, नन्द भाभी की चिट्कारियानमौसमी इस छुअन से न कोई बचाजम्मू, केरल में, गुजरात में, बंग मेंकह रही ब्रज में गुंजित हुई बांसुरीआओ रँग दें तुम्हें इश्क के रंग में 
पनघटों पे खनकती हुई पैंजनीउड़्ती खेतों में चूनर बनी है धनकओढ़ सिन्दूर संध्या लजाती हुईसुरमई रात में भर रही है चमक  मौसमी करवटें, मन के उल्लास अबएक चलता है दूजे के पासंग मेंभोर से रात तक के प्रहर सब कहेंआओ रँग दें तुम्हें इश्क के रंग में

भाव दरवेश बन आये चौपाल पर

नाम जिसपे लिखा हो मेरा, आज भी
डाकिया कोई सन्देश लाया नहीं
गीत रचता रहा मैं तुम्हारे लिए
एक भी तुमने पर गुनगुनाया नहीं
रोज ही धूप की रश्मियां, स्वर्ण सेकामना चित्र में रंग भरती रही
आस की कोंपले मन के उद्यान में
गंध में भीग कर थी संवरती रही
एक आकांक्षा की प्रतीक्षा घनी
काजरी कर रही थी निरंतर नयन
दृष्टि के फूल थे पंथ के मोड़ पर
गूंथते ही रहे गुच्छ अपना सघन


भग्न ही रह गया मन का मंदिर मगर
आरती स्वर किसी ने सुनाया नहीं
गीत के गाँव में सा्री पगडंडियां
नाम बस एक ही ओढ़ कर थी खड़ी
एक ही बिम्ब को​ मौसमों ने करीला समर्पित भरी पुष्प की आंजुरी
भाव दरवेश बन आये चौपाल पर
एक ही थी कहानी सजाये अधर
पनघटों पर छलकती हुई गागरें
बाट जोहें छुए एक ही बस कमर


रह गई शेष निष्ठाएं भागीरथी
जाह्नवी का पता चल न पाया कही
छोर पर थी खड़ी आके अंगनाई के
दीप बन कर प्रतीक्षाएँ जलती रही
पगताली की छुअन की अपेक्षा लिए
सूनी पगडंडियां हाथ मलती रही
भोर के पाखियों की न आवाज़ थी
आसमा की खुली खिड़कियाँ रह गई
मानचित्रों से अब है पर ये दिशा
एक बदली भटकती हुई कह गई
शब्द सारे प्रतीक्षा लिए रह गए गीत ने पंक्तियों में लगाया नहीं

जीवन के पतझड़ में

जीवन के पतझड़ में जर्जर सूखी दिन की शाखाओं पर
किसने आ मल्हार छेड़ दी औ अलगोजा बजा दिया है
मुड़ी बहारो की काँवरिया मीलो पहले ही  ​इ स पथ सेएक एक कर पाँखुर पाँखुर बिखर चुके है फूल समूचेबंजर क्यारी में आ लेता अंकुर कोई नहीं अंगड़ाईऔर न आता कोई झोंका गंधों का साया भी छू ​ ​ के
​फिर   भी इक अनजान छुअन से धीरे से दस्तक दे कर के इस  मन के मरुथल को जैसे रस वृंदावन बना दिया है 
सूखी शाखाओं की उंगली छोड़ चुकी है यहां लताएंबस करील की परछाई ही शेष रही है इस उपवन मेंउग आये हर एक दिशा में  मरुथल के आभास घनेरेएकाकीपन गहराता है पतझड़ आच्छादित जीवन में
फिर भी सुघर मोतियों जैसी उभरी कोमल पदचापों नेगुंजित हो ज्यो कालिंदी तट को आँगन में बुला दिया है
 ढलती हुई सांझ की देहरी पर अब दीप नहीं जलते है भग्न  हो चुके मंदिर में आ करता नहीं आरती कोईअर्घ्य चढ़ाता कौन जा रहे अस्ताचल की और, सूर्य को खर्च हो चुका कैलेण्डर कमरे में नहीं टांगता कोई
फिर भी आस कोंपलों ने मुस्काकर जीवन के पतझड़ मेंजलती हुई दुपहरी को मदमाता सावन बना दिया ​ है 

और एक दिन बीता

और एक दिन बीता कर्मक्षेत्र से नीड तलक बिखरे चिन्हों को चुनते हुए राह में बिखर रहे सपनों का हर अवशेष उठाते हुए बांह में संध्या के  तट  पर आ पाया हर घट था रीता और एक दिन बीता 
एक अधुरी परछाई में सुबह शाम आकार तलाश  करतेछिद्रित आशा के प्याले मे दोपहरी के शेष ओसकण भरते और कोशिशें करते समझाती रहती क्या   गीता और एक दिन बीता 
थकी हुई परवाजों की गठरी को अपनी जोड़े हुए सुधी से रहे ताकते पंथ अपेक्षा का जो  लौट होकर पूर्ण  विधी से और बने उपलब्धि संजोई आशा की परिणीता और एक दिन बीता

बस उड़ान में विघ्न न डालो

तुमने मुझे पंख सौंपे है और कहा विस्तृत वितान हैपंख पसारे मैं आतुर हूँ बस उड़ानमें विघ्न न डालो
पुरबाई जब सहलाती है पंखों की फड़फड़ाहटों कोनई चेतना उस पल आकर सहज प्राण में है भर जाती  आतुर होने लगता है मन,नवउड़ान लेने को नभ मेंसूरज को बन एक चुनौती पर फैलाता है स्म्पाती
मैं तत्पर हूँ फैला अपनेडैनेनापूँ सभी दिशाएँअगर खिंचीलक्ष्मण रेखाएं एक बार तुम तनिकमिटालोनन्ही गौरेया की क्षमता कब उकाब से कम है होतीसंकल्पों की ही उड़ान तो नापा करती है वितान कोउपक्रम ही तो अनुपातित है परिणामों की संगतियों से