Monday, January 30, 2012

एक आवाज़ कुछ गुनगुनाती रही


ढल रही शाम की वीथियों में कहीं
एक आवाज़ कुछ गुनगुनाती रही
पत्र पर बादलों की पड़ी छाँव सी
आपकी याद ले सरसराती रही
 
धूप अपना दुपट्टा गई छोड़ कर
जब प्रतीची के घर को चढ़ी पालकी
धार नदिया की बस देखती रह गई
धूप-रोली बिखरते हुये थाल की
बातियाँ दीप की लग पड़ीं जागने
नींद से, आंख अपनी मसलते  हुये
एक पल के लिये सब ठिठक रुक गये
जितने भी बिम्ब थे राह चलते हुये
 
आरती के दिये में सजी ज्योत्सना
बस अकेली वहाँ झिलमिलाती रही
 
रात ने डोरियां चन्द लटकाईं तो
घुप अँधेरा सहज ही उतरने लगा
काजरी आँख को श्याम करते हुए
रेख में एक, काजल संवरता रहा
स्वप्न को इसलिये एक टीका लगा
ताकि उसको कहीं न नजर लग सके
और चुपचाप ही याद को ओढ़कर
मन की एकाकियत में उतर भर सके
 
राह की शून्यता पास आके नयन
झट से छूते हुये दूर जाती रही
 
उंगलियों से हिनायें बिखर व्योम में
लिख गईं नाम बस एक ही,चित्र सा
अंक अपने दिशाओं ने वह भर लिया
कौन जाने उन्हें कैसा विश्वास था
छेड़ती रागिनी इक रही जाह्नवी
नभ में, अपनी तरंगे उठाते हुये
और भरती रही गंध से पांखुरी
नीर अपना छलक कर गिराते हुये

कोई सन्देश ले भोर आ जायेगी
दृष्टि पथ में नयन थी बिछाती रही

Monday, January 23, 2012

फिर चुनाव की रुत आई


फिर चुनाव की रुत आई
 
रोपे जाने लगे बीज गमलों में फिर आश्वासन के
अपने तरकस के तीरों पर धार लगे लेखक रखने
अंधियारी गलियों में उतरी मावस के दिन जुन्हाई
बंजरता  को लगे सींचने देव सुधाओं के झरने
चांदी के वर्कों से शोभित हुई देह की परछाई
फिर चुनाव की रुत आई
 
बूढ़े बिजली के खम्भों पर आयी सहसा तरुणाई
पीली सी बीमार रोशनी ने पाया फिर नवयौवन
चलकर आई स्वयं द्वारका आज सुदामा के द्वारे
तंदुल के बिन लगा सौंपने दो लोकों को मनमोहन
सूखे होठों ने फिर कसमें दो हजार सौ दुहाराईं
फिर चुनाव की रुत आई
 
बनी प्याज के छिलकों सी फिर लगी उधड़ने सब परतें
बदलीं जाने लगी मानकों की रह रह कर परिभाषा
जन प्रतिनिधि  फिर आज हुए हैं तत्पर और हड़प कर लें
जन निधियों का शेष रह गया संचय जो इक छोटा सा
हुईं पहाड़ की औकातें भी आज सिमट कर के राय
फिर चुनाव की रुत आई
 
लगीं उछलने गेंदें आरोपों की प्रत्यारोपों की
चौके छक्के लगे उड़ाने कवि मंचों से गा गाकर
उठे ववंडर नये चाय की प्याली में फिर बिना रुके
अविरल धारा लगा बहाने वादों का गंगासागर
धोने लगा दूध रह रह कर फिर चेहरों की   कजराई
फिर चुनाव की रुत आई
 

Monday, January 16, 2012

और करूँ बस बातें तुमसे

मैने कब यह कहा कि मैं हूँ कोई कवि, कविता करता हूँ
या मैं कोई चित्रकार हूँ, रंग चित्र में ला भरता हूँ
मैं तारों की छाया में इक भटक रहा आवारा बादल
उषा की अगवानी करता, मैं पंखुरियों पर झरता हूँ
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आज अचानक ना जाने क्यूँ ऐसा मुझको लगा सुनयने
गीत गज़ल सब लिखना छोड़ूँ, और करूँ बस बातें तुमसे

