2012


हों दिवस आपके स्वर्ण पत्रों मढ़े और रजनी को रंगती रहे चाँदनी

आपके पंथ को सींचती नित रहे करते छिडकाव आकर घटा सावनी

भोर सारंगियों की धुनों में सजे,सांझ तुलसी के चौरे जला दीप हो

आपके द्वार पर सरगमों को लिए हर घड़ी मुस्कुराती रहे रागिनी



टूट कर आस के फूल पिछले बरस,जो बिखर रह गए फिर से जीवंत हों

आस्था फिर नई दुल्हनों सी सजे,आपके स्वप्न फिर अनलिखे ग्रन्थ हों

ताकते उँगलियों का इशारा रहें आपकी, नभ के नक्षत्र तारे सभी

हर घड़ी आके चूमे सुयश आपको,कीर्ति से आपकी लोक जयवंत हों



स्वप्न फ़िर भी आँज लें हम

दस्तकें देने लगा है द्वार पर नववर्ष साथी

बीज गमलों में लगायें आओ फ़िर से कामना के

जानते परिणति रहेगी,दोपहर में ओस जैसी

स्वप्न फ़िर भी आँज लें हम आँख में संभावना के



आज फ़िर से मैं कहूँ हों स्वप्न सब शिल्पित तुम्हारे

इस बरस खुल जायें सब उपलब्धियों के राज द्वारे

रुत रहे नित खिड़कियों पर धूप की अठखेलियों की

सांझ अवधी हो उगे हर भोर ज्यों गंगा किनारे

दस्तकें दें द्वार पर आ वाक्य नव प्रस्तावना के



घिस गई सुईयां यही बस बात रह रह कर बजाते

थाल में पूजाओं के, टूटे हुये अक्षत सजाते

रंगहीना हो चुकी जो रोलियां, अवशेष उनके

फ़िर भुलावे के लिये ला भाल पर अपने लगाते

मौन हैं घुंघरू, गई थक एक इस नृत्यांगना के



इसलिये इस बार आशा है कहो तुम ही सभी वह

जो कि चाहत के पटल पर चढ़ न पाया, है गया रह

जो अपेक्षित था अभी भी है नहीं आगे रहे जो

वर्ष का नव रूप जिसको जाये कर इस बार तो तय

प्राप्तिफ़ल लिख दो समय के शैल पर आराधना के


३१ दिसम्बर २०११

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एक पत्थर को हम पोत सिन्दूर से

जोकि बस में नहीं था किसी के कहीं
आस बस इक उसी की लगाते रहे
 
 
बुझ गई आखिरी दीप की वर्त्तिका
रोशनी लड़खड़ाते हुए गिर पड़ी
रात के गर्भगृह में रही बन्दिनी
भोर के हाथ में थी लगी हथकड़ी
स्वर प्रभाती के सब मौन हो रह गये
आरती की नहीं घंटियाँ बज सकीं
दिन चढ़े देर तक सोई थी नीड़ में
एक चिड़िया गई सांझ से थी थकी
 
 
और हम सरगमों पर सजा, रात भर
का है मेहमाँ अंधेरा ये गाते रहे
 
 
थी टिकी उत्तरी ध्रुव के अक्षांश पर
रात की चादरें थीं बहुत ही बड़ी
संशयों में घिरी दूर के मोड़ से
ताकती रह गई धूप सहमी बड़ी
द्वार पर आगमन के पड़ी आगलें
जो कि क्षमताओं की रेख से थीं अधिक
और था सामने हंस ठठाता रहा
खिल्लियाँ सी उड़ाते दिवस का बधिक
 
 
अपने विश्वास की चिन्दियाँ देखते
हम हवा की मनौती मनाते रहे
 
 
कोई आ पायेगा धुन्ध को चीर कर
जानते थे नहीं शेष संभावना
किन्तु फिर भी कहीं आस की ले किरन
हम छुपाते रहे पास का आईना
इक अविश्वास पर फिर मुलम्मा चढ़ा
मूर्तियों को नमन नित्य करते हुए
जो कि अनभिज्ञ अपने स्वयं से रहे
उन नक्षत्रों की गतियों से डरते हुए
 
 
एक पत्थर को हम पोत सिन्दूर में
भोर संध्या में मस्तक नवाते रहे

खुद ना प्रश्न चिह्न बन जायें


कुछ प्रश्नों क्रे उत्तर मैने दिये नही बस इस कारण से
मेरे उत्तर नव प्रश्नो का कारण कहीं नहीं बन जायें

