2012


हों दिवस आपके स्वर्ण पत्रों मढ़े और रजनी को रंगती रहे चाँदनी

आपके पंथ को सींचती नित रहे करते छिडकाव आकर घटा सावनी

भोर सारंगियों की धुनों में सजे,सांझ तुलसी के चौरे जला दीप हो

आपके द्वार पर सरगमों को लिए हर घड़ी मुस्कुराती रहे रागिनी



टूट कर आस के फूल पिछले बरस,जो बिखर रह गए फिर से जीवंत हों

आस्था फिर नई दुल्हनों सी सजे,आपके स्वप्न फिर अनलिखे ग्रन्थ हों

ताकते उँगलियों का इशारा रहें आपकी, नभ के नक्षत्र तारे सभी

हर घड़ी आके चूमे सुयश आपको,कीर्ति से आपकी लोक जयवंत हों



3 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

आपको भी ऐसी ही सुखद शुभकामनायें।

Udan Tashtari said...

जिन्दाबाद...नव वर्ष शुभ हो! मंगलकामनाएँ....

Shardula said...

Sadar pranam! Bahut sunder likha hai!

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...