Sunday, January 15, 2017

शिवम् सुन्द​रम ​ गाती है

कभी एक चिंगारी बन कर विद्रोहों की अगन जगाती
बन कर कभी मशाल समूचे वन उपवन केओ धधकाती है
सोये 
​चेतन ​
 को शब्दो 
​की 
दस्तक देकर रही उठाती
कलम हाथ में जब भी आती शिवम् सुन्द
​रम 
 
गाती है 

विलग उँगलियों के 
​स्पर्शों 
 ने विलग नए आयाम निखारे
हल्दीघाटी और उर्वशी, प्रिय प्रवास
​ ​
गीतम गोविन्दम
रामचरितमानस 
​सु
खसागर, ऋतु संहार से
​ मेघदूत तक ​
चरित सुदामा ओ 
​साकेतम 
वेदव्यास का अभिन
​ विवेचन 

एक और यह कलम सुनाती गाथा पूर्ण महाभारत की 
और दूसरी और संदेसे गीता बन कर लाती है

बन जाती है कभी तमन्ना सरफ़रोश की  आ अधरों पर
करती
​ है आव्हान कभी यह  रंग ​
दे कोई बसंती चोला
कभी 
​मांगती है आहुतियां जीवन के 
के अनवर
​त ​
 होम में
कभी  अनछुए आयामों को सन्मुख लाकर इसने खोला

मासि की अंगड़ाई ज्वालायें भर देती है रोम रोम में
बलिदानों के दीप मंगली,  संध्या भोर जलाती है

व्विद्यापति के छू भावो को करती है श्रृंगार रूप का
कालिदास के संदेशे को ले जाती है मेघदूत बन
अधर छुए जयदेव के तनिक और गीत गोविन्द कर दिए
निशा निमंत्रण मधुशाला बन इठलाई जब छूते बच्चन

दिनकर के आ निकट सिखाई रूप प्रेम की परिभाषाये
और दूसरी करवट लेकर यह हुंकार जगाती है 

Monday, January 09, 2017

और इक बरस बीता

और इक बरस बीता

करते हुए प्रतीक्षा अब की बार
जतन कर बोये
जितने वे अंकुर फूटेंगे
अंधियारे जो मारे हुए कुंडली
बन मेहमान रुके है
संभवतः रूठेंगे
आश्वासन की कटी पतंगों
की डोरी में उलझे 
अच्छे दिन आ जाएंगे
नऐ भोर के नए उजाले
नव सूरज की किरणें लेकर
तन मन चमकाएंगे
 
अँधियारा पर जीता

नयनो की अंगनाई सूनी रही
क्षितिज की देहरी पर ही
अटके सारे सपने
लगे योजनाओ के विस्तृत
मीलो तक बिखरे पैमाने
बालिश्तों से नपने 
​ति​
हासो के पृष्ठ झाड़ कर
जमी धूल की परते
फिर से आगे आये
और नए की अगवानी में
घिसे पिटे से
​ ​
​चंद
गीत
फिर से दुहराये

 रही प्रतीक्षित सीता


आशाओ के इंद्रधनुष की
रही प्रतीक्षा, कोई आकार
प्रत्यंचा को ताने
आवाहन के मंत्रो का
उच्चार करे फिर
तीर कोई संधाने
सहज साध्य में हर असाध्य को
एक परस से निज
परिवर्तित कर दे
​पर्वत
सी हर इक बाधा को
बिन प्रयास ही
धराशायी जो कर दे

रही अनकही गीता 

Sunday, January 01, 2017

वर्ष नया मंगलमय कहने


Monday, December 26, 2016

पा तेरा सान्निध्य रुत होती सुहागन

बादलों के पृष्ठ पर पिघले सितारे शब्द बन कर 
चांदनी की स्याही में ढल लिख रहे हैं नाम तेरा 
धुप की किरणें तेरी कुछ सुरभिमय सांसें उठाये 
खींचती हैं कूचियां बन कर क्षितिज पर नव सवेरा

प्राण सलिल पा तेरा सान्निध्य रुत होती सुहागन
ओर संध्या की गली सुरमाई, होती आसमानी

शोर में डूबी नगर की चार राहो का मिलन स्थल
मधुबनी होता तेरे बस नाम का ही स्पर्श पाकर
और ढलते हैं सभी स्वर गूँज में शहनाइयों की
जब छलकती है तेरी इस चुनरी की छाँह गागर

शुभ्रगाते देह तेरी से झरी आभाये लेकर
सज रही है ज्योत्सनाओं की छटा में रातरानी

कुम्भ में साहित्य के तो  रोज ही कविता नहाती
एक तेरे नाम की डुबकी महज होती फलित है
गीत औ नवगीत चाहे जोड़ ले कितना, घटा ले
व्यर्थ होता बिन तेरे इक स्पर्श के सारा गणित है 

