Monday, February 20, 2017

और एक दिन बीता

और एक दिन बीता 
कर्मक्षेत्र से नीड तलक बिखरे चिन्हों को चुनते हुए राह में 
बिखर रहे सपनों का हर अवशेष उठाते हुए बांह में 
संध्या के  तट  पर आ पाया हर घट था रीता 
और एक दिन बीता 

एक अधुरी परछाई में सुबह शाम आकार तलाश  करते
छिद्रित आशा के प्याले मे दोपहरी के शेष ओसकण भरते 
और कोशिशें करते समझाती रहती क्या   गीता 
और एक दिन बीता 

थकी हुई परवाजों की गठरी को अपनी जोड़े हुए सुधी से 
रहे ताकते पंथ अपेक्षा का जो  लौट होकर पूर्ण  विधी से 
और बने उपलब्धि संजोई आशा की परिणीता 
और एक दिन बीता

Monday, February 13, 2017

बस उड़ान में विघ्न न डालो



 तुमने मुझे पंख सौंपे है और कहा विस्तृत वितान है 
पंख पसारे मैं आतुर हूँ बस उड़ान  में विघ्न न डालो 

पुरबाई जब सहलाती है पंखों की फड़फड़ाहटों को
नई चेतना उस पल आकर सहज प्राण में है भर जाती  
आतुर होने लगता है मन,नव  उड़ान लेने को नभ में 
सूरज को बन एक चुनौती पर फैलाता है स्म्पाती

मैं तत्पर हूँ फैला अपने  डैने  नापूँ सभी दिशाएँ 
अगर खिंची  लक्ष्मण रेखाएं एक बार तुम तनिक  मिटा  लो 
 
नन्ही गौरेया की क्षमता कब उकाब से कम है होती 
संकल्पों की ही उड़ान तो नापा करती है वितान को 
उपक्रम ही तो अनुपातित है परिणामों की संगतियों से 
लघुता प्रभुताएं केवल बस इनसे ही तो नापी जाती 
 
एक किरण नन्हे दीपक की, तम को ललकारा करती है 
और मिटा देती है उसको, डाले पहरे अगर उठा लो 

साक्षी हो तुम अनुमोदन जब मिल जाता है विश्वासों को 
कुछ भी प्राप्ति असंभव तब तब शेष नहीं रहती जीवन में 
मनसा वाचा और कर्मणा सत्य परक  सहमति पा कर के
एक बीज से विस्तृत बेलें छा जाती पूरे उपवन में 

एक अकेली चिंगारी भी दावानल बन जाया करती 
फ़न फैलाये अवरोधों को अगर मार्ग से तनिक हटा लो
 
 
 

Tuesday, February 07, 2017

स्वप्न मांगे है नयन ने

चुन सभी अवशेष दिन के
अलगनी पर टांक के
स्वप्न मांगे है नयन ने
चंद घिरती रात से 

धुप दोपहरी चुरा कर ले गई थी साथ में
सांझ 
​थी 
प्यासी रही 
​ले 
 छागला 
​को 
हाथ में
भोर ने दी रिक्त झोली
​ ​
​ही 
 सजा पाथेय की
मिल न पाया अर्थ कोई भी सफर 
​की 
 बात में

चाल हम चलते रहे
ले साथ पासे मात के

आंजुरी में स्वाद वाली बूँद न आकर गिरी
बादलो के गाँव से ना आस कोई भी झरी
बूटियों ने रंग सारे मेंहदियों के पी लिए 
रह गई जैसे ठिठक कर हाथ की घड़ियाँ डरी

ओर दिन को तकलियो पर
रह गए हम कातते

Sunday, January 15, 2017

शिवम् सुन्द​रम ​ गाती है

कभी एक चिंगारी बन कर विद्रोहों की अगन जगाती
बन कर कभी मशाल समूचे वन उपवन केओ धधकाती है
सोये 
​चेतन ​
 को शब्दो 
​की 
दस्तक देकर रही उठाती
कलम हाथ में जब भी आती शिवम् सुन्द
​रम 
 
गाती है 

विलग उँगलियों के 
​स्पर्शों 
 ने विलग नए आयाम निखारे
हल्दीघाटी और उर्वशी, प्रिय प्रवास
​ ​
गीतम गोविन्दम
रामचरितमानस 
​सु
खसागर, ऋतु संहार से
​ मेघदूत तक ​
चरित सुदामा ओ 
​साकेतम 
वेदव्यास का अभिन
​ विवेचन 

