बस यूँ ही

रंग में गेरुओं के रँगे चौक ने चूम जब दो लिए पग अलक्तक रँगे
देहरी को सुनाने लगे राग वह, पायलों की बजी रुनाझुनों में पगे
खिड़कियों से रहा झाँकता चन्द्रमा, घूंघटों की सुनहरी किनारी पकड़
प्रीत का एक मौसम घिरा झूमता, रह गए हैं सभी बस ठगे के ठगे

देहरी शीश टीके लगाती रही

अपने अस्तित्व की पूर्णता के लिये
प्राण की ज्योत्स्ना छटपटाती रही

ओस की बून्द सी दो पहर धूप में
मन के आंगन में उगती हुई प्यास थी
रोज दीपित हुई भोर के साथ में
अर्थ के बिन भटकती हुई रात थी
चाह की चाह थी जान पाये कभी
चाहना है उसे एक किस चाह की
पांव ठिठके रहे बढ़ न पाये तनिक
गुत्थियों में उलझ रह गई राह थी

एक खाका मिले, रंग जिसमें भरे
तूलिका हाथ में कसमसाती रही

चिन्ह संकल्प के धुंध में मिल गये
सारे निर्णय हवायें उड़ा ले गईं
वक्त बाजीगरी का पिटारा बना
दॄष्टियां आईनों में उलझ रह गईं
दिन का पाखी उड़ा तो मुड़ा ही नहीं
रात बैठी रही आकलन के लिये
पॄष्ठ सारे बिना ही लिखे रह गये
शब्द से सिर्फ़ रंगते रहे हाशिये

ज़िन्दगी बनके पुस्तक बिना ज़िल्द की
भूमिका पर अटक फ़ड़फ़ड़ाती रही

देहरी शीश टीके लगाती रही

और अंगनाई की रज बिछौना बनी
स्वस्ति के मंत्र का जाप करती रहीं
हाथ की उंगलियां रोलियों में सनी
पत्थरों से विनय, फूल की पांखुरी
करके अस्तित्व को होम, करती रही
आँख की झील से पर फ़िसलती हुई
आस पिघली हुई रोज झरती रही

आस्था कंठ को चूम वाणी बनी
आई अधरों पे, आ कँपकँपती रही

संभव है सपना सच हो ले

पानी का बुलबुला बनाती, सारे स्वप्न भोर की थपकी
क्या संभव इस बार आंख का कोई तो सपना सच हो ले

पल्लव सभी उड़ा ले जाती बहती हुई हवा पल भर में
तट की सभी संपदा लहरें ले जातीं समेट कर, कर में
चक्रवात के पथ में बचते चिन्ह शेष न निर्माणों के
प्रत्यंचा से बन पाते हैं कब संबंध घने वाणों के

ये सच है. हाँ पर ये भी तो सच है थके हुए पाखी को
है उपलब्ध गग की पूरी सीमा, यदि अपने पर तोले

सीमा नहीं हुआ करती है, यों चाहत के विस्तारों की
रह जाती है एक कहानी बनकर अक्सर अखबारों की
सागर की हर इक सीपी में मोती नहीं मिला करता है
उपवन का हर इक पौधा तो चन्दन नहीं हुआ करता है

लेकिन फिर भी बून्द एक जो छिटकी हुइ किसी ज्योति की
आशान्वित होती है संभव है वह किरण नवेली होले

महका करते हैं गुलदस्ते, अभिलाषा के सांझ सकारे
आकांक्षाओं की चूनरिया लहराती है मन के द्वारे
सतरंगे अबीर सी झिलमिल झिलमिल होती मधुर कल्पना
अगली बार निराशा का हो शायद कोई भी विकल्प ना

कागज़ पर खींची जाती है जो रेखायें बना योजना
संभव है वह उतर पॄष्ठ से सचमुच ही कोई घर हो ले

और यह रही २००वीं पोस्ट

आज २०० वीं पोस्ट देते समय एक सुखद अनुभव हो रहा है. इस सफर में आप सबका स्नेह मिला, बेहतरीन साथी मिले. सभी का आभार. ऐसे ही स्नेह बनाये रखिये और गीतों की यह महफिल यूँ ही सदा सजती रहेगी.