रच रहा हो काव्य कितने भाष्य कितने ये समय पर 
बिन तेरे सान्निध्य के सब रह गए बन लंतरानी 

पत्रिका में  फेसबुक पर  व्व्हाट्सएप पर गीत गज़लें 
रोज ही बहते रहे हैं एक हो अविराम निर्झर  
नाम तेरे के बिना बधते नयन की डोर से कब  
व्यर्थ  हो  जाते  रहे है बस नदी की धार हो कर

साक्ष्य बन कर सामने इतिहास फिर से कह रहा है
बिन तेरे ही नाम के कब पूर्ण होती है कहानी

Monday, December 19, 2016

हम करते संवाद रह गए

पल तो रहे सफलताओ  ​के​दूर सदा ही इन राहो से
खड़े मोड़ पर आभासों से हम करते संवाद रह गए

झड़े उम्र की शाखाओं से एक एक कर सारे पत्ते
तय करते पाथेय सजे से नीड सांझ तक के, की दूरी
औ तलाशते हुए आस के पंछी इक सूने अम्बर में
रही रोकती परवाज़ो को जिनकी घिर कोई मज़बूरी

उभरा नहीं नजर के आगे आ कोईआकार  समूचा
परछाई की परछाई से करते वाद- विवाद रह गए

मिला नहीं विश्रांति मोड़ पर बादल का टूटा टुकड़ा भी
बहा ले गए साथ चले विपरीत दिशा में चंचल झोंके
बही चिलचिलाती किरणों के शर से सज्जित हो झंझाये
शस्त्र नहीं था कर में संभव हो न सका पल भर भी रोके

एक बार तो आकर रथ की वलगाये ले ले हाथो में
पार्थसारथी के द्वारे पर नित करते फ़रियाद रह गये

देते रहे निमंत्रण हमको मंज़िल के ऊंचे कंगूरे
हाथो में भी थमी हुई थी लंबी इक कमंद की डोरी
पर अशक्त कांधों की क्षमता आड़े आती रही हर घड़ी
रही ताकती नभ का चन्दा सूनी नजरे आस चकोरी

साँसों की सरगम तो आतुर रही सजाये गीत मधुर इक
आर्त स्वरों में राग रागिनी लेकिन करते नाद रह गए

Monday, December 12, 2016

सूर्य नूतन वर्ष का

सूर्य नूतन वर्ष का बस है गली को मोड़ पर ही
आओ अगवानी करे, ले पृष्ठ कोरे साथ मन के

वेदना के पल गुजरते वर्ष ने जितने दिए थे
हम उन्हें इतिहास की अलमारियों में बंद कर दे
नैन में अटकी हुई है बदलियां निचुड़ी हुई जो
अलगनी के छोर पर उनको उठाकर आज धर दे

अर्थहीना शबडी की अब तोड़ कर पारंपरिता
मन्त्र  रच ले कुछ नए आतिथ्यके लेशुभ्र मनके


स्वप्न टूटे आस बिखरी जो सहेजी है बरस भर
आज इसका आकलन हम एक पल को और कर ले
पंख बिन चाहा भरे भुजपाश में अम्बर समूचा
आज तो परवाज़ की क्षमताओ पर कुछ गौर कर ले

जांच ले हम पात्रता अपनी, कसौटी पर परख कर
ताकि अब बिखरें नहीं संवरें नयन जो स्वप्न बन के

कामना झरती रही बिन भावनाओं की छुअन के
और घिरता रह गया था बांह  में कोहरा घना हो
इस बरस हर शब्द गूंजे होंठ की चढ़ बांसुरी पर
ये सुनिश्चित कर रखे वह प्रीतिमय रस से सना हो

सूर्य नूतन वर्ष का जो ला रहा सन्देश पढ़ ले
और पल सुरभित करे हम वर्ष को मधुमास कर के

Thursday, December 08, 2016

जीवन की विपदाएं ढूंढें

अच्छे है नवगीत गीत सब्
किन्तु आज मन कहता है सुन
नव विषयो को नए शब्द दे
और नई उपमाएं ढूंढें

दिशा पीर घन क्षितिज वेदना
पत्र लिए बिन चला डाकिया
खाली लिए पृष्ठ जीवन के
अवलंबों से परे हाशिया
कजरे सुरमे से आगे जाकर
दीपित संध्याये ढूंढें

विरह मिलन हो राजनीति
या भूख गगरीबी खोटे सिक
भ्रष्टाचार अभावो के पल
अफसरशाही चोर उचक्के
इनसे परे उपेक्षित हैं जो
जीवन की विपदाएं ढूंढें

मावस पूनम के आगे भी
जलती हैं लिख दे वे राते
और  धरा के मौसम वाले
विद्रोहों की भी बातें
सीमा की परिधि के बाहर
है कितनी सीमाएं ढूंढें