एक आवाज़ कुछ गुनगुनाती रही


ढल रही शाम की वीथियों में कहीं
एक आवाज़ कुछ गुनगुनाती रही
पत्र पर बादलों की पड़ी छाँव सी
आपकी याद ले सरसराती रही
 
धूप अपना दुपट्टा गई छोड़ कर
जब प्रतीची के घर को चढ़ी पालकी
धार नदिया की बस देखती रह गई
धूप-रोली बिखरते हुये थाल की
बातियाँ दीप की लग पड़ीं जागने
नींद से, आंख अपनी मसलते  हुये
एक पल के लिये सब ठिठक रुक गये
जितने भी बिम्ब थे राह चलते हुये
 
आरती के दिये में सजी ज्योत्सना
बस अकेली वहाँ झिलमिलाती रही
 
रात ने डोरियां चन्द लटकाईं तो
घुप अँधेरा सहज ही उतरने लगा
काजरी आँख को श्याम करते हुए
रेख में एक, काजल संवरता रहा
स्वप्न को इसलिये एक टीका लगा
ताकि उसको कहीं न नजर लग सके
और चुपचाप ही याद को ओढ़कर
मन की एकाकियत में उतर भर सके
 
राह की शून्यता पास आके नयन
झट से छूते हुये दूर जाती रही
 
उंगलियों से हिनायें बिखर व्योम में
लिख गईं नाम बस एक ही,चित्र सा
अंक अपने दिशाओं ने वह भर लिया
कौन जाने उन्हें कैसा विश्वास था
छेड़ती रागिनी इक रही जाह्नवी
नभ में, अपनी तरंगे उठाते हुये
और भरती रही गंध से पांखुरी
नीर अपना छलक कर गिराते हुये

कोई सन्देश ले भोर आ जायेगी
दृष्टि पथ में नयन थी बिछाती रही

2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

आशाओं का विश्वास दिन रात सुगढ़ होता रहे...

ATAMPRAKASHKUMAR said...

"एक आवाज़ गुनगुनाती है " आप की यह पंक्ति
पत्र पर बादलों की पड़ी छाँव सी
आप की याद ले सरसराती है |बहुत ही खूबसूरत बन पड़ी है |आप को साधुवाद |आप मेरे ब्लॉग http//kumar2291937.blogspot.com पर सादर आमंत्रित हैं |आप की प्रतिक्रिया से मुझे मार्गदर्शन मिलेगा |आशा है आप अवश्य अपनी राय देंगे |धन्यवाद्

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