एक बार पुनः आभार.

medal

आज फिर महका किसी की याद का चंदन

आज फिर महका किसी की याद का चन्दन सुलग कर
आज फिर बदली नयन में एक सावन बो गई है

आज फिर ज्योतित हुए वे दीप कल जो बुझ गये थे
पीर के वह बंध फिर से खुल गये जो बँध गये थे
फिर बहारों से मिले हैं फूल सूखे पुस्तकों के
फिर हुए गतिमान पल, पीपल तले जो थम गये थे

फिर लगा है लौट आई है पलों की पालकी वह
आज तक लौटी नहीं, इस राह पर से जो गई है

चेतना, अवचेतना के शब्द धूमिल, हो उजागर
भावना के सिन्धु तट पर भर रहे हैं भाव-गागर
चित्र पलकों के दरीचों में विगत की आ संवरकर
रँग रहे हैं मन वितानों को नई कूची सजा कर

चल रही कोमल पगों से जो हवा, के हाथ थामे
आज सुधि भी लग रहा है पंथ में ही सो गई है

आस पगली घूमती है, मुट्ठियों में स्वप्न बांधे
पर्वतों से भी कहीं ऊँचे किए अपने इरादे
किंतु है अदृश्य हाथों में थिरकती तकलियों सी
वह अजानी कौन उस पर किस तरह का सूत काते

चाव के रंगों बनाई आंगनों की बूटियों के
एक हल्की सी नमी आ रंग सारे धो गई है

कामना की क्यारियों में गंध के पौधे उगाती
शब्द होठों के लरजते छंद में बुनती सजाती
चित्र खींचे हैं क्षितिज पर एकरंगी भावना के
पांखुरी लेकर अपेक्षायें सहज पथ पर बिछाती

पर प्रतीक्षा की विरासत में मिली हैं जो धरोहर
आज लगता उम्र उसकी और लम्बी हो गई है

क्या तुम ही हो

किसकी देहरी छू कर आईं हैं ये चन्दन गंध हवायें
कोई तो हो जो आकर यह बात मुझे बतलाता जाये
कौन प्रणेता है शब्दों का जो अधरों पर मचल रहे हैं
कोई आकर सुर दे दे तो कंठ इन्हें फिर गाता जाये

क्या यह गंध तुम्हारी है प्रिय
क्या यह शब्द रूप का विवरण
क्या तुम ही हो गूँथ गूँथ कर
गजरे, संध्या करती चित्रण
क्या तुम हो जिसकी अंगड़ाई
की देहरी से चली हवायें
क्या तुम ही हो? जिसके कुन्तल
बिखरे तो घिर गईंघटायें

क्या तुम ही हो मुझे बता दो जिसके पग नख के चुम्बन से
नदिया की धारा बन झरना इठलाता बलखाता जाये

कहो तुम्हआरा चित्र नहीं क्या ?
जिसे तूलिका बना रही है
और नहीं क्या राग तुम्हारा
जिसे बांसुरी बजा रही है
कहो निशा के नयन देखते
केवल सपने नहीं तुम्हारे
कहो भोर के निमिष ताकते
नहीं तुम्हारे सिर्फ़ इशारे

कह दो हाँ यह तुम ही तो हो, आ अनंग जिसकी अंगनाई में,
पथ के हर इक कण कण पर अपनी सुधा लुटाता जाये

हां तुम ही हो मनविलासिनी
चित्रकार की मधुर कल्पना
हाँ तुम फ़ागुन-भित्तिचित्र हो
तुम्हीं कार्तिकी सुरच अल्पना
तुम हिमांत की धूप, तुम्ही हो
शरद-चन्द्र की मधुर चन्द्रिका
तुम्ही ज्योति की पंथ प्रदर्शक
तुम्ही दीप की प्राण वर्त्तिका