एक और यह कलम सुनाती गाथा पूर्ण महाभारत की 
और दूसरी और संदेसे गीता बन कर लाती है

बन जाती है कभी तमन्ना सरफ़रोश की  आ अधरों पर
करती
​ है आव्हान कभी यह  रंग ​
दे कोई बसंती चोला
कभी 
​मांगती है आहुतियां जीवन के 
के अनवर
​त ​
 होम में
कभी  अनछुए आयामों को सन्मुख लाकर इसने खोला

मासि की अंगड़ाई ज्वालायें भर देती है रोम रोम में
बलिदानों के दीप मंगली,  संध्या भोर जलाती है

व्विद्यापति के छू भावो को करती है श्रृंगार रूप का
कालिदास के संदेशे को ले जाती है मेघदूत बन
अधर छुए जयदेव के तनिक और गीत गोविन्द कर दिए
निशा निमंत्रण मधुशाला बन इठलाई जब छूते बच्चन

दिनकर के आ निकट सिखाई रूप प्रेम की परिभाषाये
और दूसरी करवट लेकर यह हुंकार जगाती है 

Monday, January 09, 2017

और इक बरस बीता

और इक बरस बीता

करते हुए प्रतीक्षा अब की बार
जतन कर बोये
जितने वे अंकुर फूटेंगे
अंधियारे जो मारे हुए कुंडली
बन मेहमान रुके है
संभवतः रूठेंगे
आश्वासन की कटी पतंगों
की डोरी में उलझे 
अच्छे दिन आ जाएंगे
नऐ भोर के नए उजाले
नव सूरज की किरणें लेकर
तन मन चमकाएंगे
 
अँधियारा पर जीता

नयनो की अंगनाई सूनी रही
क्षितिज की देहरी पर ही
अटके सारे सपने
लगे योजनाओ के विस्तृत
मीलो तक बिखरे पैमाने
बालिश्तों से नपने 
​ति​
हासो के पृष्ठ झाड़ कर
जमी धूल की परते
फिर से आगे आये
और नए की अगवानी में
घिसे पिटे से
​ ​
​चंद
गीत
फिर से दुहराये

 रही प्रतीक्षित सीता


आशाओ के इंद्रधनुष की
रही प्रतीक्षा, कोई आकार
प्रत्यंचा को ताने
आवाहन के मंत्रो का
उच्चार करे फिर
तीर कोई संधाने
सहज साध्य में हर असाध्य को
एक परस से निज
परिवर्तित कर दे
​पर्वत
सी हर इक बाधा को
बिन प्रयास ही
धराशायी जो कर दे

रही अनकही गीता 

Sunday, January 01, 2017

वर्ष नया मंगलमय कहने


Monday, December 26, 2016

पा तेरा सान्निध्य रुत होती सुहागन

बादलों के पृष्ठ पर पिघले सितारे शब्द बन कर 
चांदनी की स्याही में ढल लिख रहे हैं नाम तेरा 
धुप की किरणें तेरी कुछ सुरभिमय सांसें उठाये 
खींचती हैं कूचियां बन कर क्षितिज पर नव सवेरा

प्राण सलिल पा तेरा सान्निध्य रुत होती सुहागन
ओर संध्या की गली सुरमाई, होती आसमानी

शोर में डूबी नगर की चार राहो का मिलन स्थल
मधुबनी होता तेरे बस नाम का ही स्पर्श पाकर
और ढलते हैं सभी स्वर गूँज में शहनाइयों की
जब छलकती है तेरी इस चुनरी की छाँह गागर

शुभ्रगाते देह तेरी से झरी आभाये लेकर
सज रही है ज्योत्सनाओं की छटा में रातरानी

कुम्भ में साहित्य के तो  रोज ही कविता नहाती
एक तेरे नाम की डुबकी महज होती फलित है
गीत औ नवगीत चाहे जोड़ ले कितना, घटा ले
व्यर्थ होता बिन तेरे इक स्पर्श के सारा गणित है 

रच रहा हो काव्य कितने भाष्य कितने ये समय पर 
बिन तेरे सान्निध्य के सब रह गए बन लंतरानी 

पत्रिका में  फेसबुक पर  व्व्हाट्सएप पर गीत गज़लें 
रोज ही बहते रहे हैं एक हो अविराम निर्झर  
नाम तेरे के बिना बधते नयन की डोर से कब  
व्यर्थ  हो  जाते  रहे है बस नदी की धार हो कर

साक्ष्य बन कर सामने इतिहास फिर से कह रहा है
बिन तेरे ही नाम के कब पूर्ण होती है कहानी