घड़ी प्रहर पल सभी रहे हैं प्रश्नों के घेरे में बन्दी
घटते बढ़ते गिरते उठते साये तक भी प्रश्न उठाते
गति में रुके हुए या मुड़ते पथ की हर सहमी करवट पर
हर पग की अगवानी करते प्रश्न चिह्न ही बस टँग जाते

गायन वादन रुदन हँसी के स्वर सब प्रश्नों के अनुचर हैं
चाहे जितनी बार छेड़ कर देखें स्वर की नय़ी विधायें

ऐसा भी तो नहीं प्रश्न के उत्तर ज्ञात नहीं हौं मुझको
लेकिन मेरे उत्तर भी तो करते रहे प्रश्न ही आकर
जब भी करी व्याख्या कोई, झुकी कमर को दिये सहारा
खड़े हो गये सन्मुख मेरे प्रश्नचिह्न आकर अकुलाकर

झुकी हुई नजरें बिछ जाती हैं हर एक दिशा में पथ की
इनसे दामन साफ़ बचाकरे कहो किस तरफ़ कदम बढ़ायें

प्रश्न प्रश्न ही रहते चाहे उत्तर का आवरण ओढ़ लें
उत्तर भी समझाया जाये अगर, नहीं हो पाता उत्तर
क्यों,कब,कहाँ,किसलिये,किसने,कैसे क्या जब शब्द उठे तो
मौन कंठ रहना चाहा है पल में पूर्ण समर्पण कर कर

प्रश्नों के उत्तर,उत्तर के प्रश्न और फिर उनके उत्तर
इनके रचे  व्यूह में घिर हम खुद  ना प्रश्न चिह्न बन जायें

चित्र बन रह जायें जब इतिहास

बोझ से लगने लगें सम्बन्ध के धागे जुड़े जब
आस हो कर के उपेक्षित द्वार से खाली मुड़े जब
कैद में बन्दी अपेक्षा की रहें सद्भावनायें
स्वार्थ के पाखी बना कर झुंड अम्बर में उड़ें जब
 
 
तब सुनिश्चित संस्कृतियों की हमारी वह धरोहर
जो विरासत में मिली थी, खर्च सारी हो गई है
 
 
छू न पायें याद की दहलीज को जब वे कहानी
मुद्रिकायें भी रहा करती रहीं जिनमें निशानी
अनकहे सन्देश लेकर थीं बहा करती हवायें
पास आ अनुभूतियों के रुत हुआ करती सुहानी
 
 
जान लेना तब मुलम्मों से भरी यह चन्द्रिका सी
पूर्णिमा के शब्द को भी अर्थ नूतन दे गई है
 
 
चित्र बन रह जायें जब इतिहास के सब स्वर्ण पन्ने
अर्थ की अनुभूतियों से ध्यान लग जाये बिछड़ने
मूल्य की भारी कसौटी हो परखती भावना को
सावनों को देख पत्ते वृक्ष से लग जायें झड़ने
 
 
सौंप जो मिट्टी गई थी होंठ को भाषायें कोमल
आज अपनी अस्मिता खोकर अनामिक हो गई है
 
 
शब्द कोशों से उधारी माँगती हो बात अपने
अर्थ को,हर व्याख्याके के पृष्ठ लगती हो पलटने
उलझनों के चक्रच्यूहों में घिरी संवेदना के
देख कर अपनी दशायें अश्रु ही रह पायें झरने
 
 
जान लेना तब हमारी उम्र की उपलब्धियों को
आज की पीढ़ी उठा ले ताक पर जा धर गई है

सुरभित इस मन का वृन्दावन


काजल की कजराई में जब डूबे कलम कल्पनाओं की
हस्ताक्षर उस घड़ी उर्वशी कर देती है मुस्कानों में
अलकों में आ गुँथ जाते हैं मेघदूत वाले सन्देसे
वाणी सरगम बन जाती है वंसी से उठती तानों में
 
शतरूपे !-तुम दूर सदा ही हो भाषा की सीमाओं से
कर देता है निमिष ध्यान का, सुरभित इस मन का वृन्दावन
 
युग के महाकाव्य अनगिनती, अंकित आकाशी अक्षों में
दृष्टि किरण से अनुबन्धित हो, सृष्टि प्रलय पलकों में बन्दी
चितवन में चित्रित सम्मोहन के सब मंत्र मेनका वाले
सांसों के कोमल स्पर्शों से, मलय वनों को मिले सुगन्धी
 