हाँ तुम ही तो हो पा जिसका एक निमिष सामीप्य मगन हो
पतझड़ भी, पतझड़ में उपवन का हर फूल खिलाता जाये

मानचित्रों ने सूरज को पथ न दिया

हर दिशा तीर संधान करके खड़ी
बढ़ रही है हवा तेग ले हाथ में
बादलों से बरसती हुई बरछियां,
मैं अकेला, महा ज़िन्दगी का समर

कोशिशें सिन्धु तट के घरोंदे बनी
और उपलब्धियां स्वप्न मरुपंथ के
कल्पना से भरे गल्प निकले सभी
सत्य जिनको बताते रहे ग्रंथ थे
रात आई तो डेरा जमाये रही
मानचित्रों ने सूरज को पथ न दिया
जन्म से हिचकियां ले बिलखता रहा
जो था जन्मा, अंधेरे से लड़ने, दिया

एक जुगनू मुझे धैर्य देता रहा
और लंबा नहीं है अधिक ये सफ़र

लड़खड़ाते हुए पांव अक्षम हुए
और ज्यादा तनिक बोझ ढो पायें वो
डगमगाती नजर लौट थकते हुए
कह रही नीड़ का आसरा जल्द हो
चुक गईं बूंद संकल्प के नीर की
सूखे पत्ते से निर्णय हिले जा रहे
सामने कोई शायद विवर श्याम है
लौट कर स्वर तलक भी नहीं आ रहे

शून्य खोले हुए मूँह खड़ा सामने
है उधर भीत इक और खाई इधर

बीज बोते रहे कंठ में स्वर उगे
किन्तु हर बार उगती रही प्यास ही
और अनबूझ सी उलझनों से भरी
एक कलसी निराशाओं की साथ थी
खंज़रों पे टिकी वक्त की चौघड़ी
सांस रोके हुए स्तब्ध बैठी रही
और हत हो गई आस की धज्जियाँ
एक ही दायरे में बिखरती रही.

राह होकर समर्पित खड़ी राह में
युद्ध के अंत का पर बजे न बजर/

साथ नहीं देती परछाईं

जलते हुए दीप को आकर घेरा करते शलभ हमेशा
अँधियारे में साथ न देती पल भर अपनी भी परछाईं

माली बो कर गया बीज तो वापिस नहीं इधर फिर लौटा
और न कोई करने आया कभी निराई कभी गुड़ाई
आग बरसती रही जेठ में, बन कर बाढ़ बहाता सावन
सुख की छांह लिये आँचल में, कोइ बदली इधर न आई

खुली किताबों ने विप्लव के ही विवरण हर बार बताये
लेकिन प्रेम कथाओं वाली बातें कभी नहीं बतलाईं

फूल उगाये थे, काँटे पर, निहित स्वार्थ के उगते आये
धीरज के वटवॄक्षों से आ लिपट गईं विष भरी लतायें
पुरबाई का कोई झोंका आया नहीं इधर सहलाने
रहीं अधूरी हर मौसम में जो अधरों पर सजीं कथायें

व्यर्थ ढूँढ़ते मुस्कानों को आँसू की नगरी में जाकर
कब बहार का झोंका आकर रुकता पतझर की अँगनाई

अँगड़ाई कलियों ने ली तो चंचरीक की लगी कतारें
बनने लगे नीड़ पाखी के जब बौरों ने आँखें खोली
टेर पपीहों की के संग में गाने लगे कोयलें बुलबुल
जिस बागीचे में थी गूँजी नहीं काक की भी कल बोली

चढ़ते हुए दिवस के यौवन का ही साथ निभाता सूरज
ढली सांझ में उसकी सूरत एक बार भी न दिख पाई

