Monday, August 22, 2016

एकाकियत

कैप्सूलों गोलियों की एक अलमारी

उम्र की इतनी घनी दूुश्वारियों में
आ बढ़ा
कितना अकेलापन
धुंध बन कर आँख में फिर से तिरा
बीते दिनों का
वो खिलंदड़पन
सांझ की बैसाखियों पर बोझ है भारी

स्वप्न जाकत ताक पर था टंग गया
ठुकरा निमंत्रण
लौट न आया
रह गया परछाइयों की भीड़ में
गुमनाम होकर
साथ का साया
रात गिनती गिनतियों को आज फिर हारी



जुड़ गया रिकलाइनर से और टीवी के
रिमोटों से
अटूटा एक अपनापन
बढ़ गई थी फोने के सरगम सुरों से
एक दिन जो
आज भी सुलझी नहीं अनबन
भोर संध्या रात पर एकाकीयत तारी

Monday, August 15, 2016

किसके किसके नाम



संदेशे हर रोज मिले है भोर दुपहरी शाम
लाता रहा रोज ही मौसम किसके किसके नाम

मन की शुष्क वाटिका में पर अब न फूल खिले
जितने भी सन्देश मिले पतझर के नाम मिले
एक कटोरी भरी धूप की देकर गई दुपहरी
बीन ले गई संध्या आकर् जब द्वारे पर उतरी

शेष रह गई चुटकी भर कर बस सिन्दूरी घाम
और रहे आते सन्देशे जाने किसके नाम​

कटते रहे दिवस जीवन के बन कर के अभिशाप
सपनों की परछाईं की भी बची नहीं कुछ आस
रहे गूँजते सांसों में बस सन्नाटे के गीत
एकाकीपन रहा जोड़ता मन से अपनी प्रीत

एक कील पर अटक गये सब दिन के प्रहर तमाम
और पातियाँ थी मौसम की किसके किसके नाम

तिरते रहे हवाओं में टूटी शपथों के बोल
बिकी भावना  बाज़ारोा में बस कौड़ी के मोल
नयनो की सीपी पल पल पर स्वाति बूँद को तरसी
फिर से घिरी घटा अंगनाई से गुजरी बि​न बरसी

विरही  मन के मेघदूत को मिला न पी का गाँव
थका  खोजते  लिखे मिले थे और किसी के नाम​

Monday, August 08, 2016

वे सारे सन्देश जिन्हें तुम लिख न सके

वे सारे सन्देश जिन्हें तुम लिख न सके व्यस्तताओं में​
आज महकती पुरबाई ने वे सब मुझको सुना दिए हैं

मुझे विदित है मन के आँगन में होती भावो की हलचल
और चाहना होगी लिख दो मुझको अपने मन की बाते
लेकिन उलझे हुए समय की पल पल पर बढ़ती मांगो में
जाता होगा दिन चुटकी म बीती होंगी पल में रातें

उगती हुई भोर की किरणों ने पाखी के पर रंग करके
वे सारे सन्देश स्वर्ण में लिख कर जैसे सजा दिए हैं

शब्द कहाँ आवश्यक होते मन की बातें बतलाने को
​औरकहाँ सरगम के सुर भी व्यक्त कर सके इन्हें कदाचित
लेकिन नयनों की चितवन जब होती है आतुर कहने को
निमिष मात्र में हो जाते हैं अनगिन महाग्रंथ संप्रेषित

बोझिल पलकों से छितराती हुई सांझ सी  सुरमाई ने
नभ के कैनवास को रंग कर वे सब मुझकोदिखा दिए है

वैसे ही सन्देश लिखे थे जो रति ने अनंग को इक दिन
और शची ने जिनसे सुरभित करी पुरंदर की अंगनाई
दमयंती के और लवंगी के नल जगन्नाथ  तक पहुंचे
जिनसे बाजीराव पेशवा के मन में गूंजी शहनाई 

कलासाधिके! आज हिना के और अलक्तक के रंगों ने

अनचीन्हे सन्देश सभी वे चित्रित कर के बता दिए हैं

Monday, August 01, 2016

मेघों के कन्धों पर

कालिदास की अमर  कल्पना​
को फिर से दोहराया मैंने
मेघों के कांधों पर रखकर
यह सन्देश पठाया मैने

कितनी बार शिकायत के स्वर
मेरे कानों से टकराये
कितने बीत गये दिन, कोई
तुम सन्देशा भेज न पाये
भेजे तो थे सन्देशे पर
रूठा मौसम का हरकारा
इसीलिये तो सन्देसों को
मिला नहीं था द्वार तुम्हारा

मौसम  की हठधरमी वाली
गुत्थी को सुलझाया मैने
मेघों के कन्धों पर रखकर
यह सन्देश पठाया मैने

श्याम घटाओं से लिख कर के
अम्बर के नीले कागज़ पर
रिमझिम पायल की रुनझुन की
सरगम वाली मुहर लगाकर
सावन की मदमाती ऋतु से
कुछ नूतन सम्बन्ध बनाये
ताकिं कोई भी झोंका फिर से
इनको पथ से भटका पाये

अनुनय और विनय कर करके
मौसम को समझाया मैंने
मेघों के कन्धों पर रखकर
यह सन्देश पठाया मैंने

​जितने भाव दामिनी द्युति से  
कौंधे मन की अँगनाई में
उन सबको सज्जित कर भेजा 
है बरखा की शहनाई में​

दिया की लहरों पर खिलते
बून्दों के कोमल पुष्पों से
कर श्रुन्गार, सजाया भेजा
सन्देशा मैने गन्धों से

डूब प्रेम में उसे सुनाये
मौसम को उकसाया मैने
मेघों के कंधों पर रख कर
यह सन्देश पठाया मैने

