Monday, September 19, 2016

बदले ना विधना का लेखा

रही कोशिशें असफल।बदले ना विधना का लेखा

नईै सुबह परिवर्तन अपने संभव है कल
लेकर आये
आस सजी थी संध्या से ही
छाई हुई तिमिर की बदली छँट जायेगी
उगती हुई
धूप की थिरकन छूते से ही

मगर भोर पर इतिहासों ने खींची लक्ष्मण रेखा


परिणति कब बदली है तपती हुई जेठिया
दोपहरी में
संचित रखे तुहिन कणो की
सदियों से दोहराती जाती रही व्यवस्था
कब संभव है
रहे पाहुनी चार घडी ही

इसी सत्य ने फिर से खुद को आईने में देखा


रहे उगाते अंगनाई के टूटे हुए कुम्भ गमलों में
ताजमहल नित
 सुबह शाम सपनो के
रहे ढूंढते घिर कर रहते हुए कुहासों की छाया में
इंद्रधनुष बन जाए
जिनमें रंग रहे  अपनों के

टूटे बिम्बो में निकालते रहे मीन और मेखा

Monday, September 12, 2016

किसो अधर पर नहीं

किसो अधर पर नहीं जड़ा पिघले सावन का चुम्बन
सूने पनघट पर क्या करती पायलिया की रुनझुन


एक बार फिर लौटी नजरे, खाली हाथ डगर से
दिन गुजरे बैठा न कोई पाखी आ कर छत पे
रोता रहा पपीहे का स्वर भटका हुआ हवा में
लौटा गया दिवस आशाएं तोड़ तोड़ संध्या  में


किसी अधर पर नहीं रुका पल को आकर भी स्पंदन
सूने पनघट पर क्या करती पायलिया की रुनझुन 


दिशाहीन भटके संदेशों के कपोत सब नभ में
 रहा बदलता एक प्रतीक्षा का पल भी परवत में
मन की सिकता बिछी रही बन नदियातट की रेती
जिस पर आकर बांसुरिया की धुन ना कोई लेटी


किसी अधर पर मढ़ा नहीं सांसों ने आ चन्दन वन
सूने पनघट पर क्या करती पायलिया की रुनझुन 


रही फडकती किसी परस को तरसी हुईभुजाये
थमी न पल भर रही दौड़ती 
नस ​नस में शम्पाये
सुलगा करी तले तरुवर के जन्मांतर की कसमें
विधना पर दोषारोपण ही रह पाया बस , बस में



किसी अधर  पर नहीं गिरी अमृत कलसी की छलकन
सूने पनघट को क्या कहती पायलिया की रुनझुन

Monday, September 05, 2016

चौराहों पर लिए प्रतीक्षा बीती सुबह शाम

जीवन के इस महानगर में
दोपहरी बीती दफ्तर म
चौराहों पर लिए प्रतीक्षा
बीती सुबह शाम

कहने को भी पल या दो पल
अपने नही मिले
बोते रहे फूल गमलों में
लेकिन नहीं खिले
करे नियंत्रित र
खेघड़ी की
दो सुइयां अविराम


यौवन चढ़े निशा पर लेकिन
सजे नहीं सपना
परछाई ने रह रह पूछा
है परिचय अपना
कोई 
मिलता नहीं राह में
​करने 
दुआ सलाम


प्रगति पंथ के मोड़ मोड़ पर
विस्तृत डायवर्जन
प्राप्ति और अभिलाषाओं के
मध्य ठनी अनबन
साँसों ने धड़कन ने माँगा
है जीने का दाम

Monday, August 29, 2016

कहना होगा तुम हो पत्थर

थी हमें पिलाई गई यहाँ घुट्टी में घोल कई बातें
जिनको दोहराते बीते दिन, बीती अब तक सारी रातें
इस जगती की हर हलचल का है एक नियंत्रक बस सत्वर
हर घटना का है आदि अंत बस एक उसी की मर्जी पर

पाले बस यही मान्यताएं नतमस्तक थे मंदिर जाकर
आराधे सुबहो शाम सदा प्रतिमा में ढले हुए पत्थर

गीता ने हमको बतलाया, वह ही फल का उत्तरदायी
कर्तव्य हमारे बस में है, परिणाम सुखद सब होता है
उसने संबोधित होने को, मध्यस्थ न आवश्यक कोई
जो भी उससे बातें करता, वो सारी बातें सुनता है

तो आज हजारो प्रश्न लिए आया हूँ द्वार तुम्हारे पर
यदि उत्तर नहीं मिले तो फिर, कहना होगा तुम हो पत्थर


तुमने जब सृष्टि रची थी तब क्या सोचा था बतलाओ तो
क्यों धर्म रचा जो आज हुआ मानवता का कट्टर दुश्मन
क्यों ऐसे बीज बनाये थे जो अंकुर हों जिस क्यारी में
उसक्यारी में ही आयातित करते है अनबन के मौसम


