संभव नहीं मुझे शतरूपे

संभव नहीं मुझे शतरूपे करुँ विवेचन संदेशों का
बिना शब्द के लिखे हुए हैं जो कि नयन पृष्ठों पे तुमने
 
शब्दों की अक्षमताओं का भान तुम्हें है, ज्ञात मुझे है 
इसीलिए ही मनभावों को व्यक्त किया रच नव भाषायें 
अपनी हर अनुभूति रंगी है मूक नयन के संप्रेषण में
करती है जीवंत हृदय के पाटल पर अंकित गाथायें
 
परकोटे की खिंची हुई हर इक रेखा को धूमिल कर के
वक्षस्थल पर लिखा समय के हस्ताक्षर कर कर कर तुमने 
 
हुए सहज आलोकित जितने भी अभिप्राय मौन स्वर के थे
अनायास हो गया भावनाओं का फ़िर समवेत प्रकाशन 
ज्ञात तुम्हें है, ज्ञात मुझे है, उन अबोल अनमोल क्षणों में
कितनी बार टूट कर बिखरा ओढ़ा हुआ एक अनुशासन 
 
कहने की है नहीं तनिक भी आवश्यकताएं पर फ़िर भी
कहता हूँ फ़िर से लिख डाला मन पट पर नव आखर तुमने
 
भाव अंकुरित मीरा वाले दो पल, फ़िर दो पल राधा के 
किन्तु अपेक्षित मुरली वादन मैं असमर्थ रहा करने में 
मैं अविराम निरंतर गतिमय, ठिठका नहीं पंथ में तो फ़िर
कला साधिके ! साथ चली तुम  बन कर धाराएं झरने में
 
इसी एक पल की परिणति है मैं जिसको स्वीकार कर रहा
अपने नाम लिख लिए मेरे सारे ही निशि-वासर तुमने 

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

आह, सुखद अनुभूति,
सिन्धु हैं मीरा, राधा।

सूर्य फिर करने लगा है

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