बस यूँ ही

रंग में गेरुओं के रँगे चौक ने चूम जब दो लिए पग अलक्तक रँगे
देहरी को सुनाने लगे राग वह, पायलों की बजी रुनाझुनों में पगे
खिड़कियों से रहा झाँकता चन्द्रमा, घूंघटों की सुनहरी किनारी पकड़
प्रीत का एक मौसम घिरा झूमता, रह गए हैं सभी बस ठगे के ठगे

4 comments:

प्रभाकर पाण्डेय said...

नमस्कार। आपकी यह रचना भी बेजोड़ है।

प्रीत का एक मौसम घिरा झूमता, रह गए हैं सभी बस ठगे के ठगे-- यह पंक्ति मेरे हृदय को हृदयान्वित कर गई।

रंजू ranju said...

रंग में गेरुओं के रँगे चौक ने चूम जब दो लिए पग अलक्तक रँगे
देहरी को सुनाने लगे राग वह, पायलों की बजी रुनाझुनों में पगे

बहुत सुंदर पायलों की बजी रुनाझुनो में पगे बेहद प्यारी लगी यह ...:)

महामंत्री (तस्लीम ) said...

बहुत प्यारी कता है। और उसमें ये लाइनें तो लाजवाब कर गयीं,
"प्रीत का एक मौसम घिरा झूमता, रह गए हैं सभी बस ठगे के ठगे"
बधाई।

Udan Tashtari said...

इतना बेहतरीन पढ़कर हम भी रह गए हैं बस ठगे के ठगे. बहुत उम्दा.

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में...