पूछूँ मुझसे दूर तुम्हारे कैसे कटते हैं दिन रातें
क्या पाखी लेकर आते हैं कुछ सन्देशों की सौगातें
जैसे मेरा मानस पट बस चित्र तुम्हारे दिखलाता है
नयन तुम्हारे भी क्या वैसे देखें चित्रों की बारातें

हवा चली उत्तर से आये दक्षिण से पूरब पश्चिम से
उसकी हर अंगड़ाई मुझको लगता जुड़ी हुई है तुमसे

बुनता लिये कल्पनाओं के धागे मन बासन्ती पल्लव
खड़ी रसोई में चूल्हे पर चाय बनाती होगी तुम जब
अनायास उग गये भाल पर स्वेद कणों को चुम्बित करने
स्वयं कमर में उड़सा पल्लू बाहर आ जाता होगा तब

काफ़ी का प्याला हो कर में या हो चाय दार्जिलिंग वाली
लगता मुझे अनूठेपन का स्वाद मांग लाई हैं तुमसे

आ जाता है ख्याल काम जब करता मैं अपने दफ़्तर में
तब हर अक्षर मुझको लगता लिखा तुम्हारे ही खुश्खत में
क्या तुमने भी महसूसा है ऐसे ही कुछ व्यस्त पलों में
कभी ट्रेन में आफ़िस में या कभी काम कुछ करते घर में

लिखता हूँ तो शब्द तुम्हारे ही नामों में ढल जाता हैं
पढ़ता हूँ तो गीत कहानी सब कुछ प्रेरित लगता तुमसे

Monday, January 09, 2012

संभव नहीं मुझे शतरूपे

संभव नहीं मुझे शतरूपे करुँ विवेचन संदेशों का
बिना शब्द के लिखे हुए हैं जो कि नयन पृष्ठों पे तुमने
 
शब्दों की अक्षमताओं का भान तुम्हें है, ज्ञात मुझे है 
इसीलिए ही मनभावों को व्यक्त किया रच नव भाषायें 
अपनी हर अनुभूति रंगी है मूक नयन के संप्रेषण में
करती है जीवंत हृदय के पाटल पर अंकित गाथायें
 
परकोटे की खिंची हुई हर इक रेखा को धूमिल कर के
वक्षस्थल पर लिखा समय के हस्ताक्षर कर कर कर तुमने 
 
हुए सहज आलोकित जितने भी अभिप्राय मौन स्वर के थे
अनायास हो गया भावनाओं का फ़िर समवेत प्रकाशन 
ज्ञात तुम्हें है, ज्ञात मुझे है, उन अबोल अनमोल क्षणों में
कितनी बार टूट कर बिखरा ओढ़ा हुआ एक अनुशासन 
 
कहने की है नहीं तनिक भी आवश्यकताएं पर फ़िर भी
कहता हूँ फ़िर से लिख डाला मन पट पर नव आखर तुमने
 
भाव अंकुरित मीरा वाले दो पल, फ़िर दो पल राधा के 
किन्तु अपेक्षित मुरली वादन मैं असमर्थ रहा करने में 
मैं अविराम निरंतर गतिमय, ठिठका नहीं पंथ में तो फ़िर
कला साधिके ! साथ चली तुम  बन कर धाराएं झरने में
 
इसी एक पल की परिणति है मैं जिसको स्वीकार कर रहा
अपने नाम लिख लिए मेरे सारे ही निशि-वासर तुमने 