कैसे मैं दूं अब धन्यवाद


संदर्भ: http://udantashtari.blogspot.com/2008/05/blog-post_18.html

आप सभी का धन्यवाद, मैं सोच रहा कैसे दे पाऊँ
जो जल जल कर बुझ जाती उस दीपशिखा सा था एकाकी
किन्तु आपने बरसाई जो स्नेह सुधा मेरे आँगन में
उससे इस रीते प्याले को भर देती सुधियों की साकी

शब्दों की इस यात्रा में हम जो चले साथ हो सहराही
तब ही मैं नूतन शैली में आयाम विचारा करता हूँ
क्रन्दन का आंसू से नाता, छन्दों का गीतों से रिश्ता
कोसों हों मुझसे दूर आप, मैं लेकिन निकट समझता हूँ

यह कलम कभी चलते चलते रुकने को होती थी आतुर
पर मिला आपका स्नेह मुझे, वह तोड़ेगा हर सूनापन
जो धवल चाँदनी के टुकड़े भेजे हैं शब्दों में रँगकर
उनसे मैं चित्रित कर लूंगा, अपने विश्वासों का आँगन



दो मुक्तक

भाव की न तो गोदावरी ही बही, न बही नर्मदा न बही ताप्ती
भावना लड़खड़ाती हुई रह गईचंद शंकाओं से थी घिरी काँपती
रंग फ़ागुन के पतझरचुरा ले गया,जेठ ने लूट ली सावनी हर घटा
और अनुभूतियाँ रह गईं मोड़ पर राह अभिव्यक्तियों की रहीं ताकती

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आपके कुन्तलों से लिपट कर गई तो उमड़ती घटा सावनी हो गई
आपके होंठ को चूम कर जो चली, गुनगुनाती हुई रागिनी हो गई
आपके स्पर्श मे एक जादू भरा, मानने लग गये आज सब ही यहाँ
आपकी दॄष्टि की रश्मियां थाम कर मावसी रात जब चाँदनी हो गई

संकल्पों के तटबन्धों के टुकड़े टुकड़े हो जाते हैं

बहते हुए समय की धारा ऐसे लेती है अंगड़ाई
संकल्पों के तटबन्धों के टुकड़े टुकड़े हो जाते हैं

पांखुर पांखुर बिखरा जाते सूखे फूल किताबों वाले
इतिहासों में गुम हो जातीं रातें स्वर्णिम सपनों वाली
सौगंधों की नव-दुल्हन को जो आशीष सदा देता था
टूट टूट बिखरा जाती है उस पीपल की डाली डाली

आशा की रंगीन बूटियां कभी कढ़ीं जिन रूमालों पर
संचित कोषों में उनके फिर धागे धुंधले हो जाते हैं

चांद सितारे हाथ बढ़ाकर मुट्ठी भरने की अभिलाषा
मरुथल में तपते सूरज को भी ललकार चुनौती देना
लगने लगता क्षणिक असर था वह उद्विग्न ह्रदय पर कोई
है यथार्थ से नहीं लेश भी उसका कोई लेना देना

दोष न अपना स्वीकारा है, दोष लगाते हैं स्थितियों पर
जिनके चक्रव्यूह में फ़ँस कर परिचय सारे खो जाते हैं

अनुष्ठान वह परिवर्तित करने को सारी परिभाषायें
कीर्तिमान कुछ नये बनाने का खुद को खुद का आवाहन
विद्रोहों के अंगारों से रह रह तपती हुईं शिरायें
खींच बुला लेना अम्बर पर जेठ मास में भीगा सावन

दर्पण की परछाईं में जो खींची जाती हैं रेखायें
उन सब के परिणाम घरौंदे बालू वाले हो जाते हैं

नव वर्ष २०२४

नववर्ष 2024  दो हज़ार चौबीस वर्ष की नई भोर का स्वागत करने खोल रही है निशा खिड़कियाँ प्राची की अब धीरे धीरे  अगवानी का थाल सजाकर चंदन डीप जला...