वसुधैवकुटुंबम शिलालेख जो बतलाती संस्कृतियोंका
उस एक सभ्यता को सचमुच कहना होगा अब तो​ पत्थर


जो स्वार्थ घृणा और अहाँकर की नींवों पर निर्मित होता
उस एक भवन की प्रतिमा में कब प्राण प्रतिष्ठितहोते हैं 
तुम इन प्रासादों के वासी,  जो चाकर चुने हुए तुमने
वे श्रद्धा और आस्था की बेशर्म तिजारत करते है



तुम निस्पृह होकर के विदेह हो चित्रलिखित बस खड़े हुए
तो मन क्यों माने ईश् तुम्हें, कहना होग हो पत्थर

Monday, August 22, 2016

एकाकियत

कैप्सूलों गोलियों की एक अलमारी

उम्र की इतनी घनी दूुश्वारियों में
आ बढ़ा
कितना अकेलापन
धुंध बन कर आँख में फिर से तिरा
बीते दिनों का
वो खिलंदड़पन
सांझ की बैसाखियों पर बोझ है भारी

स्वप्न जाकत ताक पर था टंग गया
ठुकरा निमंत्रण
लौट न आया
रह गया परछाइयों की भीड़ में
गुमनाम होकर
साथ का साया
रात गिनती गिनतियों को आज फिर हारी



जुड़ गया रिकलाइनर से और टीवी के
रिमोटों से
अटूटा एक अपनापन
बढ़ गई थी फोने के सरगम सुरों से
एक दिन जो
आज भी सुलझी नहीं अनबन
भोर संध्या रात पर एकाकीयत तारी

Monday, August 15, 2016

किसके किसके नाम



संदेशे हर रोज मिले है भोर दुपहरी शाम
लाता रहा रोज ही मौसम किसके किसके नाम

मन की शुष्क वाटिका में पर अब न फूल खिले
जितने भी सन्देश मिले पतझर के नाम मिले
एक कटोरी भरी धूप की देकर गई दुपहरी
बीन ले गई संध्या आकर् जब द्वारे पर उतरी

शेष रह गई चुटकी भर कर बस सिन्दूरी घाम
और रहे आते सन्देशे जाने किसके नाम​

कटते रहे दिवस जीवन के बन कर के अभिशाप
सपनों की परछाईं की भी बची नहीं कुछ आस
रहे गूँजते सांसों में बस सन्नाटे के गीत
एकाकीपन रहा जोड़ता मन से अपनी प्रीत

एक कील पर अटक गये सब दिन के प्रहर तमाम
और पातियाँ थी मौसम की किसके किसके नाम

तिरते रहे हवाओं में टूटी शपथों के बोल
बिकी भावना  बाज़ारोा में बस कौड़ी के मोल
नयनो की सीपी पल पल पर स्वाति बूँद को तरसी
फिर से घिरी घटा अंगनाई से गुजरी बि​न बरसी

विरही  मन के मेघदूत को मिला न पी का गाँव
थका  खोजते  लिखे मिले थे और किसी के नाम​

Monday, August 08, 2016

वे सारे सन्देश जिन्हें तुम लिख न सके

वे सारे सन्देश जिन्हें तुम लिख न सके व्यस्तताओं में​
आज महकती पुरबाई ने वे सब मुझको सुना दिए हैं

मुझे विदित है मन के आँगन में होती भावो की हलचल
और चाहना होगी लिख दो मुझको अपने मन की बाते
लेकिन उलझे हुए समय की पल पल पर बढ़ती मांगो में
जाता होगा दिन चुटकी म बीती होंगी पल में रातें

उगती हुई भोर की किरणों ने पाखी के पर रंग करके
वे सारे सन्देश स्वर्ण में लिख कर जैसे सजा दिए हैं

शब्द कहाँ आवश्यक होते मन की बातें बतलाने को
​औरकहाँ सरगम के सुर भी व्यक्त कर सके इन्हें कदाचित
लेकिन नयनों की चितवन जब होती है आतुर कहने को
निमिष मात्र में हो जाते हैं अनगिन महाग्रंथ संप्रेषित

बोझिल पलकों से छितराती हुई सांझ सी  सुरमाई ने
नभ के कैनवास को रंग कर वे सब मुझकोदिखा दिए है

वैसे ही सन्देश लिखे थे जो रति ने अनंग को इक दिन
और शची ने जिनसे सुरभित करी पुरंदर की अंगनाई
दमयंती के और लवंगी के नल जगन्नाथ  तक पहुंचे
जिनसे बाजीराव पेशवा के मन में गूंजी शहनाई 

कलासाधिके! आज हिना के और अलक्तक के रंगों ने

अनचीन्हे सन्देश सभी वे चित्रित कर के बता दिए हैं