कलासाध्य हर एक कला की तुम ही केवल एक उपासित
चित्रकारिता हो नर्तन हो, हो गायन हो अथवा वादन
 
काल-सन्धि पर बने हुये हैं शिल्प एक तुमको ही अर्पित
मीनाक्षी कोणार्क अलोरा, ताजमहल, सांची खजुराहो
रंग कूचियों की अभिलाषा खींचें चित्र तुम्हारे ही बस
शिलाखंद की यही कामना, मूर्ति तुम्हारी में ढलता हो
 
मृगनयने !हर काव्य कहानी और लेख का लख्श्य तुम्हीं बस
शब्द शब्द पर भाव भाव पर रहा तुम्हारा ही आच्छादन

पढ़ कर सुनाये गुनगुनाते

पृष्ठ पर किसने हवा के याद के कुछ गीत लिख कर
पांखुरी से कह दिया पढ़ कर सुनाये गुनगुनाते
 
जलतरंगों से सिहरती धार की अवलोड़ना में
हो रही तट की प्रकम्पित सुप्त सी अवचेतना में
झाड़ियों पर टँक रही कंदील में जुगनू जलाकर
सांझ को ओढ़े प्रतीची के अधर पर स्मित जगा कर
 
कौन है जिसने उड़ाकर बादलों की चादरों को
बून्द को सन्देश भेजा द्वार पर अपने बुलाते
 
दोपहर में ओक-मेपल के तले इक लम्ब खींचे
कौन पल भर के लिये आकर रुका है आँख मींचे
फ़ेंकता है कौन पासे धूप से बाजी लगाकर
रंग भरता है धुंधलके में अजाने कसमसाकर
 
डालता है कौन मन की झील में फ़िर कोई कंकर
तोड़ता है इन्द्रजाली स्तंभनों को हड़बड़ाते
 
एक पल लगता उसे शायद सभी पहचानते हैं
और है मनमीत यह भी बात सब ही जानते हैं
किन्तु दूजे पल बिखरते राई के दानों सरीखा
छूट जाता हाथ से पहचान पाने का तरीका
 
प्रश्न यह अनबूझ कब से सामने लटका खड़ा है
और हल कर पायें रहतीं कोशिशें बस छटपटाते

तीन देवों का आशीष तीनों दशक

तीन देवों का आशीष तीनों दशक
हर दिवस था सुधा से भरा इक चषक
हर निशा स्वप्न के पुष्प की क्यारियाँ
भोर निर्झर घने रश्मियों के अथक
 
आज इस मोड़ पर याद आने लगे
और पल झूम कर गुनगुनाने लगे
 
दीप के साथ जलती अगरबत्तियां
धूप,तुलसी प्रसादी कलश नीर के
क्षीर का सिन्धु,गोकुल दधी के कलश
पात्र छलके हुए पूनमी खीर के
चन्दनी शीत मं घुल हिनाई महक
केवड़ों में भिगोते हुए वेणियाँ
कामनाओं की महकी हुई रागिनी
मंत्र पूरित स्वरों की पकड़ उंगलियाँ
 
आज जैसे विगत छोड़ आये निकट
और फिर बांसुरी सी बजाने लगे
 
दोपहर ला खिलाती रही पंथ में
फूल गमलों में बो सुरमई सांझ के
सांझ ने ओढ़नी पर निशा की रखे
चिह्न दीपित हुये एक विश्वास के
मानसी भावना ताजमहक्ली हुई
धार रंगती रही नित्य परछाईयाँ
सांस की रागिनी प्रीत की तान पर
छेड़ती थी धुनें लेके शहनाईयां
 
दृश्य वे सब लिये हाथ में कूचियाँ
चित्र फिर कुछ नये आ बनाने लगे
 
एक आवारगी को दिशा सौंप कर
वाटिकायें डगर में संवरती रहीं
ध्येय की फूलमालाओं को गूँथती
भोर अंगनाई में आ विचरती रही
पल के अहसास की अजनबी डोर ने
नाम अपने लिये इक स्वयं चुन लिया
थे बिखरते रहे झालरी से फिसल
भाव ,मन ने उन्हें सूत्र में बुन लिया
 
