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जानता यह ​तो नही मन

क्या पता कल का सवेराधुंध की चादर लपेटे
या सुनहली धूप के आलिंगनों में जगमगाये या बरसते नीर में ​ भीगा हुआ हो मस्तियों में ​ जानता यह  ​तो   नही मन, किन्तु है सपने सजाये
स्वप्न, अच्छा दिन रहेगा आज के अनुपात में कल आज का नैराश्य संध्या की  ढलन में ढल सकेगा आज की पगडंडियां कल राजपथ सी सज सकेंगी और नव पाथेय पथ के हर कदम पर सज सकेगा
राह में अवरोध बन कर डोलती झंझाये कितनी और विपदाएं हजारों जाल है अपना बिछाये नीड का  ​ संदेश कोई  सांझ ढलती  ला  सकेगी  जानता यह भी नही मन स्वप्न है फिर भी सजाये 
​उंगलियां जो मुट्ठियों में  थाम कर चलते रहे हैं  आस की चादर बिछाई जिस गगन के आंगनों में  धूप के वातायनों तक दौड़ती पगडंडियों पर  क्या घिरेंगे शुष्क बादल ही बरसते सावनों में  प्रश्न  उठते हैं निरंतर भोर में, संध्या निशा में और कोई चिह्न भी न उत्तरों का नजर आये शून्य है परिणाम में या है अभीप्सित वांछित कुछ जनता यह भी नहीं मन, स्वप्न है फिर भी सजाये 

कलम से इस हथेली पर

अधूरी रह गई सौगंध, जब तुमने कहा मुझसे
कलम से इस हथेली पर समर्पण त्याग लि ​ख ​ देना

कथानक युग पुराना आज फिर दुहरा दिया तुमने
समर्पित हो अहल्या रह गई अभिशाप से  ​दंशित 
तपा सम्पूर्ण काया को धधकती आग से गुज ​री ​
मगर फिर भी रही  ​वैदेही  हर अधिकार से वंचित

कहाँ तक न्यायसंगत है कोई अनुबंध इक तरफ़ा
पुराना पृष्ठ फिर इतिहास का इक बार लिख देना

समर्पित हो , रहे हो तुम कभी इतना बताओ तो
पुरंदर तुम, शची का त्याग क्या इक बार पहचाना
पुरू अपने समय के सूर्य थे तुम घोषणा करते
कभी औशीनरी की उर व्यथा के मूल को जाना

चले हम आज जर्जर रीतियाँ सा ​री ​  बदल डालें
ज़रूरी है ह्रदय पर प्रेम और अनुराग लिख देना

कहो क्या प्रेम आधारित कभी होता है शर्तों  ​पर 
कहाँ मन से मिले मन में उठी हैं त्याग की बातें  ​समर्पण हो गया सम्पूर्ण जब भी प्रेम उपजा है  गए हैं बँध धुरी  से उस, समूचे दिन, सभी रातें 
कहाँ  जन्मांतर सम्बन्ध होते शब्द में सीमित  किशन-राधा सती-शिव का उदाहरण आज लिख देना 
कलम से ज़िंदगी में इक महकता बाग़ लिख देना 

जरा झलक मिल जाये

जरा झलक मिल जाये कमल वासिनी की यही आस ले पूजा की उपवास किये अभिलाषा के बीज बोये नित सपनो में और जलाकर दीवाली के रखे दिए 
सुबह आस की भर कर रखी प्यालियां ले ज्योतिषियों के सम्मुख रखा हथेली को हाथों की रेखा का मेल नक्षत्रों से वह करवा दे तो फिर सुख की रैली हो  दादी नानी से सुन रखा बचपन  में घूरे के भी दिन फिर जाते बरसों में तो संभावित। है अपना भी भाग्य खुले आज नही तो कल या शायद परसों में  
एक सवा मुद्रा का भोग लगाया नित सवा मनी फल का मन मे आभास लिए बीज बोये अभिलाषा के नग्नाई में और दीवाली जैसे दीपित किये दिये
 देते रहे दिलासा मन ही मन खुद को सदा विगत के कर्मो का फल मिलता है परे नील नभ के दूजे इक  अम्बर से इस जीवन को कोई नियंत्रित करता है  उसे रिझाने को रोजाना मंदिर जा  सुबह शाम जा आरतियों को गाते   हैं  एवज़ में पा जाएंगे हम झलक ज़रा   छोटी सी बस इक यह आस लगाते हैं 
माला के मनकों पर गिन गिन  कर हमने  पूरे आठ और सौ मंत्रोच्चार किये  ज़रा खनक मिल जाए स्वर्ण कंगनों की  सांझ सवेरे सपनों का विस्तार किये 

जर्जर हुई मान्यता अंधी श्रद्धाएं गई पिलाई हमें घुटी में बचपन की कर्महीन होकर भी इन राहों पर चल मिल जाया करती चौथाई छप्पन की