Thursday, January 05, 2012

2012


हों दिवस आपके स्वर्ण पत्रों मढ़े और रजनी को रंगती रहे चाँदनी

आपके पंथ को सींचती नित रहे करते छिडकाव आकर घटा सावनी

भोर सारंगियों की धुनों में सजे,सांझ तुलसी के चौरे जला दीप हो

आपके द्वार पर सरगमों को लिए हर घड़ी मुस्कुराती रहे रागिनी



टूट कर आस के फूल पिछले बरस,जो बिखर रह गए फिर से जीवंत हों

आस्था फिर नई दुल्हनों सी सजे,आपके स्वप्न फिर अनलिखे ग्रन्थ हों

ताकते उँगलियों का इशारा रहें आपकी, नभ के नक्षत्र तारे सभी

हर घड़ी आके चूमे सुयश आपको,कीर्ति से आपकी लोक जयवंत हों



Sunday, January 01, 2012

स्वप्न फ़िर भी आँज लें हम

दस्तकें देने लगा है द्वार पर नववर्ष साथी

बीज गमलों में लगायें आओ फ़िर से कामना के

जानते परिणति रहेगी,दोपहर में ओस जैसी

स्वप्न फ़िर भी आँज लें हम आँख में संभावना के



आज फ़िर से मैं कहूँ हों स्वप्न सब शिल्पित तुम्हारे

इस बरस खुल जायें सब उपलब्धियों के राज द्वारे

रुत रहे नित खिड़कियों पर धूप की अठखेलियों की

सांझ अवधी हो उगे हर भोर ज्यों गंगा किनारे

दस्तकें दें द्वार पर आ वाक्य नव प्रस्तावना के



घिस गई सुईयां यही बस बात रह रह कर बजाते

थाल में पूजाओं के, टूटे हुये अक्षत सजाते

रंगहीना हो चुकी जो रोलियां, अवशेष उनके

फ़िर भुलावे के लिये ला भाल पर अपने लगाते

मौन हैं घुंघरू, गई थक एक इस नृत्यांगना के



इसलिये इस बार आशा है कहो तुम ही सभी वह

जो कि चाहत के पटल पर चढ़ न पाया, है गया रह

जो अपेक्षित था अभी भी है नहीं आगे रहे जो

वर्ष का नव रूप जिसको जाये कर इस बार तो तय

प्राप्तिफ़ल लिख दो समय के शैल पर आराधना के


३१ दिसम्बर २०११

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Monday, December 26, 2011

एक पत्थर को हम पोत सिन्दूर से

जोकि बस में नहीं था किसी के कहीं
आस बस इक उसी की लगाते रहे
 
 
बुझ गई आखिरी दीप की वर्त्तिका
रोशनी लड़खड़ाते हुए गिर पड़ी
रात के गर्भगृह में रही बन्दिनी
भोर के हाथ में थी लगी हथकड़ी
स्वर प्रभाती के सब मौन हो रह गये
आरती की नहीं घंटियाँ बज सकीं
दिन चढ़े देर तक सोई थी नीड़ में
एक चिड़िया गई सांझ से थी थकी
 
 
और हम सरगमों पर सजा, रात भर
का है मेहमाँ अंधेरा ये गाते रहे
 
 
थी टिकी उत्तरी ध्रुव के अक्षांश पर
रात की चादरें थीं बहुत ही बड़ी
संशयों में घिरी दूर के मोड़ से
ताकती रह गई धूप सहमी बड़ी
द्वार पर आगमन के पड़ी आगलें
जो कि क्षमताओं की रेख से थीं अधिक
और था सामने हंस ठठाता रहा
खिल्लियाँ सी उड़ाते दिवस का बधिक
 
 
अपने विश्वास की चिन्दियाँ देखते
हम हवा की मनौती मनाते रहे
 
 
कोई आ पायेगा धुन्ध को चीर कर
जानते थे नहीं शेष संभावना
किन्तु फिर भी कहीं आस की ले किरन
हम छुपाते रहे पास का आईना
इक अविश्वास पर फिर मुलम्मा चढ़ा
मूर्तियों को नमन नित्य करते हुए
जो कि अनभिज्ञ अपने स्वयं से रहे
उन नक्षत्रों की गतियों से डरते हुए
 
 
एक पत्थर को हम पोत सिन्दूर में
भोर संध्या में मस्तक नवाते रहे