Monday, July 25, 2016

भर लें होठों से झरी चांदनी

मन के पन्नो पर अंकित है जितने भी स्मृति लेख आज, कल
सम्भव है उनको धो डालें उगे सूर्य की प्रखर रश्मियां
और पास में रह जाए बस धुले हुए बादल के टुकड़े
जिन पर गिरे दामिनी आकर​ और रचे कुछ नई पंक्तियाँ

तो फिर क्यों  न आज बैठ कर साथ बिताएँ हम कुछ घड़ियां
और सांझ के प्याले में भर लें होठों से झरी चांदनी

शेष रहा संचय में कितना, कटी उमर ने दिन दिन जोड़ा
वर्तमान ठुकराया, जीते भग्नावशेष विगत के लेकर
या आगत के दिवास्वप्न के सायों को बांहो में जकड़े
और भुलाकर आज दे रहा था जो अमृत आंजु​रि भर कर


तो फिर क्यों न आज, बंद कर हर इक खिड़की के पल्ले को
बैठे पास और सुन ले ​जो सरगम छेड़े मधुर रागिनी  


मुड़ कर पीछे छूट गए पदचिह्न देखने से क्या हासिल
यौवन की वयःसंधि तलक ही मानचित्र बस राह दिखाते
चौराहे पर पहुँच किया जाता जो निर्णय अपना होता
चुननी होती राह स्वयं ही जिस पर पग फिर चलते जाते

तो फिर क्यों न आज चुने हम उन गलियारों की राहों को
जहां ज़िन्दगी नहीं नियंत्रित करती कोई समय सारिणी


कटी पतंगों की डोरी में सादा पन क्या और मांझा क्या
वापिस नहीं जोड़ती उन को थमी हुई चरखी हाथों में
थापों में हो चुकी खर्च धड़कन प्राणों की वंसी के संग
निधि बन कर फिर शेष कहाँ रह पाती है संचित साँसों में

तो फिर क्यों न आज, आज के साथ गले मिल गा लें जी लें
ताकि न कल, कल की गोखो से पड़े आज की धूल ताकनी

Monday, July 18, 2016

केवल मीत तुम्हीं हो कारण

वीणा की झंकृत  सरगम ने
सुना कंठ स्वर मीत तुम्हारा
कहा आठवें सुर की रचना
का बस एक तुम्ही हो कारण

सारंगी ने जो सितार के
तारों को झंकार बजाया
बांसुरिया ने अलगोजे की
देहरी पर जा जिसको गाया
इकतारे में जागी लहरी
रह रह जिसे पुकारा करती
पवन झकोरे ने बिन बोले
जिसको संध्या भोर सुनाया

वह स्वर जाग्रत तुमसे ही तो
हुआ गूँजती प्रतिध्वनियों में
और जिसे दोहराते आये
दरबारों के  गायक, चारण

जागी हुई भोर में किरणें
जो प्राची को रही सुनाती
गौरेय्या के चितकबरे पंखों
पर जिसे धूप लिख जाती
स्तुतियों से हो परे, मंत्र की
ध्वनियों की सीमा से आगे
जिसे व्योम में ढूँढा करती
यज्ञ-धूम्र रेखा लहराती

परे अधर के स्पर्शों के जो
व्यक्त हुआ नयनों के स्वर में
वह सुर जिसका सकल विश्व में
मिलता कोई नहीं उदाहरण

आदि अनादि अक्षरों की धुन
है इक जिस सुर पर आधारित
भंवरों का गुंजन, लहरों का
कम्पन जिससे है अनुशासित
स्वर के आरोहों की सीमा 
से भी जो हो रहा अकल्पित
राग-रागिनी के गतियों के
नियम हुये जिससे प्रतिपादित

करते सदा तपस्या जिसके लिये
अधर कर लें उच्चारण
उस अष्टम सुर की रचना का
केवल मीत तुम्हीं हो कारण

Monday, July 11, 2016

पूरी कविता में कुछ अक्षर

लिखे रोज ही गीत नए, कुछ द्विपदियां कुछ लिखता मुक्तक
 लेकिन लगता  छूट  गये हैं  पूरी कविता  में कुछ अक्षर 

शब्दों की  संरचनाएं   तो लगती रही  सदा ही पूरी 
और मध्य में भावों के भी सम्प्रेषण से रही न दूरी 
मात्राओं  ने योग पूर्ण दे, शब्दों  का आकार संवारा 
फिर भी लगता आड़े आई कहीं किसी के कुछ मज़बूरी 

लय ने साथ निभाया पूरा, पंक्ति पंक्ति के संग संग चलकर 
फिर भी लगता  छूट  गये हैं  पूरी कविता  में कुछ अक्षर 

आंसू, पीर, विरह की घड़ियाँ , आलिंगन को तरसी बाँहें 
लिए प्रतीक्षा बिछी हुई पगडण्डी पर जल रही निगाहें 
पाखी की परवाजों के बिन, नीरवता में डूबा अम्बर 
अपना पता पूछती पथ में, भटक रही जीवन की राहें 

बनता रहा कथाएं इनकी, अहसासों के रंग में रंग कर
लेकिन फिर भी क्यों लगता है, हर कविता में छूटे अक्षर 

शायद अभी समझ ना आये, अर्थ मुझे अक्षर अक्षर के 
और शब्द ने भेद ना खोले, बदले हुए तनिक तेवर के 
इसीलिये हर बार अधूरे रहे गीत कवितायें मेरी 
उंगली पकड़ छन्द कोई भी चला ना साथ मुझे लेकर के 

नई भोर आ नित देती है, संकल्पों की आंजुरी भरकर 
फिर भी लगता  छूट  गये हैं  पूरी कविता  में कुछ अक्षर