गीत की गरिमा भुला दूँ

बह रहे हैं शब्द आवारा निरंकुश काव्य जग में यह नहीं स्वीकार मुझको गीत की गरिमा भुला दूँ
उड़ रही हैं पंख के बिन अर्धकचरी कल्पनाये पद्य का ओढ़े मुखौटा ,कुछ हृदय  की भावनाएं संतुलित तो भाव हो ना पाए, बस दे नाम कविता भीख मांगी जा रही मिल जाए थोड़ी वाहवाहैं 
जो उड़ेले जा रहे तरतीब के बिन शब्द सन्मुख है नहीं स्वीकार मुझको, मैं उन्हें कविता बता दूँ 
दूर कितनी चल सके हैं शब्द अनुशासन नकारे बह सकेगी देर कितनी तोड़ कर नदिया किनारे लय गति और ताल से हो विमुख कविताये विरूपित कोशिशें कर ले भले कितनी छलावों के सहारे
बुलबुलो में जो बने वे चित्र टंकते भीत पर क्या मानते हो तुम तो आओ आज में भ्रम को मिटा दूं
छिन्नमस्ता मूर्तियां कब मंदिरों में सज सकी है छंदमुक्ता पद्य कृति कब याद की सीढी चढ़ी है जो सहज सम्प्रेष्य होता, शब्द वह लय में बंधा है साक्ष्य में यह बात गीता और मानस ने कही है
तर्क है यदि कुछ तुम्हारा,म तो बहो कुछ देर ले में  सत्य खुद तुमसे कहेगा आओ मैं दर्पण  दिखा दूँ 

दीप हूँ जलता रहूँगा

मैं अक्षय विश्वास का ले स्नेह संचय में असीमित  इस घने घिरते तिमिर से अहर्निश लड़ता रहूँगा  दीप  हूँ जलता रहूँगा 
बह रहीं मेरी शिराओं में अगिन प्रज्ज्वल शिखाएं  साथ देती है निरंतर नृत्य करती वर्तिकाएं  मैं अतल ब्रह्माण्ड के शत  कोटि नभ का सूर्यावंशी  जाग्रत मुझ से हुई हैं चाँद में भी ज्योत्स्नायें 
मैं विरासत में लिए हूँ ज्योति का विस्तार अपरिम  जो  ,मिले दायित्व हैं  निर्वाह वह  करता रहूँगा  दीप  हूँ जलता रहूँगा 
हैं मुझी से जागती श्रद्धाविनित  आराधनाएं  और मंदिर में सफल होती रही अभ्यर्थनाएँ  मैं बनारस में सुबह का मुस्करा  आव्हान करता सांझ मेरे साथ सजती है अवध की वीथिकाएँ
मैं  रहा आराध्य इक भोले शलभ की अर्चना का प्रीतिमय बलिदान को उसके अमर करता रहूंगा  दीप हूँ  जलता रहूंगा 
साक्ष्य में मेरे बँधे   रंगीन धागे मन्नतों के सामने मर्रे जुड़े संबंध शत जन्मान्तरों के में घिरे नैराश्य में हूँ संचरित आशाएं बनकर में रहा हूँ आदि से, हर पृष्ठ पर मन्वंतरों के
मैं रहा स्थिर, और मैं ही अनवरत गतिमान प्रतिपल  काल की सीमाओं के भी पार मैं चलता रहूँगा  दीप  हूँ, जलता रहूँगा 

सुधियों के मेरे आंगन में

किसने अलगोजा बजा दिया, मेरी सांसों के तार छेड़ ये कौन सुरभियां बिखराता, सुधियों के मेरे आंगन में
उषा की पहली जगी किरन की ताजा ताजा छुअन लिये पांखुर से फ़िसले तुहिन कणों की गतियों से चलता चलता  झीलों की लहरों के कंपन जैसे चूनर को लहराता ये कौन उमंगों में आकर नूतन उल्लास रहा भरता
निस्तब्ध शांत संध्याओं का  छाया सन्नाटा तोड़ तोड़ किसने इकतारा बजा दिया मेरे जीवन के आंगन में
वातायन में आकर किसने रंग डाले इन्द्रधनुष इतने पाटल पर उभरी हैं फ़िर से कुछ प्रेम कथा इतिहासों की जुड़ गये अचानक नये पृष्ठ इक संवरे हुये कथानक में राँगोली रँगी कल्पना ने , भूले बिसरे मधुमासों की
किसके आने की है आहट जो टेर बनी बांसुरिया की किसने पैझनियाँ थिरकाईं, मन के मेरे वृन्दावन में
किसकी पगतालियाँ की छापें रँग रही अल्पनाये अदभुत  सपनो की दहलीजों से ले सूने मन की चौपालों तक है किसका यह आभास मधुर लहराता हुआ हवाओं में ये कौन मनोरम   प्रश्न बना दे रहा हृदय पर आ दस्तक
कस्तूरी मृग सा भटकाता है कौन मुझे यूं निशि वासर   किसके पग के नूपुर खनके, मन के इस नंदन कानन में 

जहां अनुराग पलता हो

चलेंबावले मन अब किसीअनजानबस्ती में
जहां अनुरागपलताहोसमन्वय से गले मिलकर
प्रतीक्षित दग्ध होकरतूरहेगा और अबकितना ​ अकल्पितद्धेषके झोंके निरंतर आये झुलसाते ​उगीहै राजपथ पर नित नई इर्ष्याओं की बेलें जिधर भी देखता है तूघने कोहरे नजर आते
​चलें चल छोड़ दें ये घर