दृष्टि के दायरे और विस्तृत हुये
व्योम के पार जा झिलमिलाने लगे
 
वीथियाँ पग जिन्हें चूमते आ रहे
कुछ परे गंध से,कुछ रहीं मलयजी
कुछ विजन की दुशाला लपेटे हुये
और कुछ थीं रहीं वाटिका सी सजी
पल कभी साथ में होके बोझिल रहे
वक्त जिनमें रहा होके फ़ौलाद सा
और कुछ थे पखेरू बने उड़ गये
एक भी हाथ अपने नहीं आ सका
 
देख कर सारिणी में अपेक्षा सजी
प्राप्ति के पल सभी मुस्कुराने लगे
 
सांझ के रथ चढ़ा नीड़ जाता हुआ
कह रहा है दिवाकर सजाओ सपन
जो चला पोटली को उठा कर विगत
सौंप दो तुम उसे संचयित सब थकन
शब्द जो थे जगे अग्नि के साथ में
आहुती दे उन्हें प्रज्ज्वलित फ़िर करो
शेष जो आगतों के परस में छिपा
साथ भुजपाश में उसको मिल के भरो
 
प्रीत के भाव उल्लास से भर गये
नूपुरों की तरह झनझनाने लगे

लिखा था तुमने खत में.

आये वे पल याद
अचनक बहुत दिनों के बाद
चले थे चार कदम तुम साथ
एक अनजाने पथ में

सपनों के प्याले फिर से लग गये छलकने
आशाओं के पंछी लगे गगन में उड़ने
महक भर गई नये दिवस की आ सांसों में
रजनीगंधा दोपहरी में लगी महकने

होंठ पर आया था जब नाम
हँसी थी यमुना तट पर शाम
थिरकने लगे नृत्य में पांव
उस घड़ी वंशीवट में

सौगंधों की रेशम डोरी फिर लहत्राई
पीपल पत्रों ने सारंगी नई बजाई
मंदिर की चौखट पर संवरीं वन्दन्वारें
अम्बर ने थी पिघली हुई विभा बरसाई

लगे थे बजने मधुरिम गीत
उमड़ती थी हर पग में प्रीत
गये हैं एकाकी पल बीत
लिखा था तुमने खत में.

समय चक्र की फिर परिवर्तित गति आवारा
जो धो गई ह्रदय का सजा हुआ चौबारा
बहती हुई हवा ने मिलन बांसुरी पर जब
डूबा हुआ विरह में ही हर राग संवारा

अटक कर रही नजर उस मोड़
गया था मन को कोई झिंझोड़
चले तुम गए मुझे थे छोड़
चढ़े फूलों के रथ में

पत्थरों के देवता पे कुछ असर हुआ नहीं

अर्चना के दीप नित्य अनगिनत जलाए थे
प्रार्थना के गीत  भोर सांझ   गुनगुनाये थे
शीश टेकते रहे थे चौखटों पे भोर सांझ
भक्ति में डुबो के फूल पांव पर चढ़ाए थे
पत्थरों के देवता पे कुछ असर हुआ नहीं
हम जहां थे बस वहीं अड़े हुए ही रह गए

अंत हो सका नहीं है रक्तबीज आस का
छिन्न हो गया अभेद्य जो कवच था पास का
वक्त हो पुरंदरी खडा हुआ आ द्वार पर
कुण्डलों को साध के वो ले गया उतार कर
लेन देन का हिसाब इस तरह हुआ कि हम
दान तो दिये परन्तु हो ऋणी ही रह गये

ढूँढ़ते जिसे रहे हथेलियों की रेख में
वो छुपा हुआ रहा सदा ही छद्म वेश में
हम नजर के आवरण को तोड़ पर सके नहीं
अपने खींचे दायरों को छोड़ पर सके नहीं
दिवासपन मरीचिकाओं से बने थे सामने
एक बार फिर उलझ के हम वहीं ही रह गए

प्रश्न थे हजार पर न उत्तरों की माल थी
ज़िंदगी से जो मिली, वो इस तरह किताब थी
हल किये सवाल किन्तु ये पता नहीं चला
कौन सा सही रहा, है कौन सा गलत रहा
जांचकर्ता मौन ओढ़ कर अजाने ही रहे
अर्थ कोशिशों के घोष्य बिन हुए ही रह गए

नव वर्ष २०२४

नववर्ष 2024  दो हज़ार चौबीस वर्ष की नई भोर का स्वागत करने खोल रही है निशा खिड़कियाँ प्राची की अब धीरे धीरे  अगवानी का थाल सजाकर चंदन डीप जला...